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दुनिया

पाकिस्तान के जंगलों का दुश्मन

इस्लामाबाद और रावलपिंडी के आसपास के इलाकों में हर सर्दियों में एक सा नजारा देखने में आता है. लोग जलाऊ लकड़ी की दुकानों के आगे लंबी लंबी कतारों में खड़े दिखते हैं. ये वे दिन हैं जब घरों में गैस नहीं पहुंचती है.

भीषण सर्दियों वाले दिनों में घरेलू गैस की कमी और अधिक हो जाती है. अक्सर ऐसा भी होता है कि लोग रात का खाना बना रहे होते हैं या उन्हें घरों को गर्म करने के लिए गैस की जरूरत होती है, और उनके पास गैस नहीं होती. 50 वर्षीय मुहम्मद रजाक बेहद शिकायती लहजे में कहते हैं कि जब घरों में गैस नहीं पहुंचेगी तो इंसान लकड़ी जलाने के अलावा क्या करेगा? रजाक ने हाल ही में अपने घर के लिए काफी सारी जलाऊ लकड़ी इकट्ठी की है. उन्होंने कहा कि इस्लामाबाद के बाहरी इलाके में उनके किराए के मकान में गैस उपलब्ध नहीं थी. पिछली सर्दियों में उन्हें खाना बनाने, बर्तन धोने, नहाने और पानी गर्म करने जैसे हर काम के लिए जलाऊ लकड़ी खरीदनी पड़ी. गर्मियों के मौसम ने जलाऊ लकड़ी की खरीद को कम किया है, लेकिन पर्यावरणविदों को इस बात की चिंता है कि लगातार गैस की कमी जंगलों की कटाई को बढ़ावा देगी.

गैस की खपत में बढ़ोतरी

लगातार बढ़ रही आबादी से पिछले 20 सालों में पाकिस्तान में गैस की खपत 80 प्रतिशत बढ़ गयी है. घरेलू गैस कनेक्शन्स की संख्या दोगुनी से भी ज्यादा हो गयी है. पाकिस्तान के आर्थिक सर्वेक्षण 2016-17 के अनुसार ये संख्या 40 लाख से बढ़कर 84 लाख हो गयी है. हालांकि सरकारी रिपोर्ट्स के मुताबिक 30 प्रतिशत से भी कम घरों में गैस पहुंच पा रही है.
सरकारी स्वामित्व वाले तेल और गैस नियामक प्राधिकरण के मुताबिक प्रतिदिन 5.8 अरब घन फीट घरेलू गैस की जरूरत है, जबकि फिलहाल 1.7 अरब घन फीट गैस का ही उत्पादन हो पा रहा है. गैस नियामक प्राधिकरण ने इस वर्ष अप्रैल में चेतावनी दी थी कि प्रतिदिन का यह अंतर साल 2030 तक बढ़कर 3.9 अरब घन फीट तक पहुंच जायेगा.

पाकिस्तान के कमजोर सुरक्षा के हालत के चलते वह गैस की खोज में पर्याप्त निवेश नहीं कर पा रहा है, जिसके चलते भी वह गैस की मांग को पूरा नहीं कर पा रहा है. विशेषज्ञ इस कमी के लिए और भी कारणों को जिम्मेदार मानते हैं, जैसे उपलब्ध गैस पाईपलाइन की ठीक से देखरेख न होना और तेल के आयात की लागत को बचाने के लिए बड़ी मात्रा में गैस की सप्लाई पावर प्लांट्स में कर देना. प्रधानमंत्री के पूर्व ऊर्जा सलाहकार मुख्तार अहमद का अनुमान है कि 2030 तक पाकिस्तान में गैस की मांग 350 प्रतिशत तक बढ़ जायेगी. 

जितनी कम गैस, उतने कम पेड़

सरकार की राष्ट्रीय वन नीति की 2015 में छपी रिपोर्ट के मुताबिक गैस की कमी ने वन और पर्यावरण विशेषज्ञों को चिंता में डाल दिया है. रिपोर्ट के अनुसार गैस की कमी से हर साल 67,000 एकड़ जंगल काटे जा रहे हैं. संयुक्त राष्ट्र की खाद्य और कृषि संगठन की रिपोर्ट के अनुसार 1990 से अब तक हर साल लगभग 42,000 एकड़ जंगलों की कटाई हुई है. इसके अलावा 1990 से 2015 के बीच कुल जंगलों का 40 प्रतिशत हिस्सा काटा जा चुका है. रिपोर्ट के अनुसार पाकिस्तान की जमीन पर 2 प्रतिशत से भी कम हिस्से पर जंगल बाकी हैं. जो इस क्षेत्र में सबसे निचले स्तरों में से एक है.

दूसरा रास्ता

गैस की समस्या से निपटने के लिए पाकिस्तान में 350 से भी ज्यादा समुदाय आधारित पनबिजली परियोजनाओं की शुरुआत की जा रही है. इस पूरी परियोजना की कीमत 3 अरब रुपये से भी ज्यादा होगी. इस परियोजना से ग्रामीण इलाकों के लाखों घरों में बिजली पहुंचायी जा सकेगी. ये छोटे पनबिजली संयंत्र 35 मेगावाट बिजली पैदा कर सकेंगे. यह परियोजना लगभग 70 प्रतिशत तक पूरी हो गयी है और इसे और आगे बढ़ाया जायेगा. अब अगला लक्ष्य 2018 तक 1,000 पनबिजली सयंत्र लगाने का है.

एसएस/आरपी (थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन)

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