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दुनिया

पार्टियों के बीच सहयोग से ही बनेगा ‘न्यू इंडिया’

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तमाम राज्यों के सहयोग से वर्ष 2022 तक न्यू इंडिया यानी एक नया भारत गढ़ने की बात कही है. लेकिन क्या दलगत राजनीति इसमें बाधा बन रही है?

केंद्र सरकार और पश्चिम बंगाल सरकार के बीच लगातार बढ़ती कड़वाहट को ध्यान में रखते हुए मोदी के लिए इस सपने को हकीकत का जामा पहनाना आसान नहीं है. खासकर वर्ष 2019 के लोकसभा चुनावों को लेकर बीजेपी और तृणमूल कांग्रेस ने एक-दूसरे के खिलाफ जैसे तल्ख तेवर अख्यितार किए हैं उसमें इन दोनों के करीब आने की कोई उम्मीद नहीं है. ऊपर से वर्ष 2021 में यहां विधानसभा चुनाव होने हैं. बीजेपी उन चुनावों में बंगाल में सरकार बनाने का दावा कर रही है.

मोदी का न्यू इंडिया

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने न्यू इंडिया का विजन पेश करते हुए कहा है कि इसे तमाम राज्यों और मुख्यमंत्रियों के साझा प्रयासों व सहयोग से ही हकीकत में बदला जा सकता है. मोदी के इस सपने को पूरा करने के लिए नीति आयोग ने इंडिया 2021-32, विजन, स्ट्रेटजी एंड एक्शन एजेंडा शीर्षक एक त्रिस्तरीय कार्य योजना तैयार की है. आयोग ने इसमें तीन सौ मंत्र शामिल किए हैं. मोदी का कहना है कि इन मंत्रों को तमाम राज्यों के सहयोग से लागू कर एक नया भारत गढ़ा जाएगा. बाद में राज्यों को भी इसका पूरा फायदा मिलेगा. इसी क्रम में प्रधानमंत्री ने ईपीआई यानी एवरी पर्सन इज इम्पोर्टेंट (हर व्यक्ति महत्वपूर्ण है) का भी नया नारा दिया है. उनका कहना है कि ईपीआई न्यू इंडिया की एक अहम पहचान होगा.

नीति आयोग के उपाध्यक्ष अरविंद पनगढ़िया बताते हैं, "सबके लिए टायलेट समेत आवास, बिजली व डिजिटल कनेक्टिविटी, सबके लिए दोपहिया या कार, एयरकंडीशनर व जरूरत की दूसरी चीजों की उपलब्धता, पूरी तरह साक्षर आबादी और स्वास्थ्य सुविधाओं तक आसान पहुंच, रेलवे, सड़क और जल व वायु मार्ग के आधुनिकतम नेटवर्क तक पहुंच और साफ हवा-पानी, साफ-सुथरे शहर और गांव प्रस्तावित न्यू इंडिया की खासियत होंगे."

लेकिन बंगाल समेत विभिन्न राज्यों के साथ केंद्र के मौजूदा छत्तीस के आंकड़े को देखते हुए मोदी का न्यू इंडिया अभी दूर की ही कौड़ी लगता है. खासकर बीजेपी की अगुवाई वाली केंद्र सरकार के रिश्ते उन राज्यों से बिगड़ रहे हैं जहां वह (बीजेपी) सत्ता में आने के सपने देख रही है. इनमें बंगाल के अलावा ओडीशा और पूर्वोत्तर राज्य त्रिपुरा शामिल हैं.

बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने बीते दिनों बंगाल के तीन-दिवसीय दौरे के दौरान यहां बूथ चलो अभियान को हरी झंडी दिखाई थी. इस दौरान उन्होंने वर्ष 2019 के लोकसभा चुनावों में बीजेपी के सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर उभरने का दावा किया था और अगले विधानसभा चुनावों में जीत कर यहां सरकार बनाने का भी. इसी तरह ओडीशा में पार्टी की राष्ट्रीय कार्यसमिति की बैठक में भी तमाम नेताओं ने राज्य में अगली सरकार बनाने के दावे किए. इस सप्ताह त्रिपुरा के दो-दिवसीय दौरे में भी शाह ने लेफ्टफ्रंट सरकार पर कुशासन और भ्रष्टाचार के आरोप लगाते हुए बीजेपी का उसका एकमात्र विकल्प करार दिया था.

