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खेल

पेनाल्टीः कितनी ट्रिक, कितना खेल

सिर्फ 11 मीटर की दूरी. कोई डिफेंडर नहीं. गोलकीपर अपनी लाइन छोड़ नहीं सकता. यह पेनाल्टी है. ऐसे में भी भला गोल क्यों न हो. लेकिन कई बार ऐसा हो जाता है, वजह क्या है..

सबसे बड़ी वजह है तनाव. किक लेने वाले को पता होता है कि उसका अगला किक उसे अपने देश में हीरो भी बना सकता है और विलेन भी. वर्ल्ड कप जब नॉकआउट मुकाबलों में जाता है तो कई मैचों का नतीजा पेनाल्टी से निकलता है और तब मनोवैज्ञानिकों के लिए भी एक परीक्षा होती है.

नॉर्वे के स्पोर्ट्स स्कूल के प्रोफेसर गायर योरडेट का कहना है कि पेनाल्टी शूट से खिलाड़ी "अपंग" जैसा महसूस करते हैं, "एक खिलाड़ी ने मुझसे कहा कि जब वह पेनाल्टी लेने आगे बढ़ा, तो वह सिर्फ यही सोच रहा था कि क्या टेलीविजन पर यह दिख रहा होगा कि मेरे घुटने थरथरा रहे हैं, कि मैं इतना नर्वस हूं."

वर्ल्ड कप में सबसे अच्छी तरह पेनाल्टी शूट करने वाली टीम जर्मनी की मानी जाती है, जिसने अब तक अपने सभी चार के चार पेनाल्टी मुकाबले जीते हैं. दूसरी तरफ इंग्लैंड है, जिसने अपने तीनों ऐसे मुकाबले गंवा दिए हैं. यहां तक कि 1998 में उसने टीम के साथ एक ओझा भी रखा था, जो खिलाड़ियों में इसके लिए विश्वास पैदा करने का काम करता था.

लगभग 123 साल पहले पेनाल्टी शूटआउट की परंपरा शुरू हुई. इसमें सबसे बड़ा हीरो हमेशा गोलकीपर होता है. अगर वह पेनाल्टी नहीं बचा पाता है, तो उसे सहानुभूति मिलती है, बचा लेता है तो ग्लैमर. दूसरी तरफ योरडेट कहते हैं, "शूट करने वाले से हमेशा उम्मीद की जाती है कि वह स्कोर करे. उसे पता होता है कि लोगों की उम्मीद क्या है और अगर वह उस पर खरा न उतरे, तो वह पूरी टीम और पूरे राष्ट्र के लिए बलि का बकरा बन जाता है."

लीवरपूल की जॉन मूर्स यूनिवर्सिटी के गणितज्ञों के मुताबिक अभेद पेनाल्टी वह है, जो 90 और 104 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से मारी जाए और जो गोलपोस्ट के किसी एक कोने में जा फंसे. इससे तेज रफ्तार से लगाई किक में गलती होने का खतरा रहता है और इससे धीमे शॉट गोलीकीपर रोक सकता है.

लेकिन भौतिकी के नियमों और दिमाग की स्थिति के बीच सामंजस्य बनाना इतना आसान नहीं. योरडेट कहते हैं कि उनकी टीम ने सभी वर्ल्ड कप के अलावा चैंपियंस लीग और यूरोपीय मुकाबलों के वीडियो देखे हैं और करीब तीन दर्जन फुटबॉलरों से बात की है. उनका कहना है कि गोलकीपर चाहते हैं कि स्ट्राइकर उनकी तरफ देखें, जिसे वे ट्रिक की तरह इस्तेमाल करते हैं.

दूसरी तरफ स्ट्राइकरों के लिए उनकी टीम मनोबल होती है. मानसिक ताकत के लिए जरूरी होता है कि कोच भी उनसे बात करें. और सबसे जरूरी है अभ्यास, बार बार. कनाडा के कलगारी यूनिवर्सिटी में इसके लिए "आंखों की ट्रेनिंग" का कोर्स तैयार किया गया है. इसके तहत स्ट्राइकर अपनी नजर एक जगह फिक्स कर लेता है. यह जगह गोलपोस्ट के ऊपरी हिस्से में बायां या दायां कोना हो सकता है. इसके बाद वह गोल के लिए तैयारी कर सकता है और अपने दिमाग को उसी कोने में स्थिर रख सकता है. फिर दर्शकों का शोर या दूसरे दबाव कम हो जाते हैं.

एजेए/ओएसजे (एएफपी)

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