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ब्लॉग

पुतिन के विकल्प: प्लेग चुनें या हैजा

दस सालों में पहली बार रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने यूएन महासभा के सामने ऐसा भाषण दिया है. डीडब्ल्यू के इंगो मनटॉयफल कहते हैं कि पश्चिम के सामने अब रूस की सीरिया योजना पर अपना विकल्प चुनने की विकट समस्या है.

जिन लोगों को लगता था कि रूसी राष्ट्रपति पुतिन यूएन महासभा को न्यूयॉर्क में अपने संबोधन में सीरियाई संकट के विषय पर एक समझौते का प्रस्ताव पेश करेंगे और कहने को ही सही लेकिन खुद को सीरियाई शासक असद से दूर कर लेंगे, वे बहुत निराश हुए होंगे.

सोमवार को अपने भाषण में पुतिन ने साफ कर दिया है कि सीरिया में इस्लामिक स्टेट से निपटने के यूएन के किसी भी गठबंधन को रूस का समर्थन मिलने के लिए जरूरी होगा कि उसमें असद भी शामिल हों.

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इंगो मनटॉयफल, डीडब्ल्यू

असद, और केवल असद

पुतिन फिलहाल तो असद को छोड़ने वाले नहीं हैं, और शायद भविष्य में भी नहीं. बात सिद्धांतों की है. जैसा कि पुतिन बता रहे हैं कि वे किसी भी देश के आंतरिक मामलों में बाहरी हस्तक्षेप का विरोध करते हैं. इसके पीछे पुतिन की अपने मध्यपूर्व के महत्वपूर्ण पार्टनर सीरिया की चिंता ही नहीं है. इसमें कोई शक नहीं कि इसी के साथ पुतिन ने अपनी खुद की सरकार के तौर तरीकों पर होने वाली पश्चिमी देशों की आलोचना को भी अस्वीकार किया.

यहां यह बताना जरूरी हो जाता है कि जब पुतिन ने बाहरी हस्तक्षेप की बुराई की तो उनका इशारा क्रीमिया की ओर कतई नहीं था, जिसे खुद रूस ने अंतरराष्ट्रीय कानून के खिलाफ जाते हुए 2014 के प्रारंभ में पूर्वी यूक्रेन में रूस-समर्थित अलगाववादियों की मदद से छीन लिया था.

अब सीरिया संकट पर रुस का नजरिया साफ होने के बाद पश्चिम के सामने बहुत कठिन विकल्प हैं. पुतिन चाहते हैं कि इस्लामिक स्टेट के खिलाफ जंग में अमेरिका और यूरोप असद को एक सच्चे पार्टनर का दर्जा दें. ऐसा हुआ तो ना केवल सीरियाई शासक की सत्ता मजबूत होगी बल्कि विश्व राजनीति में एक बड़े वैश्विक खिलाड़ी के रूप में रूस का रुतबा और बढ़ेगा. यूक्रेन के मुद्दे पर पश्चिम जिस तरह रूस को अलग थलग करता आया है, वह सिलसिला अपने आप टूट जाएगा.

जैसा है वैसा चलने दें तो

अगर पुतिन को समर्थन नहीं मिला तो सीरिया के ताजा हालात ऐसे ही जारी रहेंगे. युद्धग्रस्त इलाकों में फंसे लाखों मध्यपूर्व के लोगों का अपना घर बार छोड़कर केंद्रीय यूरोप की ओर बढ़ना भी नहीं रुकेगा.

और तीसरा विकल्प होगा कि पश्चिम की विशाल सेनाएं सीरिया में मौजूद ग्राउंड ट्रूप के साथ एक खतरनाक मिशन शुरु करें. इस विकल्प को यूएन की मंजूरी मिलना तो बहुत मुश्किल होगा और इस पर अब तक किसी ने खुल कर चर्चा भी नहीं की है.

इनमें से कोई भी विकल्प चुनना पश्चिम के लिए आसान नहीं होगा. ओबामा ने अपने भाषण में यह भी साफ कर दिया है कि अमेरिका मध्य पूर्व में कोई भी एकतरफा कार्रवाई नहीं करने वाला.

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