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ताना बाना

पुरखों की इबारत बांचने वालों का अकाल

इतिहास की स्लेट पर लिखी इबारत में सुनहरे भविष्य का पैगाम छुपा होता है. जरूरत उन पारखी नजरों की होती है जो इसे पढ़ सकें. प्राचीनतम संस्कृति का वाहक होने का दंभ भरने वाले भारत में अतीत के बीजक बांचने वाले नहीं बचे.

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अपनी प्राचीन सभ्यता संस्कृति के अवशेषों को संजोकर रखने के लिए भारत सरकार हर संभव प्रयास करती रही है. लेकिन इतिहास और संस्कृति से जुड़े सरकारी महकमे इन दिनों एक परेशानी से जूझ रहे हैं. प्राचीन शिलालेख, पांडुलिपि, ताम्रपत्र, मंदिर और स्मारकों की दीवारों पर अंकित लिखावट को पढ़ने वालों का अकाल जो पड़ गया है.

सरकार की अपनी ही एक रपट में यह खुलासा किया गया है. इससे अतीत की गर्द में छुपे पुरावशेषों की खोजबीन से लेकर इनके संरक्षण पर खर्च होने वाले भारी भरकम बजट पर भी सवालिया निशान लग गया है. रिपोर्ट के मुताबिक पिछले दस सालों में प्राचीन लिपियों को पढ़ने वाले या तो रिटायर हो गए या बीमारी के कारण काम कर सकने से लाचार हो गए. इस विधा में नई पीढ़ी की कोई दिलचस्पी न होने की वजह से यह संकट पैदा हुआ है.

हालांकि सरकार अब नींद से जाग कर इस समस्या से निपटने के पुख्ता उपाय करने का दावा कर रही है. जिससे पांडुलिपि और शिलालेखों पर लिखी भाषा को पढ़ने वालों की कमी को दूर किया जा सके. प्राप्त जानकारी के मुताबिक भारत में 60 प्रतिशत शिलालेख तमिलनाडु में हैं. पिछले एक साल में 200 नये पुरालेख मिलने के बाद अकेले इसी राज्य में लिखावट को पढ़े जाने के इंतजार में पड़े लेखों की संख्या लगभग 60 हजार हो गई है.

इसी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि पूरे देश में इस समस्या के कारण ऐतिहासिक कृतियों का कितना अंबार लग गया होगा. जानकारों की राय में इसके लिये सरकार की लापरवाही और संवेदनहीनता ही जिम्मेदार है.

जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में प्राचीन इतिहास विभाग में प्रोफेसर कुमकुम राय कहती हैं कि अगर तुरंत इस कमी को पूरा नहीं किया गया तो भारतीय इतिहास का एक अहम अध्याय अबूझ पहेली ही बना रह जाएगा. प्रो. राय के मुताबिक इन लेखों में प्राचीन समाज का पूरा ताना बाना छुपा होता है जिसे हमारे पूर्वज गूढ़ भाषा में लिख कर छोड़ गए. वह कहती हैं, "इस लिपि को समझना आसान नहीं होता है. इसलिए सरकार को प्राचीन लिपियों के जानकार तैयार करने का काम संजीदगी के साथ कुछ इस तरह से से करना पड़ेगा जिससे नई पीढ़ी में इसके लिए रुचि पैदा हो और भविष्य में ऐसे संकट से बचा जा सके."

भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण विभाग (एएसआई) के महानिदेशक गौतम सेनगुप्ता ने बताया कि शिक्षाशास्त्र की भाषा में इस विधा को पुराविज्ञान कहते हैं और सरकार को इसे बाकायदा विज्ञान के रूप में विकसित करने के लिए कारगर उपाय करने चाहिए. वह स्वीकार करते है कि इसके लिए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग और स्वयं एएसआई को काफी कुछ करना होगा. सेनगुप्ता ने बताया कि एएसआई के साथ मिलकर सरकार ने इसके लिए एक योजना बनाई है. जिसमें पुराविज्ञान के क्षेत्र में शोध और अध्ययन को बढ़ावा देने के लिए पहले चरण में नेशनल प्रोफेसरशिप के आवेदन मंगाए जाएंगे.

प्रो. राय का कहना है कि पुराविज्ञान को मरने से बचाने के लिए छात्रों में इसके प्रति रुझान पैदा करना होगा. यह तभी संभव है जबकि इसे रोजगारपरक बनाते हुए आधुनिक तकनीक से जोड़ा जाए. उनका कहना है कि अभी भी कुछ नहीं बिगड़ा है बशर्ते सरकार अपनी योजना को ईमानदारी से अमल में लाए.

रिपोर्टः मुरली कृष्णन/निर्मल

संपादनः वी कुमार

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