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दुनिया

प्रपंच नहीं है किसानों का ये संघर्ष

तमिलनाडु के आंदोलनकारी किसानों का जत्था, दिल्ली के जंतर मंतर में करीब डेढ़ महीने के एक असाधारण और अभूतपूर्व धरने के बाद लौट गया. लेकिन मांगे जस की तस हैं.

आंदोलनकारी किसान आश्वासन पर उठ तो गये हैं लेकिन नये आंदोलन की चेतावनी के साथ. आखिर किसानों को रह रह कर आंदोलनों के लिए क्यों विवश होना पड़ रहा है. वे या तो आत्महत्या का रास्ता चुनते हैं या आंदोलन का. और देश की एक खाती पीती अघायी हुई शहरी मध्यवर्गीय आबादी सोशल मीडिया में उनकी निंदा में मगन दिखती है. किसानों के प्रतिरोध को प्रपंच कहा जाता है और उनके तरीकों को वीभत्स. आंदोलन को एक फोटोशूट की संज्ञा देने वाले विशाल सोशल मीडिया समुदाय वाले देश में इस तथ्य का फिर कोई अर्थ नहीं रह जाता है कि 70 फीसदी आबादी गांवों में रहती है, खेती देश की अर्थव्यवस्था का एक बड़ा आधार है और सबके भरे हुए पेटों के लिए एक बिरादरी पीढ़ी दर पीढ़ी दिन रात मेहनत और कश्मकश में लगी रहती है.

सरकारी रिपोर्ट के मुताबिक 2004-05 और 2007-08 में कृषि सेक्टर की सालाना औसत वृद्धि दर पांच फीसदी थी. लेकिन 2008-09 और 2013-14 में ये गिर कर तीन फीसदी रह गयी. इन्हीं अवधियों में अर्थव्यवस्था में क्रमशः नौ और सात फीसदी की सालाना औसत वृद्धि दर्ज की गयी. कृषि की बदहाली का ठीकरा सिर्फ और सिर्फ खराब मौसम की स्थितियों पर फोड़ा गया है. अब हालत ये है कि आर्थिक वृद्धि और अर्थव्यवस्था में संरचनात्मक बदलावों के चलते कृषि और सहयोगी सेक्टरो का जीडीपी में योगदान 2004-05 में 19 फीसदी से घटकर 2013-14 में 14 फीसदी रह गया. और इसमें भी अगर फॉरेस्ट्री और फिशरीज को हटा दें तो कृषि का राष्ट्रीय जीडीपी में करीब 12 फीसदी का योगदान ही रह गया है.

दिलचस्प बात ये भी है कि राष्ट्रीय स्तर पर जीडीपी में कृषि योगदान निराशाजनक है, लेकिन राज्य स्तर पर आंकड़े कुछ अलग और ऊपर हैं. 13 राज्यों में कृषि का जीडीपी योगदान 20 फीसदी से ज्यादा का है. सबसे अधिक 30 फीसदी अरुणाचल प्रदेश में, 20-29 फीसदी आंध्र प्रदेश, उत्तर प्रदेश, बिहार, असम, पंजाब, मध्य प्रदेश, और झारखंड आदि में, 15-19 फीसदी हरियाणा, हिमाचल, झारखंड, पश्चिम बंगाल और कर्नाटक आदि में और 15 फीसदी से कम गुजरात, केरल, महाराष्ट्र, तमिलनाडु और उत्तराखंड में.

जाने माने कृषि वैज्ञानिक एमएस स्वामीनाथन की अगुवाई में 2004 में बने आयोग ने 2006 में अपनी पांचवी और आखिरी रिपोर्ट में किसानों के लिए फसल का न्यूनतम समर्थन मूल्य, आंकी गई उत्पादन की औसत लागत से कम से कम 50 फीसदी ज्यादा के स्तर पर तय करने की सिफारिश की थी. मजे की बात है कि 2014 में बीजेपी ने इसे अपने चुनावी घोषणापत्र में जगह भी दी थी लेकिन ये समर्थन मूल्य अब भी दूर की कौड़ी बना हुआ है. जबकि आयोग ने कहा था कि किसानों के पास उतनी टेक होम राशि आनी चाहिए, जितना किसी सिविल सर्वेंट को मिलती है.

आज देश के सकल घरेलू उत्पाद में कृषि का योगदान 15 फीसदी से भी कम रह गया है. औद्योगिकीकरण, शहरीकरण, सेवा क्षेत्र का विस्तार आदि बेशक नई आर्थिकी की अनिवार्यताएं बनती जा रही हैं लेकिन उस बड़ी वर्कफोर्स का क्या होगा जो कृषि में लगी है. गरीबी दूर करने के लिए खेती-किसानी छुड़ाने के विकल्प से पहले वर्ल्ड डेवलेपमेंट रिपोर्ट के उस आंकड़े को भी देख लेना चाहिए जो कहता है कि कृषि में एक प्रतिशत की वृद्धि भी गरीबी मिटाने में, गैर कृषि सेक्टरों में समान वृद्धि से कम से कम दो या तीन गुना ज्यादा असरदार है. अगर सरकार आठ फीसदी ग्रोथ वाली जीडीपी में कम से कम चार फीसदी की ग्रोथ कृषि सेक्टर में नहीं बनाए रख सकती तो कुल वृद्धि बेमानी है. यानी सार्वजनिक नीति में कहीं कोई गड़बड़ है. वो किसान केंद्रित होने से परहेज कर रही है. आखिर खराब मौसम, बेतहाशा मॉनसून को ही कब तक जिम्मेदार ठहराया जाता रहेगा. सिंचाई के उन्नत साधनों, जल प्रबंधन, कृषि बीमा, कृषि बाजार, फसल का बेहतर मूल्य, गांवों मे सड़क और बिजली आदि की समुचित व्यवस्था, कृषि तकनीक का विकास, बेहतर उर्वरक और ऋण सुविधा और अदायगी की आसान शर्तें - ये सब बातें एक प्रभावी नीति के लिए जरूरी हैं.

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के मुताबिक 2014 से 2015 के दरम्यान किसानों की आत्महत्या के मामले 40 फीसदी बढ़ गए. 2014 में 5,650 मामले आये तो 2015 में ये आंकड़ा 8,000 को पार कर गया. सबसे ज्यादा मौतें क्रमशः महाराष्ट्र, कर्नाटक, तेलंगाना और मध्य प्रदेश में दर्ज की गई हैं. महाराष्ट्र के मराठवाड़ा इलाके की दास्तान तो हिला देने वाली हैं जहां 2016 में पहले चार महीनों में ही 400 से ज्यादा किसानों ने फसल की बर्बादी, सूखे और कर्ज की बेइंताही में मौत को गले लगा लिया. 80 फीसदी आत्महत्या के मामले कर्ज न चुका पाने से जुड़े थे. ज्यादातर किसान बैंकों के कर्जदार थे. और ये सिलसिला पिछले दो या तीन साल का नहीं है. 2012 में 13,754, 2011 में 14,207 और 2010 में 15,963 किसानों ने आत्महत्याएं की. 1993 से 2013 की अवधि में करीब तीन लाख किसानों ने अपनी जान ली.

अफसोस है कि हर साल लाल किले से किसानों की जय जय इस देश में होती आ रही है लेकिन ऐसी कोई मुकम्मल और दीर्घकालीन योजना नहीं अमल में आ सकी जो किसानों को उनकी पुश्तैनी और समकालीन यातनाओं से निजात दिला सके. कृषि नीति किसान से दूर और कॉरपोरेट के ज्यादा करीब नजर आती है.

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