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विज्ञान

पारिजात के विलुप्त होने का खतरा

हजारों साल पुराना पारिजात वृक्ष अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है. इसके विलुप्त होने का खतरा पैदा होता जा रहा है. ऐसे चार पेड़ उत्तर प्रदेश में अब भी मौजूद हैं.

उत्तर प्रदेश में दुर्लभ प्रजाति के पारिजात के चार वृक्षों में से दो वन विभाग इटावा के परिसर में हैं जो पर्यटकों को "देवताओं और राक्षसों के बीच हुए समुद्र मंथन" के बारे में बताते हैं.

पर्याप्त रखरखाव के अभाव में कीट पतंगों और दीमक से इस वृक्ष का क्षरण हो गया है. इन पेड़ों में अब फूल भी नहीं आ रहे हैं. ऐसे में वन विभाग भी इस वृक्ष को बचाने में अक्षम महसूस कर रहा है. हिन्दू धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक पारिजात को जीवन प्रदान करने वाला कल्पवृक्ष माना गया है.

इटावा के अलावा पारिजात का पेड़ बाराबंकी स्थित रामनगर तथा ललितपुर में एसएस आवास परिसर में है. आकार में यह वृक्ष बहुत बड़ा होता है और देखने में सेमल के पेड़ जैसा लगता है. इसका तना काफी मोटा होता है.

बताया जाता है कि अगस्त में इस वृक्ष में सफेद फूल आते हैं जो सूखने के बाद सुनहरे रंग में बदल जाते हैं. इटावा में मौजूद दो वृक्ष सदियों पुराने बताए जाते हैं मगर इन वृक्षों में कभी फूल नहीं देखे गए. अस्तित्व की जंग लड़ रहे इस वृक्ष को बचाने के लिये वन विभाग लगातार प्रयास कर रहा है.

अपनी ख्याति के अनुरूप पारिजात सदियों से मानव जीवन के लिए उपयोगी रहा है. प्राचीन काल में इसके गूदे को सुखाकर आटा बनाया जाता था. इसकी छाल से थैले और वस्त्र बनाए जाते थे. इसके विभिन्न भागों का उपयोग जीवन रक्षक दवाएं बनाने में भी किया जाता था.

चूंकि पुराने समय में लोगों की जरूरतें कम थीं और यह पेड़ इंसान के काफी काम आता था. यही वजह थी कि एक बड़े समुदाय ने इसे कल्पवृक्ष यानि कामनाएं पूर्ण करने वाले वृक्ष की संज्ञा दी थी.

उत्तर प्रदेश के बाराबंकी में पाए जाने वाले इस पेड़ का वनस्पति शास्त्र के मुताबिक नाम आडानसोनिया डिजिटाटा है. अंग्रेजी में बाओबाब नाम से जाना जाने वाला ये पेड़ अफ्रीकी मूल का है. मध्य प्रदेश के मांडू और होशंगाबाद में भी ये बाओबाब मिलते हैं. बताया जाता है कि इनकी उम्र 1000 से 5000 साल हो सकती है.

जबकि महाराष्ट्र में पारिजात के नाम से जाने जाने वाला पौधा हरसिंगार का है जिसका वानस्पतिक नाम निक्टेंथस आर्बर ट्रिसट्रिस है. इन दोनों पेड़ों के गुण और रूप रंग बिलकुल अलग हैं.

रिपोर्टः आभा मोंढे (वार्ता)

संपादनः अनवर जे अशरफ

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