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खेल

पेशेवर खिलाड़ी का चोटिल सपना

12 साल की उम्र में टिमो हाइन्से बायर्न के लिए खेलने आए और 11 साल तक इस टीम में रहे. लेकिन पेशेवर खिलाड़ी बनने के बड़े लक्ष्य के ठीक पहले एक चोट ने उनका सपना भंग कर दिया. इस बारे में वह अपनी किताब में लिखते हैं.

टीमो हाइन्से कहते हैं कि अपने पुराने साथी से जलन उन्हें नहीं हुई. शुरुआत में फुटबॉल मैच देखना उनके लिए बहुत मुश्किल था. अब तो अपने साथी माट हुमेल्स या थोमास मुलर को जब वह खेल में देखते हैं तो उन्हें खुशी ही होती है. टिमो उनके खेल के फैन हैं. "उस समय मैं नहीं कह सकता कि वो लोग वहां पहुंच गए और मैं नहीं पहुंच सका. बिना किसी जलन के उस समय समझना ही होगा कि वह वहां पहुंचे क्योंकि उन्होंने इसके लिए मेहनत की है."

राष्ट्रीय टीम के इन दोनों खिलाड़ियों के साथ किशोर हाइन्से बायर्न म्यूनिख में खेलते थे. 11 साल तक उनके सामने बड़ा लक्ष्य था कि वह राष्ट्रीय टीम में पहुंच जाएं. वह ए युगेंड टीम के साथ जर्मन मास्टर बने और शौकिया टीम के कप्तान भी थे. किशोर खिलाड़ी के तौर पर वह कई राष्ट्रीय टीमों में भी रहे. लेकिन जब उन्होंने पेशेवर टीम में जाने के लिए ट्रेनिंग शुरु की उसी दौर में उन्हें चोट आ गई. एक साल तक वह नहीं खेल सके. फिर एक और साल उन्हें फॉर्म में लौटने में लगा. वह बुंडेसलीगा में भी नहीं आ पाए और बायर्न म्यूनिख की टीम से भी उन्हें बाहर निकाल दिया गया. वह एक ऐसे चक्र में फंसकर नीचे जाते जा रहे थे कि वह उससे आजाद ही नहीं हो पा रहे थे.

ताकतवर दिमाग

इस सबका कारण क्या इस बारे में हाइन्से आज भी नहीं कह सकते. कई फैक्टर एक साथ काम कर रहे थे. "चोट के कारण तो मैं पीछे हुआ ही क्योंकि यह बहुत अहम दौर में हुआ. ट्रेनर के साथ भी आखिरकार उतना अच्छा संबंध नहीं रहा. उन्होंने मुझे अलग कर दिया. इससे मुझे आश्चर्य हुआ. और यह भी कि इस चोट से उबर ही नहीं पाया."

जर्मन स्पोर्ट कॉलेज के खेल मनोचिकित्सक येन्स क्लाइनर्ट कहते हैं कि एक खिलाड़ी की दिमागी हालत का बुरा असर खिलाड़ीयों पर पड़ता है. वह चोट के इतिहास का पैटर्न जानते हैं. क्लाइनर्ट कहते हैं कि चोट एकदम सामान्य घटना है. हर खिलाड़ी कभी न कभी चोटिल होता है. "जियोवानी एल्बेर ने एक बार बहुत अच्छा लिखा था, कि आखिरकार अच्छे और बुरे में फर्क तब दिखाई पड़ता है जब वह चोट से दो चार हो रहे होते हैं. न कि इस बात से कि वह कितना अच्छा फुटबॉल खेलते हैं." मनोचिकित्सक इसकी पुष्टि करते हैं. " सामाजिक परिवेश और डॉक्टरों की बड़ी भूमिका होती है. जब मैं सुनता हूं कि एक खिलाड़ी एक डॉक्टर से दूसरे, दूसरे से तीसरे डॉक्टर के पास जा रहा है तो मेरे दिमाग में चेतावनी की घंटी बज जाती है. इसका मतलब है कि वह व्यक्ति एकदम अनिश्चय की स्थिति में है."

मेहनत और किस्मत

असमंजस होता है. डर पैदा होता है. डॉर्टमुंड के माट हुमेल्स इसे अच्छे से समझते हैं. वह भी एक बार इस स्थिति में पहुंचे थे. उन्हें भी नहीं पता था कि उनका आगे क्या होगा. हुमेल्स बायर्न से डॉर्टमुंड आए. " स्कूली पढ़ाई बीच में छोड़ने और डॉर्टमुंड आने के समय भी मैं असमंजस में था कि क्या यह सही फैसला है. कई बार आपको जोखिम उठाना पड़ता है. मुझे खुशी है कि यह सही रास्ता था." हाइन्से की किताब को हुमेल्स बहुत अच्छी मानते हैं क्योंकि यह फुटबॉल की अजीबोगरीब दुनिया दिखाती है. और दिखाती है कि कितनी जल्दी चीजें होती हैं. इस किताब से माट हुमेल्स याद करते हैं कि हर दिन का अच्छा होना कितनी बड़ी बात होती है.

टिमो हाइन्से अपने करियर के सात मिनट कभी नहीं भूल सकते जब ऑलिवर कान के आखिरी दिन 80 हजार लोगों के सामने वह कान की जगह आए. यह हमेशा उन्हें याद रहेंगे. हाइन्से ने अपने अनुभवों को "नाखश्पीलजाइट- आइने उनफोलएंडेटे करियरे" यानी एक्स्ट्रा टाइम- एक अपूर्ण करियर में लिखा है. कई फुटबॉल खिलाड़ियों ने प्रतिक्रिया दी कि उन्होंने पूरी भावनाएं इस किताब में लिख दी हैं. हाइन्से ने स्पोर्ट्स कॉलेज में दाखिला लिया है. वह खेल मनोचिकित्सक बनने की दिशा में आगे बढ़ना चाहते हैं और दूसरे लोगों के उस सपने को पूरा करना चाहते हैं जो उनके जीवन में अधूरा रह गया.

रिपोर्टः ओलिविया फ्रिट्ज/एएम

संपादनः मानसी गोपालकृष्णन

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