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ब्लॉग

प्रकृति को निगलती इमारतें

विकासशील देशों के लिए तरक्की के उदारवादी माडल को अपनाना दोधारी तलवार पर चलना साबित हो रहा है. विकास का पहिया न थमे और कुदरत को भी नुकसान न हो, यह बड़ी चुनौती है.

पिछले दो दशक का अनुभव बताता है कि विकास और प्रकृति के बीच तालमेल कायम करना नामुमकिन नहीं है बशर्ते कि इसके लिए तय मानकों का ईमानदारी से पालन किया जाए. भारतीय व्यवस्था में गहराई से जड़ जमा चुके भ्रष्टाचार की वजह से मानकों का ईमानदारी से पालन करने की शर्त ही राह का रोड़ा साबित हो रही है. बात चाहे प्राकृतिक संसाधनों के अंधाधुंध दोहन से जुड़े अवैध खनन की हो या नदी, पहाड़ और जंगलों पर माफियाराज की, पूरे देश में कुदरत का सामूहिक शोषण किसी की नजर से बचा नहीं है.

आइना दिखाती हकीकत

चुस्त दुरुस्त शासन, प्रशासन और कायदे कानूनों के पालन के लिए राजधानी दिल्ली दूसरे राज्यों की तुलना में कुछ बेहतर मानी जाती है. हाल ही में उपग्रह तस्वीरों के जरिए राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली में हरियाली को लीलते कंक्रीट के जंगलों की हकीकत पेश करती एक रिपोर्ट ने पर्यावरणविदों की चिंता बढ़ा दी है. यह बात दीगर है कि सरकार और संबद्ध विभागों के जिम्मेदार अफसर अभी भी सरकारी आंकड़ों के भरोसे अपनी पीठ थपथपा कर हकीकत से मुंह मोड़ रहे हैं.

सरकार की एजेंसी नेशनल रिमोट सेंसिंग सेंटर ने अपने तरह की यह पहली अध्ययन रिपोर्ट जारी की है. उपग्रहों से भेजी जा रही तस्वीरों का लगातार अध्ययन करने वाली इस एजेंसी की रिपोर्ट के मुताबिक पिछले 13 सालों में दिल्ली ने अपने कुल क्षेत्रफल का लगभग एक चैथाई हरित क्षेत्र तेजी से हो रहे शहरीकरण और विकास कार्यों के नाम भेंट चढ़ा दिया है. दिल्ली के संतुलित विकास के लिए गठित एनसीआर प्लानिंग बोर्ड की पहल पर किए गए इस अध्ययन में विकास के नाम पर कुदरत के साथ हो रहे भयंकर अन्याय की हकीकत उजागर की गई है.

प्रकृति और समाज पर दोहरा असर

रिपोर्ट के अनुसार सन 1999 से 2012 के बीच 14 हजार वर्ग किमी क्षेत्रफल वाले इस विशाल भूभाग ने 23 प्रतिशत हरित क्षेत्र हमेशा के लिए गंवा दिया है. इसमें 32.7 हजार हेक्टेयर में फैले जंगल और 1.4 हजार हेक्टेयर इलाके में मौजूद जलाशय शामिल हैं. पर्यावरणविद एसए नकवी कहते हैं कि यह सिर्फ कुदरत का नहीं बल्कि सामाजिक नुकसान भी है क्योंकि नष्ट हुए जंगल और जलाशयों पर समाज का एक बड़ा तबका आश्रित था. ग्रामीण इलाकों में रहने वाले इन लोगों में एक तो वे लोग हैं जिनकी खेती की जमीनों को मोटे मुआवजे का लालच देकर बिल्डर्स ने खरीद लिया और दूसरे वे निचले तबके के लोग हैं जिनकी आजीविका जंगल या जलाशयों पर ही टिकी थी. नकवी कहते हैं कि वित्तीय प्रबंधन से अनभिज्ञ किसान भारी भरकम मुआवजे की रकम का सदुपयोग करने के बजाय शानदार कोठी और मंहगी गाडि़यों पर खर्च कर बैठे. जबकि जल जंगल पर आश्रित तबका अब बिल्डर्स के रहमोकरम पर गुजर बसर के लिए मजबूर हो गया है.

