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दुनिया

पिछड़ेपन पर सियासी ताकत बेअसर

एक ओर फॉर्मूला वन है तो दूसरी ओर सबसे ऊंचा रिहायशी टावर, ऐतिहासिक और राजनीतिक समृद्धि की तो बात ही मत पूछिए, लेकिन 80 सांसद चुनने वाला और 8 प्रधानमंत्री बना चुका उत्तर प्रदेश पिछड़े राज्यों की श्रेणी में आ रहा है.

दिल्ली को यूपी से जोड़ने वाले नोएडा और ग्रेटर नोएडा को देश के विकास सूचकांक का आइना कहा जाता है, जहां भारत का सबसे ऊंचा 300 मीटर का रिहायशी टावर 'क्षिप्रा' बन रहा है. 255 मीटर ऊंचे दो और टावर भी बन रहे हैं. ये सभी लंदन के केनरी हार्फ से भी ऊंचे हैं. ग्रेटर नोएडा के टावर से ऊंचे दुबई के 830 मीटर ऊंचे बुर्ज खलीफा, क्वालालंपुर के 830 मीटर ऊंचे पेट्रोनाइस, 508 मीटर ऊंचे ताईपेई टावर और न्यूयार्क के 381 मीटर ऊंचे एम्पायर स्टेट ही हैं. यही नहीं भारत में फार्मूला वन रेस के आयोजन की हिम्मत भी सिर्फ नोएडा ही कर सका. इसी महीने के आखिर में यहां के बुद्ध सर्किट में तीसरी भारतीय फार्मूला वन रेस होने जा रही है. अभी दो महीने पहले ही नोएडा अथॉरिटी ने जमीन के दामों में 30 फीसदी तक, ग्रेटर नोएडा ने 8.53 प्रतिशत और यमुना एक्सप्रेस वे अथॉरिटी ने 18 फीसदी तक इजाफा किया है. प्रापर्टी डीलर दिलीप बरार के मुताबिक नोएडा और ग्रेटर नोएडा के कमर्शियल प्लॉट दुबई की लैंड वैल्यू से अधिक दामों में बिकते रहे हैं.

इतना सब होने पर भी रिजर्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन ने भारत सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार के रूप में राज्यों के गरीब राज्यों को आर्थिक सहायता देने का फार्मूला निकाला तो यूपी तो यूपी ठहरा समृद्ध माने जाने वाले गुजरात को भी कम पिछड़े राज्य की श्रेणी में डाल दिया.

बिहार से शुरू हुआ

मामला दरअसल बिहार को विशेष राज्य का दर्जा दिए जाने की मांग से शुरु हुआ. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने विशेष राज्य का दर्जा देने के मानकों में तब्दीली करने की मांग की. तब रघुराम राजन की अध्यक्षता में समिति बनी जिसने अल्प विकास/आवश्यकता के सूचकांक के हिसाब से यूपी और बिहार समेत 10 राज्यों को अधिक पिछड़े राज्यों की श्रेणी में डाल दिया. समिति के मुताबिक सबसे विकसित राज्य गोवा और सबसे पिछड़ा उड़ीसा है. गोवा का ये सूचकांक 0.045 है और उड़ीसा का 0.798 है. गुजरात का 0.491, यूपी का 0.638, बिहार का 0.765 है. सबसे मजे की बात ये है कि अभी दस साल पहले तक यूपी का ही हिस्सा रहा उत्तराखंड भी इस समिति के हिसाब से विकसित राज्यों की श्रेणी में आ गया, जिसका सूचकांक 0.383 है. समिति ने कहा कि विशेष राज्य का दर्जा देने के बजाए राज्यों को तीन श्रेणियों में रखा जाए. विकसित, कम विकसित और सबसे कम विकसित. हालांकि समिति के सदस्य शैवाल गुप्ता ने जिन मानकों के आधार पर ये तीन श्रेणियां बनाईं गईं, उनका विरोध किया.

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इस सबके पीछे राजनीति भी है. पिछड़े घोषित होने वाले 10 राज्यों में लोकसभा की 238 सीटें हैं. माली मदद से वोट हासिल करने का फार्मूला नया नहीं है. वित्त मंत्री पी. चिदंबरम कह चुके हैं कि ये सिफारिशें वित्तीय वर्ष 2014-15 में लागू हो सकती है, यानी मार्च, तब लोकसभा चुनाव में कुछ ही समय बाकी बचा होगा और यूपी को वर्तमान में केंद्रीय सहायता का हिस्सा 10.1 प्रतिशत से बढ़कर 16.4 फीसदी मिलने लगेगा. आर्थिक मामलों की संस्था के डॉ. राजेश्वर मित्तल कहते हैं कि ढांचागत सरकारें सुधार नहीं कर पा रही हैं तो पिछड़ापन कैसे दूर होगा. एएमयू में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर सिराज खान के अनुसार पिछड़ेपन ने संस्थानिक रूप ले लिया है. कोई संस्था तभी खत्म होती है जब उसके खिलाफ विद्रोह हो या स्थितियां उसे अप्रासांगिक करें, दोनों की ही उम्मीद कम है.

बीआरजीएफ का हाल

पिछड़ा क्षेत्र अनुदान निधि यानी बीआरजीएफ के तहत केंद्र से मिली करीब 2200 करोड़ की धनराशि घोटालों की भेंट चढ़ चुकी है. क्षेत्रीय असंतुलन दूर करने के लिए 2006-7 में मिली धनराशि भी खर्च नहीं हो पाई. बीआरजीएफ में पूर्वांचल विकास निगम, बुंदेलखंड विकास निधि, सीमा क्षेत्र विकास निधि, जेएनयूआरएम और एमएसडीपी जैसी परियोजनाएं शामिल हैं. बीजेपी प्रवक्ता विजय पाठक आमूलचूल परिवर्तन की बात करते हैं. उनके मुताबिक राष्ट्रीय पार्टियों की सरकारें ही राज्य का विकास करती हैं. बीएसपी के वरिष्ठ नेता आरके चैधरी कहते हैं कि समानता के बिना पिछड़ापन नहीं दूर हो सकता. पिछले तीन वर्षों में केंद्र से प्राप्त कुल 1857.67 करोड़ रुपए में यूपी सरकार सिर्फ 1088.52 करोड़ ही खर्च कर सकी. अभी भी 769.15 करोड़ खर्च करने को बाकी बचा है. सियासतदान तबके की ही मेहरबानी है कि राष्ट्रीय कृषि विकास योजना के तहत मिले 1000 करोड़ रुपए भी पिछले पांच वर्षों में खर्च नहीं हो पाए हैं.

रिपोर्ट: एस. वहीद, लखनऊ

संपादन: आभा मोंढे

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