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दुनिया

पूर्वोत्तर में बीफ बैन पर गरमाती चुनावी राजनीति

पूर्वोत्तर में जिन राज्यों नगालैंड, मिजोरम, मेघालय और त्रिपुरा में अगले साल की शुरूआत में विधानसभा चुनाव होने हैं वहां बीफ और उस पर पाबंदी ही सबसे बड़ा मुद्दा बनती जा रही है.

बीते साल असम में चुनाव जीत कर और अरुणाचल प्रदेश व मणिपुर में पिछले दरवाजे से सरकार बनाने वाली बीजेपी अब इन राज्यों में भी सत्ता पर काबिज हो कर पूरे पूर्वोत्तर पर राज करने का सपना देख रही है. लेकिन हत्या के लिए पशुओं की खरीद-फरोख्त पर पाबंदी का केंद्र का फैसला उनके लिए बाधा बन रहा है. यही वजह है कि पार्टी के तमाम नेता अब इस मुद्दे पर सफाई देते नजर आ रहे हैं.

ईसाईबहुल मेघालय में तो सरकार में आने पर बीफ सस्ता करने का वादा कर दिया है. उसने कहा है कि सरकार यहां कभी बीफ पर पाबंदी नहीं लगाएगी. वर्ष 2013 के विधानसभा चुनावों में पार्टी मिजोरम और मेघालय में एक भी सीट नहीं जीत सकी थी जबकि नगालैंड में उसे महज दो सीटें मिली थीं. विपक्षी राजनीतिक दलों ने बीफ बैन को बीजेपी के खिलाफ मुद्दा बनाया है. लेकिन बीजेपी नेताओं का कहना है कि पूर्वोत्तर राज्यों में बीफ की बिक्री पर पाबंदी नहीं लगाई जाएगी. स्थानीय लोगों के मन में इस मुद्दे पर उपजी आशंका को दूर करने के लिए मिजोरम में तो पार्टी के नेता बीफ फेस्टिवल भी आयोजित कर चुके हैं. बीजेपी की दलील है कि पूर्वोत्तर की संस्कृति और खान-पान की आदतें देश के दूसरे हिस्सों के मुकाबले भिन्न है.

पाबंदी नहीं

नगालैंड के बीजेपी अध्यक्ष विसासोली हांगू कहते हैं, "अगले साल हमारी पार्टी यहां सत्ता में आई तो उत्तर प्रदेश की तरह राज्य में गो-हत्या पर पाबंदी नहीं लगाई जाएगी. यहां जमीनी हकीकत भिन्न है और केंद्रीय नेतृत्व भी इससे अवगत है." वे कहते हैं कि इस फैसले से यह संदेश जाएगा कि बीजेपी इलाके की संस्कृति के खिलाफ है. इसी तरह अरुणाचल के बीजेपी अध्यक्ष तपन गाओ कहते हैं कि राज्य में इस पाबंदी को लागू करना संभव नहीं है. 2011 की जनगणना के मुताबिक नगालैंड की 20 लाख की आबादी में 88 फीसदी ईसाई हैं. मिजोरम और मेघालय के मामले में यह आंकड़ा क्रमशः 87 और 75 फीसदी है. मिजोरम बीजेपी के अध्यक्ष जीवी लूना भी यही बात दोहराते हैं. वह कहते हैं, "इलाके के जिन राज्यों में ईसाई-बहुल आबादी है वहां गो-हत्या पर पाबंदी नहीं लगाई जाएगी."

