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खेल

प्रबंधन के खराब ट्रैक पर कैसे दौड़ेंगे खिलाड़ी

भारत के खेल जगत का विवादों से नाता कभी टूटेगा नहीं. खासकर एथलीट खेलों में तो ये विवाद कुछ ज्यादा ही चौंकाते हैं. ताजा मामला केरल की लंबी दूरी की धाविका पीयू चित्रा का है.

Indien Bhubaneswar - P.U. Chitra (Getty Images/AFPD. Sarkar)

22वीं एशियन एथलेटिक्स चैंपियनशिप में 1,500 मीटर की रेस में चित्रा ने स्वर्ण पदक जीता.

भारत की जानी मानी एथलीट पीयू चित्रा को लंदन में होने वाले विश्व एथलीट मुकाबलों में जाने की इजाजत नहीं मिली है. कोर्ट का आदेश भी धरा का धरा रह गया. केरल के एक अत्यंत गरीब और पिछड़े परिवार से आने वाली चित्रा ने कई अहम राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मुकाबलों में अपनी चमक बिखेरी और मेडल हासिल किए हैं. पिछले दिनों एशियाई एथलीट चैंपियनशिप में वो 1,500 मीटर दौड़ की गोल्ड विजेता रह चुकी हैं.

लंदन मुकाबले के लिए माना जा रहा था कि चित्रा को अपनी निरंतर मेहनत का इनाम जरूर मिलेगा लेकिन वो इस मुकाबले में जा नहीं पायीं और उनका सपना बिखर गया. केरल सरकार ने लंबी दूरी की धाविका पीयू चित्रा का मामला उठाया और इसे लेकर केरल हाईकोर्ट में दस्तक दी गयी. एथलेटिक्स फेडरेशन ऑफ इंडिया (एएफआई) से गुहार लगायी गयी.

खुद केंद्रीय खेल मंत्री विजय गोयल ने भी मांग की लेकिन फेडरेशन टस से मस न हुआ. उसका कहना था कि चित्रा ने मुकाबले के लिए क्वालिफाइंग अंक हासिल नहीं किए हैं, उनका प्रदर्शन लंदन जाने के लिए नाकाफी है. जबकि इसी दौरान केरल हाईकोर्ट, चित्रा को लंदन ले जाने और टीम में शामिल करने का आदेश जारी कर चुका था.

Indien Commonwealth Games Delhi 2010 (UNI)

2010 के कॉमनवेल्थ खेल में महिला कुश्ती के 55 किलो वर्ग में गोल्ड मेडल जीतने वाली गीता फोगट.

फेडरेशन ने कोर्ट के आदेश के बाद शीर्ष संस्था, इंटरनेशनल एसोसिएशन ऑफ एथलेटिक फेडरेशन (आईएएएफ) के पास गुजारिश तो भिजवायी लेकिन उसने भी मना कर दिया. इस तरह एक प्रतिभाशाली और भारत के लिए मेडल की संभावित दावेदार, खेल राजनीति और खेल प्रबंधन के अटपटे जाल में उलझकर ही रह गयी. चित्रा के मामले ने पिछले साल केरल की ही धाविका अनु राघवन के साथ हुए वाकये की याद दिला दी, जब रियो ओलंपिक में महिलाओं की 400 मीटर की रिले रेस से अनु को बाहर कर दिया गया. मामला कोर्ट में गया, अनु के पक्ष में फैसला तो आया लेकिन तब तक देर हो चुकी थी.

अब खिलाड़ी अगर लंदन की तैयारी के लिए डटे हुए थे और भुवनेश्वर मुकाबले से उत्साह में थे, तो क्या भारतीय एथलेटिक्स फेडरेशन की यह जिम्मेदारी नहीं बनती थी कि वो उन्हें सही समय पर ये भी सूचित कर देते कि उनका प्रदर्शन लंदन के पैमानों से कमतर है, जो कि डिसक्वालीफाई होने की वजह बतायी जा रही है. क्यों इस सूचना को खिलाड़ियों या उनके कोच तक समय रहते नहीं पहुंचाया गया. क्या फेडरेशन खुद अंधेरे में था, वो अनजान था, अपडेटेड नहीं था, या जान बूझकर उसने इन खिलाड़ियों को अंधेरे में रखा?

