प्लास्टिक प्रदूषण से जंग लड़ रहीं अफगान शरणार्थी | दुनिया | DW | 23.06.2017
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दुनिया

प्लास्टिक प्रदूषण से जंग लड़ रहीं अफगान शरणार्थी

फराह नाज जब अफगान शरणार्थी समुदाय से काम करने के लिए निकलती हैं तो उन्हें तीखी टिप्पणियों और विरोध भरी नजरों का सामना करना पड़ता है. अब उन्हें ऐसे व्यवहार की आदत पड़ चुकी है.

अफगान शरणार्थी समुदाय के लोग फरहा नाज को पसंद नहीं करते क्योंकि वह हर सुबह काम करने के लिए बाहर निकल जाती है. वे लोग नाज के काम करने पर उनसे कहते हैं कि वह अच्छी औरत नहीं है. वह जो कर रही है वह शर्मनाक है और उसकी सही जगह अपने घर में है और उसे अपने बीमार पति और पांच बच्चों का ख्याल रखना चाहिए. 32 वर्षीय नाज को तालिबान से भागे पांच साल हो गये हैं. वहां उनके पति को मारने का आदेश दिया गया था और उस पर मिट्टी तेल छिड़ककर लगभग जिंदा जला दिया गया था. उसके बच्चों को अगवा कर लेने की धमकियां मिली थीं. अब वो इस बारे में ध्यान नहीं देती कि लोग क्या सोचते हैं.

फिलहाल वो एक बिजनेस वूमन बनने की तैयारी में हैं. नाज कहती हैं कि मेरे पास काम करने के अलावा कोई चारा नहीं था और अब मुझे इस पर गर्व है. मैं अपने परिवार का ध्यान रख पा रही हूं और मेरे समुदाय की महिलाओं की सोच भी बदल रही हूं. और खास बात ये है कि मैं जो काम कर रही हूं वो यह दर्शाता है कि शरणार्थी भी बेहतरीन काम कर सकते हैं.

नाज उन पांच महिलाओं में से हैं जो न सिर्फ घर से बाहर निकल कर काम कर रही हैं बल्कि रूढ़िवादी मानसिकता को भी चुनौती दे रही हैं. इसके साथ वो उन कुछ लोगों में से हैं जो प्लास्टिक से होने वाले प्रदूषण को कम करने के लिए काम कर रही हैं.

यह काम बहुत बड़ा है और सिर्फ 5 लोग इसे ठीक से नहीं कर पायेंगे. लेकिन यह काम अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान बना रहा है. यह काम दोहरी भूमिकायें निभा रहा है. एक तरफ तो भारत में प्लास्टिक प्रदूषण के मुद्दे पर बात होने लगी है तो दूसरी तरफ वे शरणार्थी महिलाओं की छवि को बेहतर बना रही है.

ये महिलाएं जिस प्रोजेक्ट में काम कर रही हैं वह दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्रों की एक पहल है. यहां अफगान महिलाएं ऐसी कटोरियां, चम्मच और छुरी चाकू वगैरह बनाती हैं जिसे खाया जा सकता है!  ये बाजरे और गेहूं के आटे से बने बिस्कुट की तरह होते हैं. और इन्हें कैफे और आईसक्रीम पार्लरों में प्लास्टिक की जगह पर इस्तेमाल किया जा रहा है. इसे पश्चिम के देशों में बहुत पसंद किया जा रहा है और पर्यावरण के अनुकूल एक विकल्प की तरह देखा जा रहा है.

20 वर्षीय छात्र निश्चय हंस कहते हैं कि हम सामाजिक उद्यम का एक मॉडल बनाना चाहते थे. जो पर्यावरण को बेहतर करने के साथ साथ शरणार्थियों जैसे बहिष्कृत समुदायों को रोजगार भी दे. निश्चय दिल्ली के किरोड़ीमल कॉलेज के उन 40 छात्रों में से हैं जो इस काम में शामिल हैं. ये लोग कमजोर और पिछ़डे समुदायों के लोगों के साथ मिल कर टिकाऊ और पर्यावरण के अनुकूल व्यवसाय खड़ा करने का प्रयास करते हैं. इस काम में यूएन भी इनकी मदद कर रहा है.

नीता भल्ला/एसएस (रॉयटर्स)

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