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ब्लॉग

पीलीभीत मामला: देर से आया दुरुस्त फैसला

फर्जी मुठभेड़ के मामले भारत ही नहीं दुनिया भर में समाज और सिस्टम के लिए चिंता का सबब बने हैं. इसी कड़ी में पीलीभीत फर्जी मुठभेड़ मामले में आए अदालत के फैसले ने पुलिस और प्रशासनिक तंत्र की मंशा पर सवालिया निशान लगा दिया है.

साफ पानी की तरह उजले इस मामले में जांच को न्याय के अंजाम तक पहुंचाने में 25 साल लग गए. सोचने वाली बात यह भी है कि ढाई दशक का समय अगर देश की अग्रणी जांच एजेंसी सीबीआई और इसकी विशेष अदालत को लगे तब फिर अंदाजा लगाना कठिन नहीं है कि स्थानीय पुलिस की जांच का अंजाम और मंजर क्या होता. बहरहाल इंसाफ को आगाज से अंजाम तक पहुंचते देखने की दस आरोपियों की हसरत पूरी नहीं हो पाई. अदालत ने फैसले में बाकी बचे सभी 47 पुलिसकर्मियों को अल्पसंख्यक सिख समुदाय के दस युवाओं को फर्जी मुठभेड़ में मारने का दोषी ठहराते हुए उम्र कैद की सजा सुनाई. साथ ही दोषी ठहराए गए आरोपियों में शामिल थानाध्यक्षों पर 11 लाख रुपये, सब इंस्पेक्टरों पर 7 लाख रुपये और सिपाहियों पर ढाई ढाई लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया है.

कछुआ गति से 25 साल तक चली जांच और सुनवाई के बाद फैसले में सजा की इस मात्रा पर बहस बेमानी है. हां यह जरूर है कि सभी आरोपियों की दोषसिद्धि फैसले को इंसाफ की कसौटी पर संदेह से मुक्त करने में सक्षम है.

क्या हुआ था 1991 में?

अब बात मामले की गंभीरता की. पीलीभीत में जुलाई 1991 में हुआ यह एनकांउटर किसी भी तरह से सामान्य मुठभेड़ के दायरे में नहीं आती. उस दौरान जबकि खालिस्तान की मांग को लेकर पंजाब और आसपास सिख चरमपंथियों की हिंसा से देश जूझ रहा था. ऐसे में पटना सहिब से लौट रहे सिख तीर्थयात्रियों के जत्थे को ला रही बस से पीलीभीत में पुलिस ने दस युवकों को उतार लिया और अगले दिन जिले के तीन अलग अलग थानाक्षेत्रों में इन युवकों के शव बरामद हुए. पुलिस ने इसे चरमपंथियों की संदिग्ध गतिविधियों को रोकने के लिए की गई मुठभेड़ बताते हुए मृतकों को उग्रवादी करार दिया.

भला हो हरजिंदर नाम के एक गवाह का जिसने उत्तर प्रदेश पुलिस को कटघरे में खड़ा किया. इतना ही नहीं राज्य द्वारा उसकी दलीलें नहीं सुने जाने पर उसने दिल्ली में सिख संगठनों की मदद से इस मामले की सीबीआई जांच की मांग सुप्रीम कोर्ट में उठाई. उसकी दलीलें पहली नजर में सही लगने पर सर्वोच्च अदालत ने जांच सीबीआई को सौंपने का आदेश दिया. तब कहीं जाकर देर से ही सही लेकिन मुठभेड़ की असलियत को सामने लाने वाली जांच के आधार पर दुरुस्त फैसला सामने आया है.

कुछ सवाल अब भी बाकी

हालांकि इस फैसले को भी जांच पड़ताल की अंतिम पैमाइश नहीं माना जा सकता है. 25 साल की जांच के बाद अभी भी संदेह के कुछ सवाल बाकी हैं. मसलन कौमी एकता की खातिर समाज के विभिन्न तबकों में आपसी विश्वास बहाली की सरकारी कोशिशों को पलीता लगाने वाली यह मुठभेड़ पुलिस ने किसके इशारे पर की. उन नापाक ताकतों तक सीबीआई नहीं पहुंच पाई. साथ ही पीलीभीत के तत्कालीन पुलिस अधीक्षक आरडी त्रिपाठी की संदिग्ध भूमिका के बावजूद उन्हें आरोपी नहीं बनाने का कारण इस फैसले में नहीं दिखता है.

तीसरा और सबसे अहम सवाल न्याय के अंतिम दरवाजे तक यह फैसला कायम रहने और अनुत्तरित सवालों के जवाब अग्रिम अदालतों की सुनवाई में मिल पाने का है. स्पष्ट है कि न्याय की पहली सीढ़ी तक पहुंचने में 25 साल लग गए तब फिर यह चिंता लाजिमी है कि फैसले को हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में मिलने वाली चुनौती से निपटने में कितना समय लगेगा.

ब्लॉग: निर्मल यादव

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