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दुनिया

प्रवासी नेपालियों का संकट

पर्वतीय देश नेपाल बीते सालों में राजनीतिक अस्थिरता के कारण बहुत बुरी दशा में पहुंच गया है. दूसरे देशों में काम के लिए जाने वालों को नौकरी तो मिल जाती है लेकिन इसका खामियाजा उन्हें दूसरे रूप में उठाना पड़ता है.

31 साल के भूपेंद्र मल्ला ने जून 2011 में जब कतर में ड्राइवर की नौकरी के लिए नेपाल का अपना घर छोड़ा तब उन्हें अंदाजा नहीं था कि भविष्य में इसका उनकी जिंदगी पर क्या असर होगा. सरकारी अनुमान है कि हर रोज 1,200 से 1,500 लोग ऐसी ही उम्मीद में देश छोड़ कर जा रहे हैं. पांच महीने तक वह कतर में सीवेज ट्रेलर चलाते रहे. एक रोज शाम के वक्त उनके मैनेजर ने उन्हें बुलाया. मल्ला ने बताया, "उसने कहा कि एक दूसरा नेपाली ड्राइवर हाइवे पर बैटरी की समस्या के कारण फंस गया है, जा कर मदद करो."

मल्ला उस ट्रक के अंदर घुस कर ट्रेलर की बैटरी ठीक कर रहे थे तभी एक अनियंत्रित ट्रक उस ट्रक से आ टकराया. मल्ला ने बताया, "सारा गंदा पानी मेरे ऊपर गिरने लगा और तभी मैंने देखा कि मेरा पैर ऐसे उलट गया है जैसे वह मेरे शरीर का हिस्सा ही न हो." मल्ला की जान तो बच गई लेकिन उनका दाहिना पैर हमेशा के लिए बेकार हो गया, "मैंने खुद से कहा मैं मर नहीं सकता क्योंकि मेरा परिवार है, मुझ पर बहुत कर्ज है."

डरावने दिन

दूसरा ड्राइवर छह महीने तक कोमा में रहा और फिर कुछ ठीक हुआ. अब वह ठीक से खड़ा भी नहीं हो सकता और बड़ी मुश्किल से बोल पाता है. मल्ला के लिए वह गुजरे दिन बहुत डरावने हैं. कतर के अस्पताल में तीन महीने तक बुरे हाल में रहने के बाद उनके साथी नेपाली लोग उन्हें अपने घर में ले गए. वहां छोटे से कमरे में पहले से ही आठ लोग रह रहे थे. जमीन पर सोते और मिल बांट कर खाना खाते. मल्ला ने बताया, "मेरे पास इलाज के लिए पैसा नहीं थी इसलिए मेरे पैरों से बदबू आने लगी, मेरे साथियों ने मांस खाना बंद कर दिया ताकि मेरे इलाज में मदद कर सकें."

दूसरे प्रवासी मजदूरों के जोर देने पर नेपाली दूतावास ने मल्ला की कंपनी को उनके इंश्योरेंस और बकाया वेतन के भुगतान के लिए लिखा. मल्ला के मुताबिक, "कंपनी ने मुझसे ऐसे कागज पर दस्तखत लेने की कोशिश की जिस पर लिखा था कि मैं पहले ही अपना वेतन ले चुका हूं और घर वापस जाना चाहता हूं. किस्मत से मैं थोड़ा अंग्रेजी जानता हूं और मैंने दस्तखत करने से मना कर दिया."

जख्मी शरीर के साथ गरीबी की हालत में दो साल तक पुलिस स्टेशन, दूतावास और कोर्ट के चक्कर लगाने के बाद आखिरकार उन्हें उनके पैसे मिले. मल्ला उन प्रवासी मजदूरों में हैं जो हर रोज अपनी नौकरी के दौरान कतर में जख्मी होते हैं. बहुत से कामगारों की तो मौत हो जाती है क्योंकि भाषा की समस्या है और विदेश में वे मदद मांगने से डरते हैं.

एजेंसियां का बहकावा

नेपाल की नौकरी दिलाने वाली एजेंसियां प्रवासी मजदूरों को विदेश जाने से पहले सही जानकारी नहीं देतीं. विदेश में काम दिलाने वाली एजेंसियों की एक संस्था के प्रमुख टांका बहादुर राउत कहते हैं, "हम उन्हें जाने से पहले ट्रेनिंग लेने के लिए कहते हैं लेकिन ज्यादातर लोग यह नहीं करते क्योंकि काठमांडू में रहना बहुत महंगा है."

इसी साल 4 जून से 8 अगस्त के बीच जब 44 नेपाली मजदूरों की मौत हो गई तो सितंबर में नेपाल ने कतर से नेपाली कामगारों के साथ हो रहे व्यवहार पर नजर डालने को कहा. सरकारी आंकड़ें बताते हैं कि पिछले एक दशक में खाड़ी के देशों और मलेशिया में काम करने गए 7,200 मजदूरों की मौत हुई है.

कतर की आलोचना

कतर मानवाधिकारों को लेकर पहले ही अंतरराष्ट्रीय आलोचना झेल रहा है. सोमवार को जारी मानवाधिकार संगठन एमनेस्टी इंटरनेशनल की रिपोर्ट में कतर के बारे में कहा गया है कि कई कंपनियां, "यहां नियमों के न होने और मजदूरों के संरक्षण की व्यवस्था कड़ाई से लागू न होने के कारण निर्माण के काम में उनका शोषण करती हैं.

एमनेस्टी के महासचिव सलिल शेट्टी ने कहा, "यह माफी के लायक नहीं हैं, दुनिया के अमीर देशों में से एक में बहुत से प्रवासी मजदूरों का बुरी तरह शोषण किया जा रहा है, उन्हें वेतन नहीं मिल रहा है और उन्हें अस्तित्व के संघर्ष के लिए छोड़ दिया जा रहा है." विदेश से आने वाला पैसा नेपाल की अर्थव्यवस्था में 28 फीसदी की हिस्सेदारी रखता है, लेकिन पीड़ितों की तादाद बढ़ रही है.

नेपाल की राष्ट्रीय योजना आयोग के पूर्व सदस्य और समाजशास्त्री गणेश गुरुंग कहते हैं, "हर रोज तीन से चार शव आते हैं, तलाक के बढ़ते मामले, इनकी वजह से बेघर हो रहे बच्चे, एचआईवी एड्स के मरीज, इन सबके रूप में प्रवासी मजदूरों की सामाजिक कीमत पता चल रही है." भारत में भी बड़ी संख्या में नेपाल के लोग रहते और काम करते हैं. वीजा की जरूरत ना होने से आना तो आसान है लेकिन यहां भी उनकी स्थिति बहुत अच्छी नहीं.

मल्ला इस साल जुलाई में बकाया पैसा मिलने के बाद वापस आ गए, लेकिन सारे पैसे दो साल में लिए कर्ज चुकाने में ही खर्च हो गए. अब वह एक छोटे से कमरे में रहते हैं और नेपाल सरकार से इंश्योरेंस का पैसा मिलने की उम्मीद में हैं. वह उस पैसे से एक दुकान खोलना चाहते हैं, "मेरी पत्नी सामान लाएगी और मैं बैठ कर दुकान चलाउंगा."

एनआर/आईबी (डीपीए)

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