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ब्लॉग

प्रशिक्षण से दूर होगी जजों की कमी

भारत में न्यायपालिका और विधायिका के बीच पिछले चार दशक से जारी अघोषित संघर्ष के कारण जजों की कमी गंभीर समस्या बन गई है. आलम यह है कि देश की उच्च अदालतों में जजों के 40 फीसदी पद खाली हैं. सुप्रीम कोर्ट भी अछूता नहीं है.

न्यायिक नियुक्ति आयोग के लिए गत अप्रैल में संसद से पारित एनजेएसी कानून को सुप्रीम कोर्ट द्वारा खारिज किए जाने के बाद स्थिति और खराब हो गई है. पिछले साल अप्रैल में संसद में पारित एनजेएसी कानून को पिछले महीने सुप्रीम कोर्ट से संविधान की मूल भावना के प्रतिकूल बताकर खारिज कर दिया. पांच जजों की संविधान पीठ ने अपने फैसले में कहा कि एनजेएसी कानून शक्ति पृथक्करण के सिद्धांत का उल्लंघन करता है जो कि संविधान के मौलिक ढांचे को प्रभावित करता है. अदालत की दलील है कि इस आयोग के माध्यम से उच्च अदालतों में जजों की नियुक्ति को मंजूरी देने से न्यायपालिका के क्षेत्राधिकार में दखल होगा.

कुल मिला कर अदालत के फैसले से विधायिका और न्यायपालिका के बीच न्यायिक नियुक्ति को लेकर चल रहा टकराव भले ही टल गया हो लेकिन जजों की कमी से जूझ रही न्यायपालिका के लिए समस्या बढ़ गई है. हालांकि अदालत के फैसले के बाद कोलेजियम व्यवस्था को ही बहाल रखा गया है लेकिन इस व्यवस्था में भी खामियों की बात स्वीकारते हुए सुप्रीम कोर्ट को अभी इन खामियों को दूर करना बाकी है. जब तक यह काम पूरा नहीं हो जाता तब तक जजों की नियुक्ति नहीं हो सकती और उनकी कमी का बढ़ना लगातार जारी है.

आंकड़े डराते हैं

अगर आंकड़ों पर नजर डालें तो समस्या की गंभीरता अपने आप समझ आती है. सुप्रीम कोर्ट सहित देश भर के हाईकोर्ट और निचली अदालतों में 3.2 करोड़ मामले लंबित हैं. इनमें से लगभग 40 लाख मामले हाईकोर्ट और 61 हजार मामले सुप्रीम कोर्ट में लंबित हैं. अकेले सुप्रीम कोर्ट में ही फिलहाल तीन जजों की कमी है. जबकि मुख्य न्यायाधीश एचएल दत्तू खुद दो दिसंबर को सेवानिवृत्त होने के बाद इस संख्या में इजाफा करेंगे. जबकि देश भर के हाईकोर्ट में जजों के कुल 1017 पदों में से 469 पद खाली पड़े हैं. कोलेजियम व्यवस्था को दुरुस्त किए जाने तक यह संख्या आसानी से 500 का आंकड़ा पार करने का अनुमान है.

समस्या की जड़ में सिर्फ जजों की नियुक्ति प्रक्रिया में खामी ही नहीं है. यह सही है कि जजों की नियुक्ति प्रक्रिया का निर्धारण नहीं हो पाने के कारण समस्या में इजाफा हो रहा है. लेकिन महज प्रक्रिया की खामियां दूर कर देने मात्र से ही काम नहीं बनेगा. लॉ कमीशन के पूर्व अध्यक्ष एपी शाह का कहना है कि जजों की मौजूदा नियुक्ति प्रक्रिया के मानकों पर खरा उतरने वाले योग्य उम्मीदवारों की कमी भी उच्च अदालतों में जजों के पद खाली रहने का बड़ा कारण है. उनका कहना है कि देश में कानून की पढ़ाई का स्तर भी बेहतर न होने की वजह से न्यायाधीश पद के लिए अच्छे दावेदार नहीं मिल पाते हैं. मजबूरन कोलेजियम समूह को बेहतर वकीलों को जज बनाना पड़ता है.

भारत में अभी भी कानून की पढ़ाई वकालत के पेशे को ध्यान में रखकर कराई जाती है. जज बनाने के लिहाज से पृथक पाठ्यक्रम का देश में अभी भी अभाव होना जजों की कमी की समस्या का परोक्ष कारण है. भारत को इस मामले में जर्मनी और फ्रांस से सीखना चाहिए. जर्मनी में अदालत और वकालत की प्रैक्टिस में ट्रेनिंग कानून की पढ़ाई का हिस्सा है. न्यायाधीश बनने के इच्छुक छात्रों को प्रशिक्षण देकर और पढ़ाई कराकर ही इस दिशा में तैयार किया जाता है. भारत में भी इस व्यवस्था को विकसित करना होगा.

ब्लॉग: निर्मल यादव

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