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ब्लॉग

पाबंदियां बढ़ाने की नहीं, बेड़ियां खोलने की है जरूरत

ये विडंबना ही है कि जो शिक्षा सबको बराबरी का पाठ पढ़ाती है, वही शिक्षा लेते समय युवा लड़कियां खुद भीषण भेदभाव की शिकार होती हैं. क्या समाज को सुरक्षित बनाने के लिए केवल महिलाओं का दमन ही एक तरीका है?

दुनिया भर के तमाम देशों में क्रांतियों और परिवर्तनों की बयार युवाओं और खासकर शैक्षिक संस्थाओं से बहनी शुरू हुई. इसलिए अगर हम और आप अपने भारत में बदलावों की उम्मीद करते हैं तो उसके लिए देश के युवाओं और शैक्षणिक परिसरों के हालात देखना लाजमी हो जाता है. जिन्हें और मुक्त किये जाने के बजाए उन पर कई तरह की बंदिशें लगाने की वकालत की जा रही है.

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के ठीक पहले भारत की महिला एवं बाल विकास मंत्री मेनका गांधी के एक बयान ने ध्यान दिलाया कि भारत में युवा शक्ति को अब भी कई प्रबुद्ध लोग "हॉर्मोनल विस्फोट” मानते हैं. वे युवा जो स्थापित मान्यताओं और ढांचों को नकारने की हिम्मत रखते हैं और उनमें सुधार कर एक बेहतर समाज बनाने की सक्रिय कोशिश करते हैं, उनकी गतिविधियों को सीमित करने के लिए कई प्रचलित और प्रस्तावित तरीके आते रहे हैं.

वैसे मंत्री जी ने लैंगिक बराबरी के सिद्धांत को मानते हुए लड़कों-लड़कियों दोनों के लिए कॉलेज हॉस्टलों के कर्फ्यू आवर को और सख्त करने की हिमायत की है. लेकिन यह तो सच है कि देश के कई कॉलेजों और यूनिवर्सिटीज में हॉस्टलों में रहने वाली लड़कियों की सुरक्षा के नाम पर कई अजीबोगरीब निर्देश जारी हैं. इनमें शाम को जल्दी हॉस्टल के गेट का बंद हो जाना, छोटे कपड़े पहनने पर रोक जैसी बातें शामिल हैं.

Deutsche Welle DW Ritika Rai (DW/P. Henriksen)

ऋतिका पाण्डेय, एडिटर, डॉयचे वेले हिन्दी

इन भेदभावपूर्ण नियमों को लेकर दिल्ली में ‘पिंजरा तोड़' जैसा अभियान जारी है तो विश्व के कुछ अन्य देशों में भी ऐसे ही संघर्ष हो रहे हैं. जाहिर है कि ऐसी लिंगभेदी सोच केवल भारत में ही नहीं है. महिलाओं की विकास और बेहतरी के साधनों तक पहुंच को, कहीं आने जाने की आजादी को, उनकी सेक्शुएलिटी को या फिर जिंदगी के कई ऐसे अनुभवों को लेने से रोकने की कोशिशें दुनिया में कई जगहों पर जारी हैं, जो किसी महिला को एक भरा पूरा जीवन जीने के बुनियादी हक से महरूम रखती है. लेकिन महिलायें ये बंधन नहीं चाहती और वे अपने लिये आजादी के नये दायरे बना रही हैं.

तुर्की के कुछ शहरों में महिलाएं चटक कपड़ों और मेकअप में सज कर 'साइकिल पर औरतें' नाम के अभियान का हिस्सा बनीं हैं. इसके माध्यम से वे सार्वजनिक जगहों पर देखी जाने और सड़कों पर भी अपने होने के हक को जता रही हैं. पाकिस्तान के कराची, लाहौर और इस्लामाबाद जैसे शहरों में 'गर्ल्स ऐट ढाबाज' जैसे अभियान चले हैं, जिनमें महिलाएं ढाबों में जाकर बैठती हैं ताकि बेहद सिकुड़ चुके उनके सार्वजनिक दायरे को फिर से फैलाया जा सके. ढाबे, सड़कें या ऐसी दूसरी सार्वजनिक जगहों पर महिलाएं क्रमश: अल्पसंख्यक बनती चली गईं. नतीजा ये हुआ है कि अब जब उन्हें किसी जरूरी काम से भी बाहर निकलना हो, तो उन पर नियंत्रण के लिए कहीं महिला हॉस्टलों के दमघोंटू नियम थोपे जाते हैं तो कहीं बिना कारण बताए इससे मना कर दिया जाता है. अगर फिर भी कोई लड़की देर शाम सड़क पर निकल भी जाए तो उसे आजादी कम और उसी तथाकथित सभ्य समाज का डर कहीं अधिक महसूस होता था.

जो शिक्षा सबको बराबरी का पाठ पढ़ाती है और भारतीय संविधान में धर्म, लिंग, जाति या किसी भी आधार पर इंसानों से भेद रखना नहीं सिखाती, वही शिक्षा लेते समय युवा लड़कियां ऐसे भीषण भेदभाव की शिकार होती हैं. क्या समाज को सुरक्षित बनाने के लिए केवल महिलाओं का दमन ही एक तरीका है? जब तक महिलाओं के लिए ऐसा माहौल नहीं बनता, जिसमें वे आजादी से अपनी सभी नागरिक, राजनीतिक, आर्थिक और सामुदायिक भूमिकाएं निभा सकें, बिना किसी डर के अपने जीवन से जुड़े हर छोटे बड़े फैसले ले सकें और जब तक पूरा समाज लैंगिक बराबरी को चुनौती देने वाली हर धारणा और चलन को नहीं नकारता, तब तक अवसरों और चुनाव की बराबरी का अधिकार हासिल करने का संघर्ष जारी रहेगा. ये सारी बेड़ियां एक एक कर खुलती ही जाएंगी और तब जाकर महिला दिवस मनाने की जरूरत नहीं रहेगी. 

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