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ब्लॉग

प्लास्टिक बैन तो ठीक है, लेकिन...?

गोमुख से हरिद्वार तक नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल एनजीटी ने प्लास्टिक पर रोक लगा दी है. गंगा को प्रदूषणमुक्त बनाने की दिशा में ये एक बड़ी पहल तो है, लेकिन नतीजा इस पर निर्भर है कि अमल कितनी तत्परता और ईमानदारी से होता है.

गंगा की सफाई का मुद्दा भारत में 80 के दशक से सुलग रहा है. कई नीतियां, कानून, निर्देश, आदेश जारी हुए लेकिन आज गंगा में प्रदूषण खतरनाक स्तरों पर है और दिल्ली में यमुना जैसी दुर्गति की आशंका गंगा को लेकर भी जताई जाने लगी है. देर से ही सही एनजीटी ने एक महत्त्वपूर्ण आदेश दिया है. इस आदेश के तहत गोमुख से लेकर हरिद्वार तक गंगा में प्लास्टिक और किसी भी तरह का अन्य मलबा, अस्पतालों का कचरा, अपशिष्ट आदि नहीं डाला जा सकेगा. जो ऐसा करेगा उस पर भारी जुर्माना लगेगा. प्लास्टिक पर बैन के साथ साथ एनजीटी ने कपड़ा मंत्रालय को निर्देश दिया है कि वो 15 दिन के भीतर प्लास्टिक बैग के संभावित विकल्पों के बारे में उत्तराखंड सरकार को सूचित करे. इसमें जूट और बायोडिग्रेडेबल सामग्री को प्राथमिकता देने को कहा गया है. गंगा को स्वच्छ करने के लिए केंद्र से उत्तराखंड सरकार को करीब ढाई सौ करोड़ रुपये मिले थे. खबरों के मुताबिक इसमें से करीब 80 करोड़ रुपए खर्च किए गए हैं. ट्रिब्यूनल का कहना है कि बाकी पैसा उसकी देखरेख और निर्देश में खर्च होना चाहिए.

प्लास्टिक को लेकर राज्य सरकार की पहले से कोई दूरगामी नीति नहीं रही है. इतना जरूर है कि गोमुख आदि स्थानों पर प्लास्टिक ले जाना मना किया जाता रहा है. लेकिन किसी स्पष्ट प्राधिकार और कड़ी जवाबदेही के अभाव में इन मनाहियों का खुलेआम उल्लंघन भी देखा जाता रहा है. प्लास्टिक का इस्तेमाल धड़ल्ले से जारी है और जहां पॉलीथीन के बैग इस्तेमाल नहीं भी किए जा रहे हैं तो खाद्य सामग्री के पैकेट और पानी की बोतलों का कचरा बड़े पैमाने पर नदियों में बहा दिया जाता है. सड़कों पर पड़ा प्लास्टिक पानी और खेतों में पहुंच जाता है और अंततः सारी गंदगी आगे बहती जाती है.

एनजीटी ने आदेश तो कर दिया है लेकिन अब इस पर कितनी सख्ती से अमल हो पाता है, गंगा का कल्याण इस पर निर्भर करता है. गंगा और अन्य सहायक नदियों के किनारे बन रही जलविद्युत परियोजनाओं को लेकर ट्रिब्यूनल ने कुछ नहीं कहा है, उसकी दलील है कि ये मामले कोर्ट में हैं. तो परियोजनाओं के अपार मलबे का क्या होगा. इसी तरह खाद्य सामग्रियों के प्लास्टिक पैक्स की बात है. स्नैक्स, बिस्किट, कोल्डड्रिंक और अन्य खाद्य सामग्रियों की निर्माता कंपनियों को क्या ये कहा जाएगा कि वे पैकिंग की वैकल्पिक व्यवस्था करें. क्योंकि देखा गया है कि सब्जी फल के ठेलों और परचून की दुकानों से ग्राहक के साथ निकलने वाली प्लास्टिक की थैलियों से ज्यादा कचरा तो उस प्लास्टिक का है जो पैकिंग में इस्तेमाल हो रहा है. क्या वो निर्धारित मानकों को पूरा करते हैं. उत्तराखंड में मसूरी, नैनीताल, देहरादून आदि शहरों में प्लास्टिक की थैलियों पर प्रतिबंध है. कुछ खास मापदंडों को पूरा करने वाली प्लास्टिक की थैलियां रखने की अनुमति जरूर है लेकिन नियमों का पालन कुछ समय तो शिद्दत और सदाशयता और गंभीरता से किया जाता है लेकिन धीरे धीरे लोग पुराने ढर्रे पर लौट आते हैं.

एनजीटी का फैसला एक बड़े फलक पर तो अहम नजर आता है लेकिन जरा गहराई से और सैद्धान्तिक जामे को उतारकर व्यावहारिक नजरिए से देखें तो इस आदेश के अनुपालन में कई विसंगतियां मिलेंगी. गोमुख से हरिद्वार तक प्लास्टिक बैन का अर्थ ये कि गंगा पर कोई प्लास्टिक अब नहीं बहाया जा सकेगा या इसका अर्थ ये है कि सड़कों दूकानों, पर्यटन स्थलों, मंदिरों, आश्रमों, दफ्तरों, फैक्ट्रियों आदि में भी प्लास्टिक नहीं इस्तेमाल होगा, और अगर होगा तो उसका डिस्पोजल किस तरह से होगा? क्या ये कल्पना की जा सकती है कि पर्यटकों से भरी हुई बस अपने साथ लाए गए हर तरह के प्लास्टिक को अपने साथ उठा कर वापस ले जाएगी या वहीं कहीं इधर उधर फेंक देगी. इस तरह आप देखें तो और भी कई पेचीदा बातें हैं जिन पर गौर किए जाने की जरूरत है.

बेशुमार उपभोक्तावाद ने बेशुमार प्लास्टिक पैदा किया है. और ये बेशुमारी क्या मैदान क्या पहाड़, सबको अपनी चपेट में ले चुकी है, ऐसे में कोई भी आदेश एकतरफा या एकांगी नहीं हो सकता है, आज के दौर में उसे बहुआयामी और बहुपरतीय होना बहुत जरूरी है और उसके निहितार्थ भी गहरे और विविध होने चाहिए. प्लास्टिक डिस्पोजल की एक राष्ट्रीय संरचना भी तैयार करने की जरूरत है तभी कोई आदेश प्रभावी हो सकेगा.

ब्लॉगः शिवप्रसाद जोशी

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