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दुनिया

पोस्टवॉर ऑर्डर को हिला देने वाले डॉनल्ड ट्रंप

वक्त आ गया है कि या तो यूरोप मजबूती से साथ आए या फिर नए अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप की नजरअंदाजी झेलने को तैयार रहे, ऐसा मानना है कई विशेषज्ञों और राजनैतिक विश्लेषकों का. नाटो के अस्तित्व और भूमिका को लेकर वे आशावादी हैं.

पोस्टवॉर वर्ल्ड यानि 1945 में दूसरे विश्व युद्ध के बाद से पिछले 70 सालों से जारी शांति का श्रेय काफी हद तक पश्चिमी देशों की ट्रांसअटलांटिक पार्टनरशिप को भी दिया जाता है. नए अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप का नाटो को "पुराना" मानना और यूरोपीय संघ को बांटने का समर्थन करना, अब तक वॉशिंगटन के करीबी रहे देशों में चिंता की लहर दौड़ा रहा है.

यूरोप फिलहाल कई तरह की समस्याओं से घिरा है. ब्रिटेन के ईयू से निकलने की प्रक्रिया, रूस के साथ तीखा गतिरोध, मध्य पूर्व में संकट और दूसरे विश्वयुद्ध के बाद से पैदा हुआ सबसे बड़ा शरणार्थी संकट कुछ सबसे बड़े मुद्दे हैं. कई राजनैतिक विश्लेषक और आर्थिक विशेषज्ञ अब आशंका जता रहे हैं कि इन सब के बीच घिरे यूरोप को शायद अब सुरक्षा पर और खर्च करना पड़ सकता है. मजबूत अमेरिकी समर्थन और साझेदारी के कारण कई दशकों से सुरक्षा यूरोप का सिरदर्द नहीं था.

'कार्नेगी यूरोप' के लिए विश्लेषक श्टेफान लेने ने लिखा है, "अगर ईयू के नेता एक साथ आने और पहले से कहीं ज्यादा ऊंचे स्वर में मिलकर अपनी बात रखने में असफल रहते हैं, तो उन्हें दरकिनार किए जाने का खतरा बना रहेगा." इस खतरे पर वह और विस्तार से बताते हैं, "ये नौबत भी आ सकती है कि वॉशिंगटन यूरोप से कोई वास्ता ही ना रखे और हर यूरोपीय देश से अलग अलग डील करे. और जब भी कोई नेता ट्रंप के एजेंडा का विरोध करे, तो उनकी सरकार एक यूरोपीय देश को दूसरे के आमने सामने खड़ा कर दे."

हाल ही में जर्मनी और फ्रांस की अगुआई में ईयू रक्षा योजना बनाने की दिशा में काफी काम हुआ है. ईयू में अंतराष्ट्रीय समन्वय बढ़ाने और साझे तौर पर हथियारों की खरीद की इस योजना से रक्षा खर्च कम करने और एकता बढ़ाने का लक्ष्य है.

ईयू की विदेशी मामलों की प्रमुख फेडेरिका मोघेरिनी ने यूरोपीय संघ के "स्ट्रैटिजिक ऑटोनॉमी" हासिल करने के लिए ग्लोबल रणनीति बनाने पर जोर दिया है. इसके साथ साथ वे नाटो के साथ सहयोग बढ़ाने की भी पक्षधर हैं. यूरोपीय संघ के 28 में से 22 देश नाटो के सदस्य हैं. इनमें से ब्रिटेन समेत कुछ और देशों का भी मानना है कि ब्रसेल्स नहीं बल्कि अमेरिकी-नेतृत्व वाला गठबंधन ही रूस जैसे प्रतिद्वंदियों के खिलाफ खड़े होने का माद्दा रखता है.

ऐसे में अगर ट्रंप के कार्यकाल में नाटो यूरोपीय देशों की मदद के लिए आगे ना आए तो क्या विकल्प हैं? कई विश्लेषक ट्रंप के नाटो पर दिए बयान को दूसरे तौर पर समझा रहे हैं. उनका मानना है कि ट्रंप का आशय आतंकवाद से निपटने में नाटो के बेअसर साबित होने से था और वे खुद भी उसके महत्व को समझेंगे.

ट्रंप ने नाटो के सदस्य देशों से नाटो बजट में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने और जीडीपी का 2 प्रतिशत धन मुहैया कराने की मांग को दोहराया है. जर्मनी ने 2017 में अपनी रक्षा बजट राशि में दो अरब यूरो बढ़ाकर करीब 37 अरब यूरो करने की घोषणा की है. फिर भी यह राशि नाटो के वांछित लक्ष्य से काफी कम, केवल 1.2 फीसदी होगी.

नाटो प्रमुख येन्स श्टोल्टेनबर्ग ने बताया है कि नाटो पर कई राज्य-प्रायोजित साइबर हमले कराए जा रहे हैं. इसी के साथ उन्होंने नाटो सदस्यों को अपनी ऑनलाइन रक्षा क्षमताएं बढ़ाने को भी कहा है. उन्होंने बताया, "2015 के मुकाबले एक साल में साइबर हमलों में करीब 60 फीसदी की बढ़त आई है."  इस पर गहरी चिंता जताते हुए उन्होंने कहा कि साइबर डिफेंस अगले नाटो सम्मेलन का अहम मुद्दा होगा.

ब्रिटेन, फ्रांस और जर्मनी समेत कई पश्चिमी देश साइबर हमलों के आई तेजी को देखते हुए इससे निपटने पर विशेष ध्यान दे रहे हैं. नाटो प्रमुख ने बताया है कि वे ट्रंप के साथ काम करने को लेकर आशावादी हैं और उन्हें विश्वास है कि "अमेरिका नाटो में दी गई अपनी सुरक्षा गारंटियों को लेकर पूरी तरह समर्पित रहेगा."

आरपी/ओएसजे (एएफपी, एपी)

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