नियम हैं पर पालन कौन करे-

ऐसा नहीं है कि भारत में पर्यावरण से जुड़े मानक नहीं हैं. हर छोटे बड़े काम को लेकर बाकायदा नियम कानून हैं लेकिन भ्रष्टाचार के आगे ये सब बौने साबित हो रहे हैं. रिपोर्ट कायदे कानूनों के साथ हो रहे खिलवाड़ की हकीकत भी उजागर करती है. इसके अनुसार भूउपयोग यानी लैंडयूज में बदलाव ही बिल्डर्स और भूमाफियाओं के इस खेल का सबसे बड़ा हथियार साबित हो रहा है. रिपोर्ट के मुताबिक पूरे एनसीआर में पिछले 13 साल में इस कदर लैंडयूज बदला गया कि इस क्षेत्र का बिल्टअप एरिया अर्थात भवन निर्माण क्षेत्र में 34 प्रतिशत का इजाफा हुआ है. इस अवधि में कुल 95.8 हजार वर्ग हेक्टेयर जमीन पर नई इमारतें बनाई जा चुकी हैं. ज्ञात हो कि तरक्की के नाम पर चल रहे इस अंधाधुध कारोबार से सिर्फ दिल्ली ही नहीं बल्कि एनसीआर में शामिल उत्तर प्रदेश, हरियाणा और राजस्थान भी प्रभावित हुए हैं.

उत्तर प्रदेश नुकसान में अव्वल

दरअसल यह खेल बिल्डर्स, भूमाफिया और नेताओं के मजबूत गठजोड़ के बलबूते चल रहा है. इस गठजोड़ की मजबूती का कारण यह है कि इसमें शामिल इन तीनों किरदारों को किसी न किसी रुप में एक ही व्यक्ति निभाता है. बिल्डर और भूमाफिया ही आज के नेता हैं इसलिए इनके लिए नियमों को ताक पर रखकर अपनी मर्जी के मुताबिक जमीन का उपयोग बदलना बेहत आसान काम है. रिपोर्ट के मुताबिक एनसीआर में सर्वाधिक 17.3 हजार वर्ग हेक्टेयर हरित क्षेत्र गंवाने वाला उत्तर प्रदेश अव्वल है. एनसीआर में दिनोंदिन बढ़ते कंक्रीट के जंगल के लिए विख्यात हो रहे नोएडा में अवैध खनन की मुखालफत करने वाली एक प्रशासनिक अधिकारी का निलंबन राज्य सरकार की कुदरत को नुकसान पहुंचाने की प्रतिबद्धता को साबित करता है.

हालांकि दिल्ली को सबसे कम 733 वर्ग हेक्टेयर हरित क्षेत्र का नुकसान हुआ है लेकिन राजधानी में जंगल और हरियाली के विस्तार संबंधी सरकार के दावों की हकीकत भी अब सामने आ गई है. दिल्ली को हुए सबसे कम नुकसान की सच्चाई यह भी है कि दिल्ली में जमीन का अभाव है और नए निर्माण के लिए संभावनाएं बेहद सीमित रह गई हैं.

दिल्ली के लिए खतरे की घंटी

रिपोर्ट के अनुसार दिल्ली का हरित क्षेत्र भले ही कम नष्ट हुआ हो लेकिन जलाशयों की मजबूत विरासत वाले इस शहर में पानी का संकट भविष्य के लिए खतरे की घंटी है. रिपोर्ट बताती है कि दिल्ली के लगभग 600 जलाशय कालांतर में खत्म हुए हैं. सबसे ज्यादा नुकसान यमुना के आसपास जारी अनियंत्रित विकास कार्यों से हो रहा है. पानी की कमी से प्यासी दिल्ली के सामने भूकंप का खतरा भी इस अनदेखी से जुड़ा है. पहले से ही भूकंप के लिहाज से बेहद संवेदनशील जोन में शामिल दिल्ली में यमुना रिवरबेड में हो रहा निर्माण कार्य भविष्य में किसी भी भूकंप में ढह सकता है. बिल्डर लॉबी जानती है कि इसका खामियाजा भोली भाली जनता को ही भुगतना होगा क्योंकि इनका काम सिर्फ इमारतें खड़ी करना है आपदा आने तक ये लोग उससे दूर होंगे.

जिम्मेदार कौन

व्यवस्था को चेतावनी देने वाली यह एकमात्र रिपोर्ट नहीं है. इस तरह की तमाम रिपोर्टें सरकारी फाइलों में दबी पड़ी हैं. सवाल इस बात का है कि क्या इस कुचक्र के लिए सिर्फ नेताओं को कोसना ही पर्याप्त होगा. भूलना नहीं होगा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में किसी भी तरह के नफा नुकसान की पहली जिम्मेदारी जनता की होती है. निजी हित सामने रखकर अपने प्रतिनिधि चुनने वाली जनता भी खुद को निर्दोष नहीं मान सकती. कुल मिलाकर ऐसी रिपोर्ट यह अनुमान लगाने में मददगार जरुर साबित होती है कि अगर देश की राजधानी में प्रकृति के साथ छेड़छाड़ का यह आलम है तो बाकी इलाकों में स्थिति क्या होगी.

ब्लॉगः निर्मल यादव, दिल्ली

संपादनः एन रंजन

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