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मनोरंजन

प्रासंगिक हैं छपी हुई किताबें

इंटरनेट और ई-पुस्तकों की व्यापक होती पहुंच के बावजूद छपी हुई किताबों का महत्व कम नहीं हुआ है और वह अब भी प्रासंगिक हैं. कोलकाता पुस्तक मेले में उमड़ी भीड़ भी यही साबित करती है.

पुस्तक मेले के आयोजक बुकसेलर्स एंड पब्लिशर्स गिल्ड के अध्यक्ष सुंधाशु कुमार दे कहते हैं, "हर साल इस पुस्तक मेले के आकार, यहां आने वाली भीड़ और किताबों की बिक्री से साफ है कि इस डिजिटल दौर में भी किताबों की प्रासंगकिता बनी हुई है."

पहले दिन से ही मेला परिसर में लगातार बढ़ती भीड़ ने साबित कर दिया है कि किताबों के प्रति लोगों की दिलचस्पी घटने की बजाय बढ़ रही है. मेले में स्टाल लगाने वाले बांग्ला के मशहूर प्रकाशक आनंद पब्लिशर्स के प्रबंध निदेशक सुबीर मित्र कहते हैं, "पुस्तक मेले में हमारे स्टाल के सामने लंबी कतार लग रही है और बिक्री भी पिछले साल के मुकाबले बढ़ी है." तो क्या ई-बुक अब तक छपी हुई किताबों के समक्ष कोई चुनौती नहीं पेश कर सकी है? इस सवाल उनका कहना है, "ई-बुक से आतंकित होने की कोई वजह नहीं है. देश की बहुत कम आबादी को ही ई-बुक सुलभ है. इसके अलावा वैसे लोगों का एक बड़ा हिस्सा अब भी छपी हुई जिल्द वाली किताबें पढ़ने में दिलचस्पी लेता है."

देज पब्लिशिंग के सुधांशु शेखर दे कहते हैं,"पिछले साल मेले के दौरान पहले शनिवार और रविवार यानी छुट्टियों के दिन जितनी पुस्तकें बिकी थीं, इस बार उसके मुकाबले ज्यादा पुस्तकों की बिक्री हुई है." वह कहते हैं कि कम से कम बांग्ला पुस्तकों की बिक्री पर ई-बुक का कोई असर नहीं पड़ा है.

Indien Buchmesse in Kalkutta 2014

पुस्तक मेले का उद्घाटन 29 जनवरी को हुआ

इस पुस्तक मेले के उद्घाटन के मौके पर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कहा, "यह पुस्तक मेला नहीं बल्कि दुर्गापूजा, क्रिसमस और ईद की तरह ही पुस्तकों का उत्सव है. हाथों में किताब लेकर पढ़ने की जो अनुभूति है वह किसी दूसरे माध्यम में संभव नहीं है." उन्होंने भरोसा जताया कि ट्विटर, फेसबुक और ई-बुक्स की बढ़ती पहुंच के बावजूद छपी हुई किताबें पढ़ने की हमारी परंपरा और आदत जस की तस बनी रहेगी. तकनीकी प्रगति के बावजूद छपी हुई किताब बढ़ने का एहसास और आनंद हमेशा कायम रहेगा. मुख्यमंत्री अपना हवाला देते हुए कहती हैं, ´"मैं आज भी कंप्यूटर के कीबोर्ड की बजाय कलम के जरिए ही मन के भावों को मूर्त रूप देती हूं." कोलकाता पुस्तक मेले का उद्घाटन 29 जनवरी को हुआ था.

पुस्तक प्रेमियों की राय

मेले में उमड़ने वाले पुस्तक प्रेमी भी मानते हैं कि छपी पुस्तकों का कोई सानी नहीं है. प्रेसीडेंसी कालेज में पढ़ने वाली रुचिरा सेन कहती है, "छपी हुई पुस्तकों की बात ही कुछ और है. विषयवस्तु एक होने के बावजूद ई-बुक्स पढ़ते हुए वैसा एहसास नहीं होता जैसा इन किताबों को पढ़ते हुए होता है." एक प्रोफेसर धीरेन भट्टाचार्य कहते हैं, "छपी हुई किताबें तलाशना और पढ़ना आसान है. घर की लाइब्रेरी में रखी यह पुस्तकें सहज ही पढ़ने के लिए मिल जाती हैं. न इंटरनेट का झंझट और न ही बिजली या ई-बुक रीडर को चार्ज करने की समस्या."

पुस्तक मेला

नौ फरवरी तक चलने वाले इस मेले में लगभग छह सौ स्टाल लगाए गए हैं. भीड़ के लिहाज से यह दुनिया का सबसे बड़ा पुस्तक मेला है. आयतन के हिसाब से फ्रैंकफर्ट और लंदन पुस्तक मेले के बाद इसका स्थान तीसरा है. वैसे, इसे एशिया का सबसे बड़ा पुस्तक मेला होने का गौरव हासिल है. हर साल किसी खास देश को मेले की थीम बनाया जाता है. पिछले साल बांग्लादेश की थीम पर इसका आयोजन किया गया था तो इस साल दक्षिणी अमेरिकी देश पेरू को यह गौरव मिला है. इस साल मेले में जिन पुस्तकों की सबसे ज्यादा मांग है उनमें फिल्म अभिनेत्री सुचित्रा सेन और गायक मन्ना डे पर लिखी पुस्तकें शामिल हैं. आयोजकों ने इस साल पहली बार मेले को लोकप्रिय बनाने के लिए सोशल नेटवर्किंग साइटों का सहारा लिया है. पुस्तकप्रमियों की लिए कई तरह की ऑनलाइन पहेलियां आयोजित की जा रही हैं. उनके विजेताओं को किताबों पर 15 फीसदी की अतिरिक्त छूट दी जा रही है. गिल्ड के सचिव त्रिदीब चटर्जी का दावा है कि यह पहल काफी लोकप्रिय हो रही है.

रिपोर्ट: प्रभाकर, कोलकाता

संपादन: आभा मोंढे

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