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ब्लॉग

पाकिस्तान को मदद देना बंद करे पश्चिम

डॉयचे वेले के ग्रैहम लूकस बताते हैं कि पाकिस्तान की परमाणु हथियार जमा करने की होड़ भारत समेत पूरे दक्षिण एशिया के लिए कितनी खतरनाक साबित हो सकती है.

पाकिस्तान कहता है कि उसने अपनी सीमा से लगे हिस्सों में भारत की सैन्य तैयारी के जवाब में कई छोटे परमाणु हथियार विकसित किए हैं. भारत जिसे प्रतिरक्षात्मक तैयारी बताता है उसका मुकाबला करने के लिए पाकिस्तान अपने पूर्वी बॉर्डर पर निर्बाध तरीके से परमाणु हथियारों का जखीरा खड़ा करता रहा है. विशेषज्ञ बताते हैं कि 2015 तक पाकिस्तान के पास करीब 250 परमाणु हथियार आ चुके होंगे, जिसके अनुसार वह दुनिया का पांचवा सबसे बड़ा परमाणु राष्ट्र बन जाएगा. अगर पाकिस्तान ऐसे ही अंधाधुंध तरीके से आगे बढ़ता रहा और ये छोटे परमाणु हथियार आतंकवादियों के हाथ में पड़ गए तो फिर बेहद गंभीर खतरा पैदा हो सकता है.

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ग्रैहम लूकस, डॉयचे वेले

इस सबकी जड़ में अपने शक्तिशाली पड़ोसी भारत को लेकर पाकिस्तान का अविश्वास और भ्रांति है. लेकिन शायद भारत के पास पाकिस्तान को लेकर चिंतित होने की ज्यादा वजहें हैं. कश्मीर और अफगानिस्तान से लगी सीमा पर पाकिस्तान के राज्य समर्थित आतंकवादियों से खतरा और 2008 के मुंबई हमले की ही तरह भारतीय शहरों में आतंकी हमले होने का खतरा इसकी मिसाल हैं. पाकिस्तान ने मुंबई हमले के दोषियों को कानून के कटघरे में खड़ा करवाने के लिए शायद ही कोई कदम उठाया है.

पेशावर में स्कूल पर हुए हमले के बाद हाल ही में पाकिस्तान में आतंकरोधी अभियान चलाए गए. उसका मकसद केवल पाकिस्तानी तालिबान को फिर से पाकिस्तान की जासूसी संस्था आईएसआई के पूरे नियंत्रण में लाना था जिससे पाकिस्तानी सेना फिर से उनका इस्तेमाल 'राष्ट्रीय हित' में कर सके. पाकिस्तानी आईएसआई ने अब तक हक्कानी नेटवर्क से अपना नाता तोड़ने की कोशिश नहीं की है जिसका इस्तेमाल वह काबुल को अस्थिर करने में करती आई है.

अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा ने पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को देश के परमाणु हथियार कार्यक्रम की सीमा तय करने के लिए तैयार करने की एक असफल कोशिश जरूर की है. 1999 में सेना के तख्तापलट से हटाए गए शरीफ दूसरी बार प्रधानमंत्री बनने के बाद भी इस हालत में नहीं हैं कि सेना से लोहा ले सकें. वही सेना जो देश की विदेश और रक्षा नीति पर पूरा नियंत्रण चाहती है. भले ही शरीफ भारत के साथ बेहतर आर्थिक संबंध चाहते हों लेकिन सेना की इच्छा के विरुद्ध जाकर ऐसा कर नहीं सकेंगे.

ओबामा भी इस मामले में उन पर कोई असर नहीं डाल सकते. अफगानिस्तान से अमेरिकी सेना को वापस बुलाने और वहां राजनीतिक स्थिरता लाने के लिए ओबामा को पाकिस्तान की मदद की जरूरत है. लेकिन अमेरिका यह नहीं समझ रहा कि इस मामले में पाकिस्तान का अपना मकसद उनसे काफी अलग है. इस्लामाबाद काबुल की सत्ता संभालने वालों पर पूर्ण नियंत्रण चाहता है, चाहे वे तालिबान ही क्यों ना हों.

सैन्य तर्क के अनुसार, भारत के साथ युद्ध की स्थिति में पाकिस्तानी सेना को अफगानिस्तान की मदद लेनी होगी. इसीलिए अमेरिका का पाकिस्तान को आठ एफ-16 लड़ाकू विमान बेचने में मदद करना एक बड़ी भूल है. पाकिस्तान उनका इस्तेमाल आतंकवादियों के नहीं, बल्कि भारत के खिलाफ ही करेगा. अपने अमेरिका दौरे पर भी नवाज शरीफ ने भारत के साथ तनाव कम करने की किसी भी सलाह पर ध्यान नहीं दिया. समय आ गया है कि पश्चिमी देश पाकिस्तान की मदद करना बंद करें और हो सके तो उसके खिलाफ कुछ खास प्रतिबंध लगाएं. वरना कुछ भी नहीं बदलेगा और दक्षिण एशिया में स्थिति और तनावपूर्ण होती जाएगी.

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