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खेल

पीछे नहीं महिला फ़ुटबॉल

पूरी दुनिया में फुटबॉल वर्ल्ड कप का बुखार चढ़ा है. लेकिन कम से कम जर्मनी में महिला फ़ुटबॉल की दुनिया भी कम दिलचस्प नहीं है. यहां आप्रवासी परिवार की लड़कियां भी आगे आ रही हैं.

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जर्मनी की महिला फुटबाल टीम 2007 में विश्व चैंपियन बनी और 2011 में महिलाओं का फुटबॉल विश्व कप जर्मनी में खेला जाएगा. महिला खिलाडियों की नई पीढी को तैयार करने के लिए जर्मन राजधानी बर्लिन में एक योजना के तहत खास कर तुर्क या अरब मूल की लड़कियों को फुटबॉल के लिए आकर्षित करने की कोशिश की जा रही है. विशेषज्ञ मानते हैं कि फुटबॉल खेलने से उनके अंदर आत्मविश्वास बढ़ेगा और वह अपनी रूढ़ीवादी माने जाने वाले परिवारों को नया नाम दे सकते हैं. जेसिका मंसूर भी हर हफ्ते बर्लिन के शोएनेबर्ग इलाके में फुटबॉल खेलने आती हैं. फुटबॉल खेलने के लिए 17 साल की लेबनॉनी मूल की जेसिका को अकसर अपने पिता से झगड़ा करना पड़ता है. वह कहती है -

फुटबॉल खेलने पर मेरे पिता अकसर मेरा मज़ाक करते हैं. कहते हैं, ओह, कैसी है मेरी फुटबॉल खिलाडी, ट्रेनिंग के लिए जा रही हो. और मेरी मां कहती हैं- ट्रेनिंग करने के लिए मत जाओ, घर में बहुत साफ सफाई की ज़रूरत है. - जेसिका मंसूर

तुर्क मूल की हुएल्या कहती हैं कि शुरू शुरू में उन्हें भी परिवार के साथ लडाई करनी पड़ी. लेकिन धीरे धीरे वह अपनी बेटी के हॉबी को लेकर खुश हैं.

हमेशा बातें एक जैसी होती हैं. एक लडकी को छोटे कपड़े, यानी छोटे शॉर्ट्स नहीं पहनने चाहिए. लेकिन यह पागलपन है. - हुएल्या

जिस क्लब के लिए जेसिका और हुएल्या खेलती हैं उसका नाम है तुर्कियमस्पोर यानी हमारा तुर्की. तुर्की मूल के लोग जर्मनी में सबसे बडा विदेशी समुदाय हैं. क्लब के मैनजर बताते हैं कि फुटबॉल खेलने के साथ जर्मनी के समाज में घुलने मिलने में भी विदेशी मूल के युवाओं को ज़्यादा आसानी होती है. और कोच मुरात दोग्रान कहते हैं कि फुटबॉल खेलने से रूढ़ीवादी ख्यालों को भी पार किया जा सकता है. नारी पुरूष सामानता को भी बढ़ावा मिल सकता है.

यह बात स्पष्ट है कि जो लोग तुर्की से 70 के दशक में जर्मनी आए, वह गांवों से आकर बर्लिन जैसे शहरों में बस गए. उनके समाज में रीत रिवाजों के अनुसार लडकियां 17, 18, 19 साल में शादी कर लेती थीं. यानी युवा लड़कियों को दूसरी चीज़ों पर ध्यान देने की ज़रूरत है. यानी पढाई, ट्रेनिंग और शादी के लिए तैयारी. - मुरात दोग्रान

वर्ल्ड कप फुटबॉल खेल रही जर्मनी की पुरुष टीम में भी बहुत से विदेशी मूल के खिलाड़ी हैं. यहां तक कि स्टार स्ट्राइकर लुकास पोडोल्सकी और मीरोस्लाव क्लोज़े मूल रूप से पोलैंड के हैं, जबकि घाना के खिलाफ निर्णायक गोल करने वाले ओएतजिल तुर्की मूल के हैं. महिलाओं के फुटबॉल में भी ऐसी तस्वीर उभारने की कोशिश की जा रही है.

रिपोर्ट: प्रिया एस्सेलबोर्न

संपादन: उज्ज्वल भट्टाचार्य

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