दीदी बनाम मोदी

बंगाल में सत्तारुढ़ तृणमूल कांग्रेस और उसकी मुखिया ममता बनर्जी के केंद्र के साथ रिश्ते जितने तल्ख हैं उतने किसी दूसरे राज्य के साथ नहीं हैं. रिश्तों में तल्खी की यह शुरूआत बीते विधानसभा चुनावों के दौरान शुरू हुई थी जो अब लगातार तेज होती जा रही है. बीजेपी व तृणमूल कांग्रेस दोनों ने एक-दूसरे के खिलाफ बदले की राजनीति का आरोप लगाया है. बीजेपी जहां बंगाल के विकास की होड़ में पिछड़ने, सत्तारुढ़ पार्टी के नेताओं के भ्रष्टाचार में फंसने और राज्य में लोकतंत्र नामक कोई चीज नहीं होने के आरोप लगा रही है वहीं तृणमूल कांग्रेस केंद्र व बीजेपी पर प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) और सीबीआई जैसे केंद्रीय एजेंसियों को राजनीतिक हथियार बनाने का आरोप लगाया है.

ममता बनर्जी ने बीजेपी पर दंगे फैलाने का प्रयास करने और धार्मिक आधार पर लोगों को बांटने के भी आरोप लगाए हैं. शारदा चिटफंड घोटाले के सिलसिले में तृणमूल के दो सांसद, तापस पाल और सुदीप बनर्जी बीते चार महीनों से जेल में हैं. अब बीते महीने कलकत्ता हाईकोर्ट ने नारद स्टिंग वीडियो मामले की जांच सीबीआई को सौंप दी थी. उसने प्राथमिक जांच के बाद पार्टी के एक दर्जन सांसदों और मंत्रियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की है. इसके बाद इन नेताओं पर गिरफ्तारी की तलवार लटक रही है. दूसरी ओर, ममता ने चुनौती दी है कि बीजेपी की पहल पर अगर पार्टी का एक भी नेता गिरफ्तार हुआ तो वह उसके एक लाख कार्यकर्ताओं को जेल में डाल देगी.

केंद्र से बिगड़ते रिश्तों के चलते ही मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने अब तक न तो नीति आयोग की बैठक में शिरकत की है और न ही माओवाद के मुद्दे पर दिल्ली में आयोजित मुख्यमंत्रियों की बैठक में भाग लिया है. वह केंद्र पर लगातार बंगाल की अनदेखी करने और केंद्रीय परियोजनाओं में कटौती के आरोप लगाती रही हैं.

राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि कम से कम बंगाल सरकार फिलहाल किसी भी मुद्दे पर केंद्र के साथ सहयोग के मूड में नहीं नजर आती. उल्टे विभिन्न मुद्दों पर दोनों के बीच की खाई लगातार बढ़ रही है. ऐसे में मोदी के न्यू इंडिया के सपने के हकीकत में बदलने की राह आसान नहीं है. एक पर्यवेक्षक सुनील प्रामाणिक कहते हैं, "प्रधानमंत्री मोदी को न्यू इंडिया का सपना साकार करने के लिए दलगत राजनीति से ऊपर ऊठते हुए तमाम राज्य सरकार व मुख्यमंत्रियों को भरोसे में लेना होगा. ऐसा नहीं होने तक नीति आयोग के प्रस्ताव फाइलों में ही दबे रहेंगे." लेकिन लाख टके का सवाल यह है कि क्या ममता बनर्जी मोदी के किसी सपने को पूरा करने में सहयोग देंगी? फिलहाल तो दूर तक इसकी कोई गुंजाइश नहीं नजर आती.

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