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जर्मन चुनाव

फंसे मजदूरों की तारीफ में नासा विशेषज्ञ

चिली में 700 मीटर यानी दो हज़ार फीट नीचे 33 खदान मजदूर 5 अगस्त से फंसे हैं. उन्हें निकालने के लिए खदान में ड्रिलिंग शुरू कर दी गई है, लेकिन उन्हें बाहर आने में महीने लगेंगे. मजदूरों को हिम्मत देने पहुंचे नासा के जानकार.

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नासा के विशेषज्ञों की एक टीम ने इन मजदूरों की जिजीविषा की तारीफ की है. अमेरिकी अंतरिक्ष अनुसंधान एजेंसी (नासा) में वरिष्ठ मेडिकल ऑफिसर जेम्स माइकल डंकन ने कहा, "इन मुश्किल हालात में जो हिम्मत इन मजदूरों ने दिखाई है, उससे हम बहुत प्रभावित हैं." बहुत दिनों तक अलग थलग रहने के कारण इन मजदूरों को होने वाली मुश्किलों से बचाने के लिए नासा के मेडिकल विशेषज्ञ चिली पहुंचे हैं.

ऑपरेशन सैन लोरेंजो नाम का यह बचाव अभियान और फंसे मजदूरों को मानसिक तौर पर मजबूत बनाए रखने और उन्हें दवाएं देने का काम साथ-साथ चल रहा है. इन्हें टिटेनस, डिप्थिरिया, फ्लू, न्यूमोनिया से बचाने के लिए इंजेक्शन दिए जा रहे हैं. ये लोग अब थोड़ी सूखी जगह पर पहुंच गए हैं क्योंकि अंधेरे, नमी और गर्मी के कारण कुछ मजदूरों को जख्म और फंगस का इन्फेक्शन होने लगा था.

Chile Grubenunglück in Copiapo Rettungsarbeiten

ऑस्ट्रेलियाई ड्रिलिंग मशीन

रुका काम

गुरुवार को ऑस्ट्रेलिया से आई खास ड्रिलिंग मशीन को रोक देना पड़ा. कारण था कि खदान की दीवार में कुछ मुश्किल थी. चिली की तांबे और सोने की खदान में राहत काम के प्रभारी इंजीनियर आंद्रे सोगैरेट को इस तरह की मुश्किलों की आशंका थी. उन्होंने बताया, "हम वहीं करेंगे, जैसा हमने बताया है. दीवार को सीमेंट से ढकेंगे और खुदाई फिर से शुरू करेंगे. हम दिन में इस दीवार में सीमेंट भरेंगे ताकि रात भर हम बिना रुके ड्रिलिंग कर सकें. अभी हम यही कर रहे हैं."

30 टन की ऑस्ट्रेलियाई ड्रिलिंग मशीन सोमवार से काम कर रही है. खदान मजदूरों तक पहुंचने में कम से कम तीन महीने लगेंगे.

Grubenunglück in Chile

फंसे मजदूरों का पहला वीडियो

ठीक हाल

चिली के अधिकारियों का कहना है कि खाना भेजे जाने के कारण फंसे हुए मजदूरों की हालत अब बेहतर है. चिली के गृह मंत्रालय में राष्ट्रीय आपात सेवा कार्यालय ने बताया, "हर दिन हम उन्हें दो से ढाई हज़ार कैलोरी दे रहे हैं." मंगलवार को राष्ट्रीय टीवी पर इन खदान मजदूरों का नया वीडियो प्रसारित किया गया जिसमें वे साफ सुथरे कपड़े पहने और संगीत सुनते दिखाई दिए. इन मजदूरों के जिंदा होने की जब खबर मिली, तब उन्हें खदान में फंसे हुए 17 दिन हो चुके थे.

स्थानीय समय के हिसाब से हर दिन सुबह साढ़े सात बजे ये मजदूर उठते हैं. उन्हें सैंडविच, दही या दूध दिया जाता है. लंच के बाद इंटरकॉम के जरिए एक ग्रुप डिसकशन होता है और ये लोग अपने परिवार से बात करते हैं.

रिपोर्टः एजेंसियां/आभा एम

संपादनः ए कुमार

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