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ब्लॉग

पाकिस्तान पर व्यावहारिक रुख की जरूरत

भारत 1965 के युद्ध में जीत की खुशी मना रहा है. सीमा पर पाकिस्तान के साथ नियमित गोलीबारी हो रही है. लोग मर रहे हैं. पाकिस्तान के साथ शांति बनाने के लिए भारत को नए रास्तों की तलाश करनी होगी.

किसी भी समाज के लिए यह अच्छी बात नहीं हो सकती कि युद्ध भले ही वह सीमित क्यों न हो सामान्य हो जाए, रोजमर्रा हो जाए. भारत और पाकिस्तान के साथ यही हुआ है. कश्मीर में महीनों से गोलीबारी हो रही है. लोगों की जान जा रही है, लेकिन सरकारें चुप होकर इंतजार कर रही हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के साथ बातचीत के बाद एक रास्ता निकालने की कोशिश की थी, लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों के मिलने की नौबत नहीं आई. भारत पाकिस्तान की जमीन से होने वाले आतंकवादी हमलों पर रोक चाहता है. पाकिस्तान उसे इस बीच फ्रेंचाइजी पर आतंकी गुटों को दे चुका है, जिस पर संभवतः उसका पूरा नियंत्रण भी नहीं रह गया है.

भारत और पाकिस्तान के बीच शांति की कोशिशें समय समय पर होती रही हैं. लेकिन हर बार उसे नियति तक पहुंचाने से पहले ही रोक दिया गया है. रणनीति की बिसात पर भारत के लिए कमजोर पहलू यह है कि वह पाकिस्तान की सेना को कमजोर नहीं कर पाया है. भारत के साथ संबंधों पर पाकिस्तान की नागरिक सरकार का नहीं बल्कि सेना का नियंत्रण है. और भारत सरकार को उसके साथ परोक्ष बातचीत करनी पड़ रही है.

यह भी सच है कि कश्मीर पाकिस्तान के लिए अस्तित्व का सवाल है. भारत और पाकिस्तान के बीच हो रहा छद्मयुद्ध समस्याओं का समाधान नहीं है. भारत को ही पाकिस्तान के लिए उसके अस्तित्व का जवाब ढूंढना होगा. जरूरत पड़ने पर उसे उसके भविष्य की गारंटी देनी होगी. 1999 में प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के लाहौर दौरे पर उनके स्वागत के लिए समारोह में शामिल होने से इंकार कर पाकिस्तानी सेना प्रमुखों ने भारत के प्रति अपना रुख साफ कर दिया था. पाकिस्तान एक विफल राष्ट्र है जहां सेना न तो शासन अपने हाथ में लेने को तैयार है और न ही नागरिक सरकार को काम करने देने और नियंत्रण छोड़ने को. भारत की विडंबना यह है कि वह बिना अधिकार वाले नागरिक शासन से बात करे या ताकतवर सेना प्रतिष्ठान से.

भारत को कूटनीति का प्रोटोकॉल छोड़कर व्यवहारवादी नीति तय करनी होगी. शांति उसके साथ तय करनी होगी जो अशांति के लिए जिम्मेदार है. पाकिस्तान की सेना के साथ बात करने का कोई रास्ता निकालना होगा और पाकिस्तान की सेना को समझाना होगा कि यह झगड़ा उसके भी हित में नहीं है. हाथ पर हाथ धरे बैठने से समस्या का समाधान नहीं हो सकता. शांति दोनों ही देशों के हित में है. इसे समझने के लिए लोगों की जान लेनी जरूरी नहीं.
ब्लॉग: महेश झा

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