1. Inhalt
  2. Navigation
  3. Weitere Inhalte
  4. Metanavigation
  5. Suche
  6. Choose from 30 Languages

दुनिया

प्रदर्शन के पीछे सामाजिक विसंगति

जर्मनी में इस्लाम विरोधी पेगिडा आंदोलन मजबूत होता दिख रहा है. समाजशास्त्री ओलिवर नाख्तवाय का कहना है कि वे इसकी एक वजह राजनीतिक दलों में देखते हैं और चेतावनी देते हैं कि गलत प्रतिक्रिया न दिखाई जाए.

डॉयचे वेले: कुछ हफ्तों पहले इस्लाम विरोधी पेगिडा संगठन एक छोटा से फेसबुक ग्रुप हुआ करता था. पिछले हफ्ते ड्रेसडेन में उसने 10,000 लोगों को इकट्ठा कर लिया. इसकी व्याख्या किस तरह हो सकती है?

ओलिवर नाख्यवाय: दो तरह की व्याख्या है - जो एक दूसरे के पूरक हैं. पहला यह कि समाज के मध्य में एक नया मुस्लिम विरोधी नस्लवाद है, जिसका आधार पश्चिम के मूल्यों के लिए चिंता है. यह एक नर्वस समाज की उपज है, जिसमें तरक्की मुश्किल होती जा रही है और लोगों के मन में भावना है कि हर कहीं संघर्ष और प्रतियोगिता है. इससे पैदा होने वाला प्रभाव व्यवस्था के खिलाफ नहीं बल्कि पराए के खिलाफ मोड़ा जा रहा है. इसे राजनीति की ओर से भी उछाला जाता है और जनता इसे पकड़ लेती है. पिछले हफ्ते ही सीएसयू पार्टी ने प्रस्ताव रखा था कि विदेशियों को घर पर जर्मन भाषा बोलनी चाहिए. दूसरी व्याख्या यह है कि राजनीतिक दल और बड़ी संस्थाएं लोगों का सचमुच प्रतिनिधित्व नहीं कर रही हैं. चूंकि डर और आशंका की अभिव्यक्ति के रास्ते खो गए हैं. नीचे से विरोध आंदोलन पैदा हो रहे हैं, जो कभी वामपंथी होते हैं, जैसे ऑकुपाई आंदोलन, तो कभी दक्षिणपंथी, जैसे पेगिडा आंदोलन.

डर की अभिव्यक्ति के कौन से रास्ते बंद हो गए हैं?

बड़ी लोक पार्टियों में यूरो जैसे मुद्दों पर कहां बड़ा अंतर रह गया है? यहां तक कि न्यूनतम वेतन पर भी उनमें सहमति है. पहले पार्टियां इसलिए थीं कि वे समाज के वामपंथी और दक्षिणपंथी विचारधारा को संगठित करें, और उन्हें संसदीय रास्ते की ओर ले जाएं और उन्हें सुसभ्य बनाएं. इस बीच पार्टियां यह काम नहीं कर रही हैं.

क्या यह इस बात की अभिव्यक्ति नहीं है कि कुछ समुदाय भंग हो गए हैं और समाज का ध्रुवीकरण कम हुआ है?

यह कुछ हद तक सही है. परंपरागत समुदाय जैसे कामगार वर्ग, मध्यवर्ग या धार्मिक अंतर उस तरह से नहीं बचे हैं. पार्टियों में भी इसकी अभिव्यक्ति दिखती है. खास कर पार्टियों की संरचना में एक जैसे सामाजिक वर्ग दिखते हैं. अगर आप उसकी बीच की संरचना को देखें तो उसमें आम तौर पर मध्यवर्गीय परिवारों के बच्चे दिखेंगे, जिन्होंने पढ़ाई की है और राजनीति में अपनी तरक्की खोज रहे हैं. और आपकी दलील कुछ हद तक इसलिए सही है कि 90 के दशक से जर्मन समाज में विषमताएं बढ़ रही हैं, एक तरह का निम्न वर्ग पैदा हो रहा है. एक ये सेंट्रीफ्यूगल ताकतें मजबूत हो रही हैं और पार्टियां मध्य की ओर बढ़ रही हैं.

