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ब्लॉग

पाक नीति में अलग अलग संकेत

भारत और पाकिस्तान के संबंधों की कहानी काफी कुछ ग्रीक मिथक के राजा सिसिफस जैसी है. जब भी उनके सुधरने की संभावना प्रबल होती दिखती है, तभी कुछ-न-कुछ ऐसा हो जाता है कि वे फिर से तनावग्रस्त हो जाते हैं.

राजा सिसिफस को एक बड़ी चट्टान को धकेल कर पहाड़ी पर चढ़ाने की सजा मिली थी, पर वह जैसे ही पहाड़ी तक पहुंचता था चट्टान लुढ़क पड़ती थी और उसे फिर से पहाड़ी तक ले जाने का अंतहीन सिलसिला चलता रहता था. भारत और पाकिस्तान के संबंधों का भी यही हाल है. 19 फरवरी, 1999 को भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने बस द्वारा लाहौर पहुंच कर जो इतिहास रचा था और यात्रा के अंत में जारी लाहौर घोषणापत्र से जो उम्मीद बंधी थी, वह कारगिल युद्ध के कारण ध्वस्त हो गई. 6 जनवरी, 2004 को पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति जनरल परवेज मुशर्रफ ने प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को लिखित आश्वासन दिया कि पाकिस्तान के नियंत्रण वाली भूमि से भारत विरोधी कार्रवाई नहीं होने दी जाएगी. लेकिन इसके बाद मुंबई हमले हो गए जिन्होंने सब उम्मीदों पर पानी फेर दिया.

जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के शपथग्रहण समारोह में सभी सार्क शासनाध्यक्षों के साथ-साथ पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ भी शरीक हुए, तो लगा कि एक बार फिर दोनों देशों के बीच संबंधों को सुधारने की प्रक्रिया गंभीरता के साथ आगे बढ़ाई जाएगी. इसके बाद जब यह घोषणा हुई कि भारत की विदेश सचिव सुजाता सिंह और पाकिस्तान के विदेश सचिव ऐजाज अहमद चौधरी के बीच 25 अगस्त, 2014 को इस्लामाबाद में वार्ता होगी, तो इस आशा को और भी बल मिला. लेकिन इसके बाद जो कुछ हुआ, उससे लगता है कि एक बार फिर वही कहानी दुहराई जाने वाली है.

इसमें कोई शक नहीं कि नवाज शरीफ और पाकिस्तान का उद्योग एवं व्यापार जगत भारत के साथ रिश्ते सुधारना चाहते हैं क्योंकि उन्हें इस बात का पूरी तरह एहसास हो गया है कि तनावपूर्ण रिश्ते किसी के भी हित में नहीं हैं और यदि रिश्ते सुधरे तो इससे पाकिस्तान के आर्थिक विकास में मदद मिलेगी. भारत भी रिश्ते सुधारने के लिए बहुत इच्छुक है क्योंकि इससे उसे भी आर्थिक लाभ होगा. पाकिस्तान का राजनीतिक सत्ता प्रतिष्ठान अब इस निष्कर्ष पर पहुंच गया लगता है कि अब इस रुख को छोडने का समय आ गया है कि कश्मीर विवाद का समाधान होने के बाद ही भारत के साथ अन्य क्षेत्रों में संबंध सुधारे जाएंगे.

भारत बहुत पहले से कहता आ रहा है कि भारत और पाकिस्तान को वही मॉडल अपनाना चाहिए जो भारत और चीन ने अपनाया हुआ है यानि सीमा विवाद सुलझने का इंतजार न करके आर्थिक-व्यापारिक और राजनीतिक-सांस्कृतिक क्षेत्रों में सहयोग करना. लेकिन पाकिस्तान में सेना ही वहां की विदेश नीति और रक्षा नीति तय करती आई है. लगता नहीं कि वह इन्हें राजनीतिक सत्ता प्रतिष्ठान को सौंपने को तैयार है.

पिछले कुछ महीनों में जम्मू-कश्मीर में नियंत्रण रेखा पर गोलीबारी की घटनाओं में बढ़ोतरी हुई है. इनमें सैनिक भी मरते हैं और निर्दोष नागरिक भी. भारत का आरोप है कि गोलीबारी की आड़ में आतंकवादियों को पाकिस्तानी नियंत्रण वाले ‘आजाद कश्मीर' से भारतीय नियंत्रण वाले क्षेत्र में भेजा जाता है. हालांकि पाकिस्तान इसे बेबुनियाद आरोप बताता है, लेकिन अब अमेरिका समेत दुनिया के लगभग सभी देश मानते हैं कि पाकिस्तान जिहादी आतंकवाद का गढ़ है जहां अनेक आतंकवादी संगठन सक्रिय हैं. इनमें से कुछ स्वयं पाकिस्तान सरकार के खिलाफ हो गए हैं लेकिन लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मुहम्मद जैसे कई संगठन केवल भारतविरोधी आतंकवाद में लिप्त हैं. इन्हें पाकिस्तानी सेना की ओर से पूरा संरक्षण मिलता है.

यह सब सही है लेकिन क्या विदेश सचिव स्तर की वार्ता के ठीक पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का सेनाध्यक्ष, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार और सेनाधिकारियों एवं सैनिकों के सामने लेह और कारगिल में भाषण देते हुए यह व्यंग्य करना उचित था कि पाकिस्तान पारंपरिक युद्ध जीतने की क्षमता खो चुका है इसलिए भारत के खिलाफ छाया युद्ध लड़ रहा है? क्या इससे पाकिस्तान का राजनीतिक नेतृत्व कमजोर नहीं होता और सेना को यह कहने का मौका नहीं मिलता कि भारत पाकिस्तान के साथ संबंध सुधारने के बजाय उसे नीचा दिखाना चाहता है?

नरेंद्र मोदी का यह बयान एक ऐसे समय आया है जब नवाज शरीफ इमरान खान और मौलाना ताहिर-उल-कादरी की ओर से जबर्दस्त विरोध का सामना कर रहे हैं और राजनीतिक संकट में फंसे हैं. पिछले सप्ताह नवाज शरीफ ने भी सेनाध्यक्ष, आईएसआई के प्रमुख तथा पाकिस्तान के नागरिक एवं सैन्य प्रतिष्ठान के अनेक वरिष्ठ सदस्यों के सामने भाषण दिया था, लेकिन उसमें उन्होंने भारत के साथ अच्छे संबंध न होने पर अफसोस जाहिर करते हुए कहा था कि अब उन्हें सुधारने का समय आ गया है.

लेकिन मोदी तो अलग ही सुर में बोल रहे हैं. क्या उनकी सरकार की सुचिंतित नीति पाकिस्तान के प्रति कड़ा रुख अपनाने की होगी, जैसा रुख अपनाने के लिए विपक्ष में रहते हुए भारतीय जनता पार्टी सत्तारूढ़ कांग्रेस से कहा करती थी? या लद्दाख में दिया गया उनका बयान उस अवसर को ध्यान में रखकर दिया गया था और इससे उनकी सरकार की पाकिस्तान नीति के बारे में निष्कर्ष नहीं निकाला जाना चाहिए? इन सवालों का जवाब अगले कुछ महीनों के घटनाक्रम से ही मिल सकेगा.

ब्लॉग: कुलदीप कुमार

संपादन: महेश झा

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