त्रिपुरा को छोड़ कर इलाके के बाकी छह राज्यों में बीफ की भारी खपत है. असम की आबादी में 30 फीसदी मुसलमान हैं. बीफ की खपत के मामले में यही राज्य पहले नंबर पर है. उसके बाद पड़ोसी मेघालय का नंबर है. इस राज्य में सालाना 15 हजार टन बीफ की मांग है. गो-हत्या पर पाबंदी के केंद्र के फैसले के बाद मेघालय विधानसभा में बाकायदा पारित एक प्रस्ताव में कहा गया था कि इस पाबंदी से पूर्वोत्तर व खासकर मेघालय के लोग प्रभावित होंगे. सदन में उक्त प्रस्ताव पेश करने वाले कांग्रेस के मुख्यमंत्री मुकुल संगमा कहते हैं कि बीफ सदियों से राज्य की जनजातियों के भोजन का अभिन्न हिस्सा रहा है. उनकी दलील है कि पशुओं की खरीद-फरोख्त पर पाबंदी से राज्य की अर्थव्यवस्था भी प्रभावित होगी. राज्य की लगभग 79 फीसदी आबादी आजीविका के लिए पशुओं के कारोबार पर निर्भर है. राज्य की पशु संसाधन मंत्री देवरा सी. मराक कहती हैं, "राज्य में बीफ के सालाना उत्पादन में लगभग नौ हजार टन की कमी है. इसे दूसरे राज्यों से मंगाना पड़ता है." मराक बताती हैं कि इस कमी को पाटने के लिए सरकार खासी पहाड़ियों में नए पशु फार्म खोलने के प्रस्ताव पर विचार कर रही है.

दूसरी ओर, वर्ष 1993 से ही लेफ्टफ्रंट के शासन में रहे त्रिपुरा की आबादी हिंदूबहुल है. यहां गो-हत्या पर पाबंदी को धार्मिक या सांस्कृतिक नही बल्कि किसानों की समस्या के तौर पर देखा जा रहा है.

बहस का मुद्दा

ईसाईबहुल राज्यों में बीफ पर पाबंदी लगाने को कोई भी राजनीतिक दल तैयार नहीं है. बीजेपी ने कहा है कि अगले साल की शुरूआत में होने वाले मेघालय विधानसभा चुनावों में जीतकर सत्ता में आने पर वह राज्य के गरीब तबके के लोगों को ध्यान में रखते हुए बीफ के दाम घटा देगी. उसने यहां बीफ पर पाबंदी लगाने की संभावना पहले ही खारिज कर दी है. बीजेपी ने सत्तारुढ़ कांग्रेस पर बीफ बैन के मुद्दे पर राजनीति करने का भी आरोप लगाया है. प्रदेश बीजेपी अध्यक्ष शिबुन लिंग्दोह कहते हैं कि केंद्र ने यहां बीफ की खरीद-फरोख्त पर पाबंदी नहीं लगाई है. वह कहते हैं कि केंद्र ने कभी भी यहां गोहत्या पर पाबंदी की बात नहीं कही है. पशुधन राज्य का मामला है. इस मुद्दे पर फैसले का अधिकार संबंधित राज्य सरकारों को है. बीजेपी प्रवक्ता जेए लिंग्दोह ने मुख्यमंत्री मुकुल संगमा पर राजनीतिक लाभ के लिए इस मुद्दे पर लोगों को गुमराह करने का आरोप लगाया है.

लेकिन कांग्रेस ने इस मुद्दे पर बीजेपी को दोहरे रवैये को ही अपना मुद्दा बनाया है. मेघालय के मुख्यमंत्री मुकुल संगमा सवाल करते हैं, "आखिर बीजेपी और उसकी अगुवाई वाली केंद्र सरकार की कथनी और करनी में इतना अंतर क्यों है?" उनका कहना है कि केंद्र को इस मुद्दे पर अपना रुख साफ करना चाहिए. इस मुद्दे पर विवाद बढ़ता देख कर असम के ताकतवर बीजेपी नेता हिमंत विश्वशर्मा ने सफाई दी है कि पार्टी का इलाके में बीफ पर पाबंदी लगाने का कोई इरादा नहीं है. हिमंत का आरोप है कि केंद्र के फैसले की गलत व्याख्या कर विपक्षी दल आम लोगों में भ्रम पैदा कर रहे हैं. वह कहते हैं, "असम समेत किसी भी राज्य में बीफ के सेवन पर कोई पाबंदी नहीं लगाई गई है और न ही पार्टी का भविष्य में ऐसा कोई इरादा है."

राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि इलाके की संस्कृति औऱ खान-पान की आदतों को ध्यान में रखते हुए अगले साल मिजोरम, मेघालय औऱ नगालैंड के विधानसभा चुनावों में बीफ और इस पर बैन भी एक प्रमुख मुद्दा बन कर उभरेगा.

रिपोर्ट: प्रभाकर

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