कौन से लोग पेगिडा की ओर आकर्षित हो रहे हैं?

दुर्भाग्य से अब तक इसका समाजशास्त्री अध्ययन नहीं हुआ है. मुझे लगता है कि यह लोगों का एक ऐसा समुदाय है, निचले मध्यवर्ग और कुशल मजदूरों तथा ऊपरी मध्यवर्ग के लोगों का एक सहबंध. प्रतिक्रिया में कदम उठाने वाला यह सहबंध मध्यवर्ग से आता है, इसकी वजह यह है कि नाराजगी भी वहीं से आ रही है. बीलेफेल्ड के समाजशास्त्री विल्हेल्म हाइटमायर का लंबे समय वाला अध्ययन दिखाता है कि खास कर मध्यवर्ग में अल्पसंख्यकों के खिलाफ नाराजगी बढ़ी है.

क्या पेगिडा में राष्ट्रीय आंदोलन बनने की क्षमता है?

हमने जो ड्रेसडेन में देखा है वह एक आंदोलन का प्रभावशाली प्रदर्शन है, जो कई जगहों पर संगठित हुआ है. खास कर नॉर्थराइन वेस्टफेलिया में कई पहलकदमियां है जो इस्लाम के खिलाफ बनी हैं. अब तक राजनीतिक दलों का मोर्चा नहीं बना है क्योंकि नागरिक के रूप में लोग उग्र दक्षिणपंथी एनपीडी और नाजियों को अत्यंत असभ्य मानते हैं. उसमें लोग शामिल नहीं होना चाहते. लोग प्रतिष्ठान का हिस्सा बने रहना चाहते हैं, वे कहते हैं कि हम यूरोपीय हैं, हम दरअसल शांतिवादी हैं. लोग दक्षिण से राजनीतिक व्यवस्था के मध्य पर निशाना साध रहे हैं. इसलिए इस बात का खतरा है कि पार्टियां उसका सहारा लें. यूरो विरोधी एएफडी के बैर्न्ड लुके ने फेसबुक पर पेगिडा का स्वागत किया है. लुके अपनी पार्टी के उस धरे के हैं जो खुद को उदारवादी दिखाते हैं. खतरा इस बात का है कि पार्टी मुस्लिमविरोधी नस्लवाद का सहारा ले ले.

सैक्सनी के मुख्यमंत्री ने पेगिडा के समर्थकों के साथ संवाद का पक्ष लिया है. आपकी क्या राय है?

मैं ऐसे लोगों के साथ संवाद की कोशिश को मुश्किल समझता हूं, जो नाराजगी से संचालित हैं. प्रदर्शन में दी गई दलीलों का जवाब देना होगा और खुलकर उसकी आलोचना करनी होगी, एक अभियान चलाना होगा. लेकिन मैं इसे गलत मानता हूं कि यह कह कर पेगिडा का दर्जा बढ़ाया जाए कि हम बातचीत की कोशिश कर रहे हैं.यदि आप यह देखें कि पेगिडा का नेतृत्व एक अपराधी और विफल धन्नासेठ कर रहा है, तो यह सवाल उठना चाहिए कि इस समुदाय से क्या खतरे हैं, जिसमें नाराजगी को समाज के मध्य में संगठित किया जा सकता है. सिविल सोसायटी को दोहरी रणनीति अपनानी चाहिए. प्रदर्शनों का खुला विरोध और खुली चर्चा जिसमें इस्लाम से नाराजगी मुद्दा हो और उसे सहा न जाए.

ओलिवर नाख्तवाय डार्मश्टाट टेक्निकल यूनिवर्सिटी में समाजशास्त्री हैं और सामाजिक आंदोलनों के विशेषज्ञ हैं.

DW.COM