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ब्लॉग

पानी का संकट कम नहीं होगा

भारत इस समय भयावह पानी संकट से जूझ रहा है. पानी के अभाव में करीब सौ लोगों की जान जा चुकी है और हालात सुधरने के आसार नहीं हैं. कुलदीप कुमार का कहना है कि सरकारें जल संसाधन प्रबंधन के प्रति गंभीर नहीं हैं.

भारत सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के सामने जो आंकड़े पेश किए हैं, उनसे इस संकट की व्यापकता का अंदाज लगाया जा सकता है. इस समय भारत में 33 करोड़ लोग सूखे की समस्या का सामना कर रहे हैं यानी देश की कुल आबादी का एक-तिहाई हिस्सा सूखे का संकट झेल रहा है. उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, महाराष्ट्र, कर्नाटक, गुजरात, ओड़ीशा, झारखंड, बिहार, हरियाणा और छत्तीसगढ़, एक दर्जन राज्यों के बड़े हिस्से में सूखा पड़ा हुआ है.

इक्यानवे जलभंडारों में उनकी कुल क्षमता का केवल 23 प्रतिशत पानी ही जमा है और यह मात्रा भी घटने वाली है क्योंकि अगले माह गर्मी और भी अधिक पड़ेगी. पिछले पंद्रह सालों से यह समस्या लगातार बढ़ती जा रही है लेकिन केंद्र और राज्य सरकारों ने इससे निपटने में कोई खास दिलचस्पी नहीं दिखाई है क्योंकि इस समस्या का सबसे अधिक असर गांव के किसानों पर पड़ता है और कृषि की ओर सरकारों का ध्यान ही नहीं है.

भूजल का गिरता स्तर

महाराष्ट्र के मराठवाड़ा अंचल में किसानों द्वारा लगातार की जा रही आत्महत्याएं अब अखबारों की सुर्खियां भी नहीं घेरतीं. देश के आजाद होने के बाद 1951 में प्रति व्यक्ति 5177 घन मीटर पानी उपलब्ध था लेकिन 2011 में यह घटकर 1545 घन मीटर ही रह गया क्योंकि तब से अब तक शहरों और महानगरों का जिस अनियोजित और अव्यवस्थित ढंग से विकास हुआ है उसमें पानी की जरूरत और उसकी उपलब्धता के अनुपात पर ध्यान नहीं दिया गया.

खेती में आज भी पानी का पारंपरिक ढंग से इस्तेमाल किया जा रहा है और इसमें नई तकनीकी और तौरतरीकों को नहीं अपनाया गया है. नतीजतन बहुत बड़ी मात्रा में पानी बर्बाद होता है. जोहड़, तालाब, कुएं, बावली आदि पाट दिये गए हैं और बहुत बड़े पैमाने पर भवन निर्माण होने के कारण जमीन के भीतर पानी की स्वतः होने वाली आपूर्ति बंद हो गई है जिसके कारण भूजल का स्तर लगातार गिरता जा रहा है.

नदियों का पानी प्रदूषित होता जा रहा है और जलभंडारों की डी-सिल्टिंग करने में कोताही बरती जाती है. इस सबका कुल मिलाकर असर यह है कि पानी की उपलब्धता लगातार कम होती जा रही है. यह समस्या केवल कुछ हद तक ही प्राकृतिक है और इसका अधिक दोष मनुष्य द्वारा प्रदर्शित लापरवाही पर ही आता है.

जागरुकता का अभाव

सरकारों की प्राथमिकता हमेशा उद्योग रहते हैं इसलिए आश्चर्य नहीं कि जहां जनता को पीने का पानी नहीं मिल रहा वहीं बियर बनाने वाले कारखानों को पानी सस्ते और रियायती दामों पर दिया जा रहा है. बोतलबंद पेयजल का कारोबार भी बहुत फैल चुका है और अरबों-खरबों के इस कारोबार की भी सरकारों को विशेष फिक्र है.

जाहिर है कि इस कारोबार के लिए जल जैसे प्राकृतिक संसाधन का निजी हितों के हक में दोहन किया जा रहा है. केंद्र सरकार की लापरवाही का इससे बड़ा प्रमाण क्या होगा कि केन्द्रीय जल संसाधन मंत्री उमा भारती ने हाल ही में एक इंटरव्यू में कहा है कि सूखे की “घटना” से निपटने के लिए पहले से कार्य-योजना कैसे तैयार की जा सकती है?

आने वाले दिनों में पानी का यह संकट कम होने वाला नहीं है. इसके विपरीत सभी संकेत इस संभावना की ओर इशारा कर रहे हैं कि इसकी भयावहता में लगातार वृद्धि होगी. सरकारों की ओर से शहरों और गांवों में रहने वालों को इस संकट के प्रति सचेत करने और पानी के इस्तेमाल में कटौती करने के उपाय अपनाने के बारे में जागरूकता पैदा करने के लिए अभी तक कोई खास पहल नहीं की गई है. भूजल का स्तर कैसे ऊपर उठे, इसके लिए भी सरकारों ने विज्ञान और तकनीकी का सहारा लेकर जरूरी और दूरगामी महत्व के कदम नहीं उठाए हैं. ऐसे में आने वाले दिन आशंका से भरे हुए ही दीख रहे हैं.

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