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विज्ञान

पौधों पर आधारित केमिकल उद्योग

पेंट, प्लास्टिक और दवाइयां, क्या ये सभी चीजें बिना कच्चे तेल के, पौधों से बन सकती हैं? एक हरे भरे केमिकल उद्योग वाले भविष्य का सपना आंखों में लिए हैं केमिस्ट हरमन फिशर.

कच्चे तेल की कीमत लगातार बढ़ती जा रही है. केमिकल उद्योग के लिए यह बड़ी चुनौती है क्योंकि इस उद्योग में उत्पादन के लिए पेट्रोलियम की आवश्यकता मुख्य होती है. हरमन फिशर का कहना है कि इसे बदला जा सकता है. उनके मुताबिक पौधों से प्राप्त किया गया बायोमास भविष्य में कच्चे तेल की जगह ले सकता है.

जर्मनी के ब्राउनश्वाइग में फिशर की कंपनी 'ऑरो' ने 1983 में नैचुरल पेंट बनाना शुरू किया. कंपनी पौधों और खनिजों की मदद से पेंट बनाती है. उनकी कंपनी इससे सत्तर लाख यूरो का सालाना कारोबार कर रही है.

Herrman Fischer AURO

फिशर की कंपनी पौधों और खनिजों की मदद से पेंट बनाती है.

फिशर कहते हैं कि ऑरो के उत्पादों में कच्चे तेल, प्राकृतिक गैसों या कोयले से मिले किसी तरह के रसायनों का इस्तेमाल नहीं हो रहा है. उदाहरण के तौर पर पीले रंग में रेसेडा पौधे का अर्क इस्तेमाल हो रहा है. यह पूर्वी जर्मनी में थुरिंजिया में पैदा होता है. इसके अलावा इसमें एलुमिनियम ऑक्साइड है.

कभी न खत्म होने वाला स्रोत

फिशर के मुताबिक, "कच्चे तेल, प्राकृतिक गैस और कोयले के बगैर दुनिया भर की केमिकल फैक्ट्रियों को जितने बायोमास की जरूरत हो सकती है, प्रकृति हर साल उससे कहीं ज्यादा पैदा करती है." कुछ निर्माता पहले ही अन्य उत्पादों में बायोमास का इस्तेमाल कर रहे हैं. उदाहरण के लिए चिपकाने के पदार्थ और डिटर्जेंट बनाने के लिए. पहले के मुकाबले इन दिनों प्लास्टिक बैग और पैकिंग के लिए भी कई कंपनियों में विघटनशील पोलीलैक्टिक एसिड का इस्तेमाल हो रहा है.

लैपटॉप और सेलफोन के कवर जैसी चीजें भी आमतौर पर प्लास्टिक से बनाई जाती हैं. फिशर ने बताया कि भांग के पौधे, पटसन और लकड़ी का बुरादा भी उतने ही अच्छे ऊष्मारोधी हैं जितने कि कच्चे तेल से बने स्टाइरोफोम या पोलीयुरीथेन. यहां तक कि लुब्रिकेशन के लिए लगने वाला ऑइल भी पौधों से बनाया जा सकता हैं. उनका दावा है कि पारंपरिक ऑइल के मुकाबले ये कम और ज्यादा तापमान से बेहतर तरीके से निबट सकते हैं.

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जैव प्लास्टिक से बोतलें बनाई जा सकती है.

बेहतर भविष्य

हालांकि अभी भी पौधों से मिलने वाले बायोमास की बाजार में वैसी जगह नहीं बन पाई है जैसी कि पारंपरिक तेलों की है. प्राकृतिक स्रोतों से रसायनों को ज्यादा मात्रा में बनाने के लिए अभी और रिसर्च की जरूरत है. लेकिन फाइटोकेमिस्ट्री का भविष्य निश्चित ही अच्छा है. तमाम यूनिवर्सिटी और उद्योगों में इस पर रिसर्च हो रहा है कि गेहूं जैसे अनाज या लकड़ी के लिग्निन फाइबर से कैसे कीमती उत्पाद बनाए जाएं.

फिशर इस दलील से सहमत नहीं हैं कि पौधों के उद्योग में इस्तेमाल से अफ्रीका, एशिया और लैटिन अमेरिका जैसे देशों में भुखमरी बढ़ेगी. वह कहते हैं लोग इसका कुछ हिस्सा ही खाने में इस्तेमाल करते हैं. उनका कहना है कि लिंसीड तेल निकालने के लिए पटसन के बीज के इस्तेमाल में पटसन पौधे का केवल दो फीसदी ही इस्तेमाल होता है. पटसन से इंसुलेटिंग फाइबर, लीनोलियम फर्श के लिए तेल और प्रोटीन से भरपूर खाद्य मिलता है. फिशर कहते हैं कि इतने उपयोगी पौधे का इस्तेमाल करना चाहिए.

हालंकि वह बायोमास के दूसरी तरह के इस्तेमाल की आलोचना भी करते हैं. कई केमिकल कंपनियां बची खुची टूटी लकड़ी से ऑर्गेनिक रिफाइनरियों में केमिकल बनाने की कोशिश कर रही हैं. लेकिन यह ठीक नहीं है. फिशर मानते हैं कि इससे नए तरह का पेट्रोकेमिकल मिलेगा जो पौधे से बना है.

वह कहते हैं, "प्राकृतिक सौर ऊर्जा का इस्तेमाल करके पौधों से जटिल संरचना तैयार करना, उन्हें नष्ट करना और जटिल संरचना तैयार करने के लिए भारी मात्रा में ऊर्जा खर्च करना, बेवकूफी है."

कम खर्च से ज्यादा फायदा

हरमन फिशर मानते हैं कि मौजूदा केमिकल कंपनियों में उनका सपना जल्द साकार नहीं हो सकता, इसमें समय लगेगा. लेकिन उन्हें भविष्य के लिए अपने तरीके को लोगों को समझाना और उन्हें अपनी बात पर राजी करने में मजा आ रहा है.

उनका एक ही मकसद है, भविष्य में कम खर्च में समान प्रभाव हासिल करना. उदाहरण के लिए फेंके जा सकने वाले कई प्लास्टिक उत्पाद अगर प्राकृतिक फाइबर से बनाए जाएं तो ज्यादा दिनों तक इस्तेमाल किया जा सकेंगे.

रिपोर्ट: राल्फ आहरेंस/ एसएफ

संपादन: आभा मोंढे

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