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जर्मन चुनाव

पाकिस्तान ने चीन को सौंपा गिलगित !

चीन रणनीतिक लिहाज से बेहद अहम पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर के गिलगित बाल्टिस्तान इलाके पर अपनी पकड़ मजबूत कर रहा है. अमेरिकी मीडिया की कुछ रिपोर्टों का कहना है कि पाकिस्तान इस इलाके का नियंत्रण चीन को सौंप रहा है.

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अमेरिकी अख़बार द न्यूयॉर्क टाइम्स ने लिखा है कि गिलगित बाल्टिस्तान में दो नए बदलाव हुए हैं. पहला वहां पाकिस्तान सरकार का विरोध कम हुआ है और दूसरा, इलाके में चीन के 7,000 से 11,000 सैनिक आ गए हैं. अख़बार लिखता है, "चीन रणनीतिक क्षेत्रों पर अपनी पकड़ मजबूत करना चाहता है ताकि वह पाकिस्तान से होकर सड़क और रेल मार्ग के जरिए खाड़ी तक पहुंच सके. इसलिए वह तेज रफ्तार रेल और सड़क मार्ग बनाने में जुटा है." इसके सहारे चीन अपने पूर्वी इलाके से माल और तेल टैंकरों को सिर्फ 48 घंटे में बलूचिस्तान में ग्वादर, पासनी और ओरमारा में पाकिस्तान नौसैनिक ठिकानों तक पहुंचा सकेगा. ग्वादर में पाकिस्तानी नौसेना का ठिकाना चीन की मदद से तैयार किया गया है और यह खाड़ी के बिल्कुल करीब है.

अखबार लिखता है, "चीनी सेना के बहुत से सैनिक गिलगित बालिस्तान में दाखिल हो रहे हैं जो संभवतः रेल मार्ग तैयार करने का काम करेंगे. कुछ काराकोरम हाईवे का विस्तार भी करेंगे." यह हाइवे पाकिस्तान को चीन के शिनचियांग प्रांत से जोड़ता है. अन्य चीनी सैनिक बांधों, एक्सप्रेसवे और अन्य परियोजनाओं पर काम कर रहे हैं. आगे न्यूयॉर्क टाइम्स ने लिखा है कि गुप्त स्थानों पर गुपचुप तरीके से 22 सुरंगें भी बनाई जा रही हैं. इन जगहों पर पाकिस्तानी लोगों को भी जाने की मनाही है. ये सुरंग ईरान से चीन तक पहुंचने वाली गैस पाइपलाइन के लिए जरूरी होंगी. लेकिन अख़बार कहता है, "इन्हें मिसाइल रखने के लिए भी इस्तेमाल किया जा सकता है."

Pakistan Präsident Asif Ali Zardari

पाकिस्तानी राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी

अब तक अख़बार विदेशी खुफिया सूत्रों का ही हवाला दे रहा है. उधर पाकिस्तानी मीडिया और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने कहा है कि चीनी सैनिक अस्थायी शिविरों में रह रहे थे और अपना काम पूरा करके वापस चले गए. लेकिन अब पाकिस्तानी कश्मीर में एक बड़ा रिहायशी परिसर बनाया जा रहा है, जो लंबी मौजूदगी का संकेत देता है. न्यूयॉर्क टाइम्स कहा है कि इलाके में जो कुछ भी हो रहा है, वह अमेरिका के लिए चिंता का विषय है.

अख़बार लिखता है कि तालिबान से साठगांठ और चीन को खाड़ी क्षेत्र तक पहुंच मुहैया कराने से साफ होता है कि पाकिस्तान अमेरिका का दोस्त नहीं है. न्यूयॉर्क टाइम्स का कहना है कि क्षेत्र में लोकतांत्रिक अधिकारों और गिलगित और बाल्टिस्तान के लिए क्षेत्रीय स्वायत्ता के लिए चलने वाले स्थानीय आंदोलनों को कुचला रहा है. इन इलाकों में पाकिस्तानी सेना के साथ मिलकर सुन्नी उग्रवादी स्थानीय शिया मुसलमानों में दशहत फैला रहे हैं.

Besuch in China Manmohan Singh Wen Jiabao

चीन के रुख के भारत को परेशानी

अख़बार का कहना है कि पाकिस्तानी कश्मीर के संविधान में वर्णित 56 विषयों में से चार ही वहां की चुनी हुई विधानसभा के अधिकार क्षेत्र में आते हैं, बाकी मामले कश्मीर परिषद तय करती है जिसे पाकिस्तान के राष्ट्रपति नियुक्त करते हैं.

भारत से तुलना करते हुए अख़बार लिखता है कि वहां जम्मू कश्मीर की सरकार को ज्यादा अधिकार दिए जाते हैं. वहां होने वाले चुनाव भी स्वतंत्र और निष्पक्ष माने जाते हैं. साथ ही स्वायत्तता की मांग पर खुल कर बहस होती है.

अख़बार कहता है कि कश्मीर के मुद्दे पर अमेरिका की सीमित भूमिका ही हो सकती है. एक तरफ जहां भारत से अमेरिका के आर्थिक और सैन्य रिश्ते लगातार बढ़ रहे हैं, वहीं पाकिस्तान बहुत हद तक अमेरिका पर निर्भर है. अख़बार कहता है कि अमेरिका को भारत पर इस बात के लिए दबाव डालना चाहिए कि वह कश्मीरी अलगाववादियों के साथ स्वायत्तता पर बात शुरू करे ताकि पाकिस्तान को कश्मीर घाटी में उग्रवाद को हवा देने की अपनी नीति छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़े.

गिलगित और बाल्टिस्तान का इलाका चीन और अमेरिका के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण है इसलिए पाकिस्तान और भारत को मिल जुलकर यह सुनिश्चित करना चाहिए कि चीन इसका इस्तेमाल तिब्बत की तरह न करे.

रिपोर्टः एजेंसियां/ए कुमार

संपादनः ओ सिंह

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