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दुनिया

पूर्वोत्तर में उग्रवाद पर काबू पाने की उम्मीद बढ़ी

बांग्लादेश से उल्फा महासचिव अनूप चेतिया के प्रत्यर्पण के बाद भारत सरकार पूर्वोत्तर के अलगाववादी संगठन के साथ शांति वार्ता को आगे बढ़ाने पर विचार कर रही है.

असम के सबसे बड़े उग्रवादी संगठन यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट ऑफ असम (उल्फा) के महासचिव अनूप चेतिया की स्वदेश वापसी दशकों से उग्रवाद से जूझ रहे पूर्वोत्तर में शांति बहाल करने में अहम भूमिका निभा सकती है. भारत सरकार कोई चार साल उल्फा के साथ बातचीत कर रही है. लेकिन अब चेतिया की वापसी उस शांति प्रक्रिया को तेजी से आगे बढ़ा सकती है. चेतिया उल्फा के संस्थापक सदस्यों में शामिल रहा है. उसकी वापसी से जहां उल्फा का बातचीत विरोधी परेश बरूआ गुट अलग-थलग पड़ जाएगा, वहीं शांति प्रक्रिया में उपजे गतिरोध को भी दूर करने में सहायता मिलेगी.

चेतिया को उल्फा का थिंकटैंक माना जाता है. वर्ष 1979 में संगठन की स्थापना में अहम भूमिका निभाने वाले चेतिया की दूरदर्शिता के चलते ही अपने गठन के कुछ वर्षों के भीतर ही उल्फा पूर्वोत्तर ही नहीं, देश के प्रमुख उग्रवादी संगठनों में शुमार हो गया था. ऊपरी असम के तिनसुकिया जिले के जेराईगांव का रहने वाला चेतिया उल्फा के बातचीत विरोधी गुट परेश बरूआ का चचेरा भाई भी है. ऐसे में शांति प्रक्रिया में उसके शामिल होने से अपने समुदाय से समर्थन की बरूआ गुट की उम्मीदों को झटका लगेगा. यही वजह है कि तमाम संगठनों और राजनीतिक पर्यवेक्षकों ने चेतिया को भारत लाने का स्वागत किया है. मुख्यमंत्री तरुण गोगोई ने इसे शांति प्रक्रिया की दिशा में एक सकारात्मक कदम करार दिया है.

विभाजित उग्रवादी

सरकार ने वर्ष 2011 में उल्फा के साथ शांति समझौते पर हस्ताक्षर किए थे. लेकिन संगठन का कमांडर-इन-चीफ रहे परेश बरूआ ने इसका विरोध करते हुए अपना अलग गुट बना लिया था. उसका गुट राज्य में समय-समय पर हिंसक वारदातें करता रहा है. अब चेतिया के आने के बाद बरूआ गुट पर अंकुश लगाने में आसानी होगी. उल्फा के खिलाफ जोरदार अभियान चला चुके असम के पूर्व पुलिस महानिदेशक जी.एम. श्रीवास्तव कहते हैं, "चेतिया से सुरक्षा एजंसियों को बरूआ गुट के बारे में कई अहम खुफिया जानकारियां मिल सकती हैं. उनकी सहायता से बरूआ को अलग-थलग कर इलाके में उग्रवाद पर काबू पाने व शांति बहाल करने में सहायता मिलेगी."

केंद्र के साथ चलने वाली शांति प्रक्रिया में भी हाल में गतिरोध पैदा हो गया है. उल्फा अध्यक्ष अरविंद राजखोवा ने सरकार के सामने अपनी मांगों की सूची पेश करते हुए धमकी दी है कि अगर 30 नवंबर तक तमाम समस्याओं का समाधान नहीं हुआ तो संगठन शांति प्रक्रिया को छोड़ कर वैकल्पिक रास्ता अपना लेगा. लेकिन अब चेतिया के आने के बाद पर्यवेक्षकों को यह गतिरोध दूर हो जाने की उम्मीद है. मुख्यमंत्री कहते हैं, "चेतिया के आने के बाद शांति प्रक्रिया में तेजी आएगी और असम में शांति बहाली का रास्ता साफ हो जाएगा."

उल्फा उपाध्यक्ष प्रदीप गोगोई ने भी चेतिया की स्वदेश वापसी का स्वागत करते हुए कहा है कि इससे शांति प्रक्रिया की राह में पैदा गतिरोधों को दूर करने में सहायता मिलेगी. प्रदीप कहते हैं, "अब शांति प्रक्रिया में तेजी आने की उम्मीद है." पूर्व मुख्यमंत्री प्रफुल्ल महंत ने भी चेतिया की वापसी का स्वागत करते हुए इसे एक सकारात्मक कदम करार दिया है. वह कहते हैं, "अब शांति प्रक्रिया को तेज कर इलाके की समस्याओं का समाधान केंद्र सरकार पर निर्भर है."

शांति की उम्मीदें

असम पुलिस ने मार्च, 1991 में एक अभियान चला कर चेतिया को गिरफ्तार कर लिया था. लेकिन तत्कालीन मुख्यमंत्री हितेश्वर सैकिया ने शांति प्रक्रिया के लिए उसे जेल से रिहा कर दिया था. उसके बाद वह बांग्लादेश फरार हो गया जहां पुलिस ने उसे दिसंबर, 1997 में गिरफ्तार कर लिया. उसे फर्जी पासपोर्ट रखने व अवैध तरीके से देश में प्रवेश करने समेत विभिन्न आरोपों में सात साल की सजा सुनाई गई थी. लेकिन सजा पूरी होने के बावजूद उसे एहतियातन हिरासत में रखा जा रहा था. चेतिया ने कई बार भारत लौटने की इच्छा जताई थी. लेकिन भारत व बांग्लादेश के बीच प्रत्यर्पण संधि नहीं होने की वजह से इसमें मुश्किलें आ रही थीं. उसने तीन बार बांग्लादेश में राजनीतिक शरण की भी अपील की थी. लेकिन उस पर कोई फैसला नहीं हो सका था. अब केंद्र सरकार व सीबीआई के प्रयासों के बाद ढाका ने उसे भारत को सौंपने का फैसला किया.

राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि चेतिया की वापसी से शांति प्रक्रिया के परवान चढ़ने की स्थिति में असम उग्रवाद से जूझ रहे पूर्वोत्तर के दूसरे राज्यों के लिए भी एक मिसाल बन सकता है. लेकिन क्या इलाके में शांति बहाली का सपना निकट भविष्य में हकीकत में बदलेगा? इस सवाल का जवाब तो आने वाले दिनों में ही मिलेगा. लेकिन चेतिया की वापसी ने इस दिशा में एक नई उम्मीद तो जगा ही दी है.

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