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दुनिया

फर्जी हकीम बनी ब्लॉगर पर भारी जुर्माना

कैंसर में ये करें, शुगर में ऐसा करें...फेसबुक और व्हाट्सऐप पर ऐसे हजारों मशविरे रोज शेयर होते हैं. इनसे सावधान रहिये वरना देर सबेर आपको ही खामियाजा भुगतना पड़ेगा.

बीमार इंसान स्वस्थ होने की उम्मीद में हर दरवाजा खटखटाता है. कभी वह आयुर्वेदिक दवा खाता है, तो कभी एलोपैथिक या होमियोपैथिक. साथ साथ घरेलू टोटके भी चलते रहते हैं. बीच बीच में ऐसा भी सुनाई पड़ता है कि फलां को भी यही हुआ था, उसने ये किया और ठीक हो गया. इसके साथ ही टोटकों की प्रक्रिया भी शुरू हो जाती है.

और ऐसा नहीं है कि ये सब भारत या पिछड़े देशों में ही होता है. विकसित देशों के लोग भी परेशानी में ऐसे रास्तों तक पहुंच जाते हैं. और फिर उनका सामना बेले गिब्सन जैसे लोगों से होता है. ऑस्ट्रेलिया के मेलबर्न शहर की ब्लॉगर बेले गिब्सन ने दावा किया कि उन्हें ब्रेन कैंसर था, जिसका ट्रीटमेंट उन्होंने खुद वैकल्पिक इलाज और खास किस्म की खुराक से किया. 25 साल की गिब्सन ने ब्लॉग पर भी यह बात कही. दावे को सच मानकर कई कैंसर रोगी गिब्सन के मशविरे पर चलने लगे. बेल गिब्सन ने कई किताबें भी लिख दी.

लेकिन अब पता चला है कि गिब्सन को कभी ब्रेन कैंसर था ही नहीं. अदालत में यह साबित हो गया कि गिब्सन ने झूठ बोला. ब्लॉगर ने एक स्मार्टफोन ऐप भी बनाया. चैरिटी का दावा करने वाले उस ऐप की मदद से लोगों से पैसे मांगे गए लेकिन सेवार्थ कुछ भी नहीं किया गया. गिब्सन का फर्जीवाड़ा साबित होने के बाद अदालत ने उस पर 4,10,000 ऑस्ट्रेलिया डॉलर का जुर्माना ठोंका. कोर्ट ने यह भी कहा बेल गिब्सन को माफी मांगते हुए अखबार में विज्ञापन भी देना होगा.

असल में एक ही बीमारी से पीड़ित दो अलग अलग व्यक्तियों पर इलाज भी बिल्कुल एक जैसा काम नहीं करता. आम तौर पर हर इंसान के शरीर में हिमोग्लोबिन, आरबीसी, खनिजों, बीपी और ग्लूकोज का स्तर अलग होता है. रोग प्रतिरोधी तंत्र भी अलग अलग क्षमता पर काम करता है. इनके साथ ही उम्र और शारीरिक गतिविधि भी बड़ी भूमिका निभाती है. टोटकों के चक्कर में अक्सर इंसान इन चीजों को नजरअंदाज कर देता है. इसीलिए बेहतर है कि बीमारी के दौरान जो कुछ भी किया जाए उसकी सही सही जानकारी डॉक्टर को भी दी जाए.

(जिंदा मछली निगलने से इलाज)

ओएसजे/एमजे (डीपीए)

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