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दुनिया

पाक में हिंसा का लक्ष्य शांति वार्ताएं

पाकिस्तान में एक बार फिर पेशावर में गंभीर हमले हुए हैं. पाकिस्तान विशेषज्ञ क्रिस्टियान वाग्नर का कहना है कि इस इलाके में विवाद के कई पहलू हैं. हालात और बिगड़ सकते हैं.

डीडब्ल्यू: पश्चिमोत्तर पाकिस्तान के शहर पेशावर में बाजार में हुए ताजा हमलों में 40 से ज्यादा लोग मारे गए हैं और सौ से अधिक लोग घायल हुए हैं. इससे पहले सरकारी कर्मचारियों को लेकर जा रही एक बस और चर्च पर हुए हमलों में सौ से ज्यादा लोग मारे गए थे. क्या इन हमलों में कोई संबंध है?

क्रिस्टियान वाग्नर: यह कहना मुश्किल है, क्योंकि इलाके में बहुत अलग अलग तरह के गुट हैं. पेशावर के बाजार में हुआ ताजा हमला अमेरिका के ड्रोन हमले के खिलाफ बदले की कार्रवाई थी. चर्च पर हुआ हमला धार्मिक अल्पसंख्यकों पर हो रहे हमलों के सिलसिले की नई कड़ी हो सकता है. और पाकिस्तानी तालिबान के अंदर सरकार और तालिबान गुटों के बीच शांति वार्ता के मुद्दे पर झगड़ा चल रहा है. कुछ हमलों का लक्ष्य इस बातचीत में बाधा डालना है. स्थिति बहुत ही जटिल है, जो हमलों को अलग अलग वर्ग में डालने में मुश्किल पैदा करती है.

Dr. Christian Wagner

क्रिस्टियान वाग्नर अंतरराष्ट्रीय और सुरक्षा अध्ययन संस्थान एसडब्ल्यूपी के एशिया विभाग के प्रमुख हैं.

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने पाकिस्तान में सक्रिय तालिबान को हाल ही में बातचीत की पेशकश की थी. ये हमले शांति वार्ता की कोशिशों को कितना प्रभावित कर रहे हैं?

कुछ दिन पहले सरकार द्वारा बुलाए गए एक सर्वदलीय सम्मेलन में इस तरह की बातचीत पर आम सहमति थी. यह साफ नहीं है कि पाकिस्तानी तालिबान की राय क्या है. ऐसा लगता है कि राजनीतिक समाधान के लिए बातचीत करने में दिलचस्पी है, लेकिन ऐसे गुट भी हैं जो बातचीत के खिलाफ हैं. ये हमले उनकी इस बात में मदद कर रहे हैं कि बातचीत की तैयारी को नुकसान पहुंचे और वार्ता विफल हो जाए.

पेशावर पाकिस्तान के उन कबायली इलाकों की सीमा पर है जो इस्लामी कट्टरपंथियों और तालिबान के साथ साथ आतंकी नेटवर्क अल कायदा का गढ़ समझा जाता है. सरकार का इस इलाके पर कितना प्रभाव है?

इस्लामाबाद को पिछले सालों में निश्चित तौर पर कबायली इलाकों में सैनिक सफलता मिली है. उत्तरी वजीरिस्तान को छोड़कर इस इलाके में सेना का इस बीच कुछ हद तक नियंत्रण है. दूसरी ओर नागरिक प्रशासन को स्थायी ढांचा बनाने में कामयाबी नहीं मिली है. नियमित रूप से उग्रपंथी संगठनों के विभिन्न गुटों के बीच लड़ाई होती रहती है, नई हिंसक कार्रवाईयों के साथ.

इसके अलावा हम कबायली इलाकों में अक्सर विभिन्न धार्मिक गुटों, यानि सुन्नी बहुसंख्यकों और शिया अल्पसंख्यकों के बीच भी हिंसक झगड़े देख रहे हैं. कबायली इलाकों में सरकार का प्रभाव पिछले सालों में निश्चित तौर पर बढ़ा है, लेकिन वह सुशासन लाने से अभी भी मीलों दूर है, इसके लिए अभी भी इलाके में विकास और संरचना की कमी है.

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इस समय पाकिस्तान में ईसाई अल्पसंख्यकों की क्या हालत है?

ईसाई संस्थानों पर हमले या ईसाई अल्पसंख्यकों के खिलाफ दंगे बार बार हो रहे हैं. इसे संपूर्णता में देखना होगा. पिछले महीनों में पाकिस्तान में धार्मिक अल्पसंख्यकों यानि शिया, हिंदू और ईसाईयों के खिलाफ हिंसा बढ़ी है. एकल मामलों में यह समझना मुश्किल है कि हमलों के पीछे कौन था. क्योंकि उग्रपंथी सुन्नी गुटों का अपना नेटवर्क है, लेकिन उनका पाकिस्तानी तालिबान के साथ भी संपर्क है और वे ट्रेनिंग और ट्रांसपोर्ट के मामले में अक्सर सहयोग करते हैं. धार्मिक अल्पसंख्यकों की इस समय पाकिस्तान में स्थिति खराब है, क्योंकि वहां हिंसा का माहौल है, जिसका वे अक्सर शिकार होते हैं.

क्या हिंसा के और भड़कने का खतरा है?

मैं समझता हूं कि तालिबान गुट सरकार के साथ शांति वार्ताओं को रोकने की कोशिश करेंगे. यह सरकार की मुश्किलों को भी दिखाता है. उनसे बात करने वाला कोई नहीं है, और दूसरे पक्ष की कोई स्पष्ट नीति नहीं है, जिसपर बातचीत हो सके.पाकिस्तानी तालिबान पूरे देश में शरिया कानून को लागू करने की मांग कर रहे हैं, लेकिन यह बहुमत योग्य नहीं है. वे बंदियों की रिहाई की मांग कर रहे हैं, लेकिन इसे मानने में भी सरकार को दिक्कत होगी. अब तक तो संघर्षविराम पर भी सहमति नहीं हो पाई है, जो बातचीत की मुख्य शर्त होगी. इसलिए मेरा मानना है कि आने वाले हफ्तों में हमले जारी रहेंगे.

इस हालत में कौन असर डाल सकता है, बीच बचाव कर सकता है?

मॉडरेट इस्लामी नेताओं ने हिंसा का विरोध किया है.पाकिस्तानी तालिबान के नेतृत्व को भी असंतुष्ट गुटों को शांत कराना चाहिए या दंड देना चाहिए. लेकिन इसका नतीजा कबायली इलाकों में नई हिंसा होगा. यह एक मुश्किल स्थिति है. सरकार बातचीत की पेशकश कर और सेना तथा पुलिस की उपस्थिति बढ़ाकर पेशावर और इलाके में हिंसा पर काबू पाने की कोशिश करेगी.

क्रिस्टियान वाग्नर अंतरराष्ट्रीय और सुरक्षा अध्ययन संस्थान एसडब्ल्यूपी के एशिया विभाग के प्रमुख हैं.

इंटरव्यू: आना लेमन/एमजे

संपादन: ईशा भाटिया

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