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दुनिया

पूर्व सांसदों और विधायकों को मिलनी चाहिए सुविधाएं और भत्ते?

पूर्व सांसदों और विधायकों को मिलने वाली मुफ्त सुविधाओं और असीमित रेल यात्राओं पर सवाल उठने लगे हैं. सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से पूछा कि क्यों ना इन सुविधाओं को समाप्त कर दिया जाये.

भारत के सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से पूछा है कि क्यों ना पूर्व सांसदों को मिलने वाली सुविधायें और भत्ते समाप्त कर दिये जायें. कोर्ट ने बुधवार को कहा कि "प्रथम दृष्टया" उसे ये सारी सुविधाएं अनुचित लगती हैं. न्यायमूर्ति जे चेलमेश्वर और एस अब्दुल नजीर की बेंच ने विधायी निकायों के पूर्व सदस्यों को भत्ते देने के लिए दिशानिर्देश तैयार करने का समर्थन किया है. बेंच ने लोकसभा और राज्यसभा के महासचिवों से इस बाबत जवाब मांगा है. न्यायालय ने कहा कि पद छोड़ने के बाद जीवन अभाव में ना कटे, इसके लिए पूर्व सांसदों को कुछ वित्तीय सहायता देना कतई गलत नहीं है.

न्यायालय ने यह आदेश एक गैरसरकारी संस्था लोक प्रहरी की जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुये दिया. एनजीओ की तरफ से मामले की पैरवी कर रही वकील कामिनी जायसवाल ने कहा, "सरकारी अधिकारियों को दी जाने वाली पेंशन कर्मचारियों और सरकार के योगदान से बने फंड से दी जाती है. वहीं पूर्व विधायकों और पूर्व सांसदों को संचित निधि से पेंशन दी जाती है जबकि वे इसमें कोई योगदान भी नहीं देते हैं."

उन्होंने कहा कि "पेंशन एक सेवानिवृत्त व्यक्ति को वित्तीय सहायता प्रदान करने के उद्देश्य से दी जाती है लेकिन 80 फीसदी सांसद करोड़पति हैं और उन्हें पेंशन की आवश्यकता नहीं है. साथ ही देश में पूर्व सांसदों को दी जाने वाली सुविधाओं को लेकर कोई दिशा निर्देश नहीं हैं."

जायसवाल ने कहा कि पूर्व सांसदों को दिये जाने वाले भत्तों का मामला संविधान तैयार करते वक्त संविधान सभा के समक्ष भी उठाया गया था, लेकिन इस मसले को उस वक्त खारिज कर दिया गया. उन्होंने कहा कि पहले वे पूर्व सांसद पेंशन के पात्र होते थे, जिन्होंने कम से कम सदन में चार साल पूरे किये हों. लेकिन इस कानून में संशोधन किया गया और अब ऐसे भी सांसद इन सुविधाओं के लिये दावा कर सकते हैं जो चाहे एक दिन के लिये ही सदन के सदस्य रहे हों. उन्होंने तर्क दिया कि साल 1976 में सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व सांसदों को पेंशन दिये जाने के फैसले को सही ठहराया था, लेकिन इसके बाद से अब तक सांसदों के वेतन भत्तों को लेकर तमाम संशोधन किये जा चुके हैं. उन्होंने कहा कि साल 1976 में बने कानून में जो भी बदलाव किये गये थे, उन्हें समाप्त कर दिया जाना चाहिये.

न्यायालय ने इन दलीलों को सुनने के बाद कहा कि याचिकाकर्ता द्वारा उठाये गये मुद्दों की जांच की जानी चाहिये और अदालत ने इस बाबत केंद्र को नोटिस जारी कर उससे जवाब मांगा है. न्यायालय ने कहा, "पूर्व सासंदों को दी जाने सुविधाएं और भत्ते उचित होने चाहिये, मनमाने नहीं."

इलाहाबाद हाई कोर्ट द्वारा याचिका खारिज कर देने के बाद अपीलकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी.

 

 

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