कोर्ट का आदेश मानने में देरी क्यों की गयी. क्यों नहीं अंतरराष्ट्रीय नियामक संस्था को सूचित किया गया कि एक एथलीट का मामला कोर्ट में है. क्यों नहीं उस संस्था पर दबाव डाला गया. इस तरह के बहुत से छोटे-बड़े अनुत्तरित सवाल रह गये हैं, जो इधर सबके जेहन में आ रहे हैं. और इन सवालों के साथ ही प्राधिकरण की नीयत पर शक भी बन रहा है. और एक केंद्रीय सवाल भी उभर रहा है कि आखिर खेलों को लेकर देश में कितनी रेगुलेटरी बॉडी हैं. ये भी कि क्यों ना खेल मंत्रालय ही एकमात्र जिम्मेदार बॉडी बना दी जा़ये, जिसका फैसला अंतिम हो. इतनी सारी गलियां क्यों खेल के एक मैदान से निकाली गयी हैं. क्या ये खेल की भलाई के लिए है या अपना उल्लू सीधा करने के लिए. बेशक अलग अलग खेलों के लिए अलग अलग संघ होंगे लेकिन वे अपने अधिकारों में एकछत्र और स्वयंभू क्यों हैं. 

अगर हम चित्रा के प्रदर्शन की बात करें तो खबरों के मुताबिक महिलाओं की 1,500 मीटर रेस की रैकिंग लिस्ट में इस साल उनका नंबर 307वां हैं. उनका अपना बेस्ट 4:17.92 का है. एशिया में आठवां स्थान. लंदन के लिए क्वालिफाइंग पैमाना 4:07.50 का था. लेकिन फेडरेशन के पास इतना समय था कि वो उनके लिए लंदन का टिकट हासिल करा सकती थी या उन्हें सूचित कर सकती थी कि लंदन के लिए उनकी दौड़ की टाइमिंग कमतर है.

भारतीय एथलेटिक्स फेडरेशन के बारे में कहा जा रहा है कि उसने विश्व चैंपियनशिप के लिए जो भी घरेलू मानदंड निर्धारित किए थे उनमें झोल और असंतुलन था. वे खिलाड़ियों तक कम्यूनिकेट भी नहीं हो पाए थे. आगे ऐसी पेंचीदा और शर्मसार करने वाली और सवालिया स्थिति से बचना हो तो फेडरेशन को अपने खेल प्रबंधन को चुस्त और पारदर्शी बनाना होगा. इस बीच उसके लिए अदालती झंझट बढ़ गए हैं. पीयू चित्रा की ओर से केरल हाईकोर्ट में फिर से याचिका दाखिल करते हुए कहा गया है कि एएफआई ने अदालत का आदेश न मान कर अवमानना की है.

मायूस चित्रा को फिलहाल केरल सरकार ने स्कॉलरशिप और ट्रेनिंग भत्ता देने का फैसला किया है. सरकार की सदाशयता के बावजूद ये तो पूछा ही जाना चाहिए कि एक प्रतिभाशाली खिलाड़ी को दया और सहानुभूति का मोहताज क्यों बनना पड़ता है. ये कहना तो आसान है कि दौड़ अभी और होंगी और उन्हें अपना जीवट और हौसला बनाए रखना होगा लेकिन उस उम्मीद का क्या जो एक खिलाड़ी अपने सिस्टम के प्रति रखने लगता है कि आड़े वक्त में वो उसके काम आएगा. पीयू चित्रा को कठिन समय में खेल सिस्टम से मदद और समर्थन की दरकार थी. खेलों में प्रतिस्पर्धा तो अपरिहार्य है लेकिन राजनीति अस्वीकार्य होनी चाहिए.

विश्व पटल पर गिने चुने भारतीय खिलाड़ियों ने अपने प्रदर्शन से जो खास चमक बिखेरी है वो उनका नितांत निजी कौशल और जज्बा है, खेल प्रबंधन का उसमें कोई रोल नहीं. चाहे वो दीपा करमाकर हो या फोगाट बहनें या अभिनव बिंद्रा या पीवी सिंधु. आने वाले समय में पीयू चित्रा के सामने 1,500 मीटर का ट्रैक ही नहीं, एक ऐसी दौड़ को एक तय टाइमफ्रेम में पूरा करने का लक्ष्य भी होगा जो लगातार उनके धैर्य और साहस का इम्तेहान ले रही होगी. उन शक्तियों की शिनाख्त भी जरूरी है जो खिलाड़ियों के मनोबल पर हमला करती रहती हैं.

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