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दुनिया

प्रदूषण को कोसती दिल्ली की आबादी

दिल्ली की हवा लोगों की हवा निकाल रही है. जो लोग हर रोज महसूस कर रहे थे, उसकी अब वैज्ञानिक शोध में पुष्टि हुई है. दिल्ली की हवा हर दिन अपने 80 बच्चों को खा जाती है.

और कहीं कोई सुनने वाला न हो, सोशल मीडिया पर कोसने वालों की कमी नहीं. पिछले दिनों एक अमेरिकी पत्रकार ने एक ब्लॉग लिखकर दिल्ली की हवा की शिकायत की और सवाल पूछा कि क्या करियर के लिए बच्चों के स्वास्थ्य को नुकसान में डालना सही है. उसके बाद भी बहुत सारी टिप्पणी की गई थी. अब एक रिसर्च में खतरे का आयाम पता चला है.

हरिंदर बवेजा ने ट्वीट किया कि दिल्ली रहने लायक नहीं रह गई है. हवा प्रदूषित है, बिजली की कटौती और पानी की सीमित सप्लाई है.

एक्टिविस्ट वायु प्रदूषण की स्थिति में सुधार के लिए अभियान चला रहे हैं, लेकिन सरकार और प्रशासन सही कदम उठाने की स्थिति में नहीं लगते.

राजधानी दिल्ली की प्रदूषित हवा में हर कोई सांस ले रहा है, लेकिन किसी को गंभीरता का अहसास नहीं हो रहा. नेहा यादव की निराशा इस ट्वीट में झलकती है जिसमें उनका कहना है कि यदि मिलावटी खाना हमें नहीं मारता तो प्रदूषण और गाड़ी चलाते समय फोन करने वाले लोग हमें जरूर मार डालेंगे.

पर्यावरण अधिकारियों की तो बात छोड़ दें दिल्ली की गाड़ी रखने वाली जनता को भी नहीं लगता कि वे भी वायु प्रदूषण के लिए कुछ हद तक जिम्मेदार हैं. बिंदु शर्मा कहती हैं कि फिर भी दिल्ली वालों को पार्क से ज्यादा पार्किंग की जगह चाहिए.

और सुमंत सिंहा का कहना है कि बहुत से लोग प्रदूषण की बात करने लगे हैं लेकिन न दिल्ली सरकार और न केंद्र की ओर से कोई व्यापक योजना आई है.

मलय नायक की शिकायत है कि दिल्ली में प्रदूषण के खिलाफ हो हल्ला मचाने वाले वही लोग हैं जो भूमि सुधार, मेक इन इंडिया और वनों के कटने की तारीफ करते हैं.

कुल मिला कर दिल्ली की पूरी आबादी प्रदूषण की समस्या से परेशान दिख रही है.

एमजे/आईबी

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