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दुनिया

पेट रहे खाली और गोदाम खा गए अनाज

पूरी दुनिया में उगने वाले कुल खाद्य संसाधनों का करीब एक तिहाई हिस्सा कोई भी नहीं खा पाता. इस 'पोस्ट-हार्वेस्ट' बर्बादी के कारण कितने ही लोग आज भी भूखे सोते हैं.

जब भी दुनिया के सभी लोगों के पेट भरने की बात होती है तो सारी चर्चा का केंद्र किसी तरह उत्पादकता बढ़ाने पर आ जाता है. इस सबमें एक महत्वपूर्ण बिन्दु नजरअंदाज हो जाता है और वह है खाने की बर्बादी. बहुत बड़े स्तर पर होने वाली इस पोस्ट-हार्वेस्ट बर्बादी का सभी देशों पर, खासकर विकाससील देशों पर गहरा असर पड़ता है.

इस ओर ध्यान दिलाने के लिए अफ्रीका में रॉकफेलर फाउंडेशन ने इस साल एक खास शुरुआत की है. कुल 13 करोड़ डॉलर वाले इस अभियान में खाद्यान्न की कमी की समस्या से नई तरह से निपटने की कोशिश है. फाउंडेशन की प्रबंध निदेशक मामडू बितिये बताती हैं, "आम धारणा है कि अफ्रीका में उत्पादन में अंतर की समस्या है, जबकि सच तो ये है कि अफ्रीका अपना पेट भर सकता है." बितिये साफ करती हैं कि असल समस्या फसल उगने के बाद होने वाला बड़े स्तर का नुकसान है. आंकड़े दिखाते हैं कि "अफ्रीका अपनी जरूरत का 100 फीसदी (अनाज) पैदा करता है, लेकिन इस उत्पादन का 60 फीसदी नष्ट हो जाता है!"

संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन की 2011 की एक स्टडी से पता चला कि इंसानों के काम आ सकने वाले विश्व भर में उगने वाले अनाज का एक तिहाई यूं ही बर्बाद हो जाता है और कभी किसी भूखे की थाली तक नहीं पहुंचता. इसका मतलब हुआ हर साल करीब 1.3 अरब टन फसल की बर्बादी.

अफ्रीका में उगाये गये करीब आधे फल और सब्जी तो बाजार तक ही नहीं पहुंचते. यहां समस्या इनका सुरक्षित और पर्याप्त भंडारण करने की है. वहीं विकसित देशों में खाद्य संसाधनों की बर्बादी का कारण अलग है. अमीर देशों में बहुत सारा ऐसा खाना कचरे में फेंक दिया जाता है जो खाने लायक था. यह समस्या ज्यादातर फलों और सब्जियों से जुड़ी है.

और तो और समस्या केवल खाने की बर्बादी से ही नहीं पीने के पानी की कमी और जमीन से भी जुड़ी है. इन दोनों की कमी दुनिया भर में महसूस की जा रही है. लेकिन विश्व के ताजे पानी के भंडार का करीब 25 फीसदी और खेती लायक धरती का पांचवा हिस्सा हर साल ऐसी चीजें उगा रहा है जिसे कोई नहीं खा पाता.

खाद्यान्न के भंडारण में आने वाले भारी खर्च के कारण कुछ कंपनियों ने सूखे भोजन को रखने के लिए एयरटाइट कंटेनर बनाए हैं. लेकिन किसान इनका खर्च नहीं उठा सकते. इसलिए बर्बादी कम करने वाले सस्ते लेकिन प्रभावी उपाय तलाशना जारी है. रॉकफेलर फाउंडेशन ने इस अभियान यील्डवाइज में बड़ा निवेश हो रहा है. लेकिन यह भी समस्या के आकार के हिसाब से बहुत छोटा माना जाएगा. 2030 तक पोस्ट-हार्वेस्ट बर्बादी को आधा करना यील्टवाइज का लक्ष्य है. इसे पूरा करने की शुरुआत वे केन्या में आम और उत्तर नाइजीरिया में टमाटर की खेती को मॉडल उपज बनाकर करने वाले हैं.

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