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ब्लॉग

पहाड़ पर प्रलय का एक साल

उत्तराखंड में पिछले साल आया जल प्रलय आजाद भारत के इतिहास में सबसे बड़े कुदरती कहर में से एक था. जमीन और जीवन छीन लेवे वाली उस तबाही की आज बरसी है. आपदा पीड़ितों के जख्म और आंसू अब भी जसकेतस हैं.

उत्तराखंड में 16 और 17 जून, 2013 को गढ़वाल मंडल की केदारघाटी, बदरीनाथ घाटी और गंगोत्री घाटी में अतिवृष्टि और भूस्खलन से हुई तबाही में हजारों लोग मारे गए. जीवनदायिनी भागीरथी, मंदाकिनी और अलकनंदा नदियों में, इंसानी बस्तियों का विनाश करने, सैलाब उतर आया था. मरने वालों का आधिकारिक आंकड़ा करीब पांच हजार का है लेकिन माना जाता है कि संख्या उससे कहीं ज्यादा है. अभी भी केदारघाटी के जंगलो में मानवकंकाल मिल रहे हैं. कंकालों की तलाश के लिए नए सिरे से टीमें गठित की गई हैं.

देश के 22 अन्य राज्यों के 3178 लोग लापता बताए गए थे. राज्य सरकार ने अब तक 2738 लापता यात्रियों के डेथ सर्टिफिकेट और मुआवजा उनके आश्रितों को दिया है. एक साल में सरकार सिर्फ मुआवजा ही बांट पाई. उत्तराखंड के प्रभावित इलाकों और चारधाम यात्रा रूट पर कामचलाऊ सड़कें बनी हैं. टूरिस्ट रेस्ट हाउस नहीं बन पाए हैं. पानी की योजनाएं जुगाड़ से चल रही हैं. लोगों को रिहायश नहीं मिली है. खेत नहीं मिले हैं. पुल, अस्पताल और स्कूल की बात तो छोड़ ही दीजिए.

वे इलाके, लगता ही नहीं कि 21वीं सदी के 'चमकदार' भारत के भूगोल का हिस्सा हैं. ऐसा अंधेरा, वीरानी और मायूसी वहां फैली हुई है. लोग लुटेपिटे और स्तब्ध हैं. यात्रा से जो उन्हें रोजगार मिल जाता है वो अब नगण्य रह गया है. चाहे वो साधारण होटल, ढाबा, लॉज, टैक्सी चलाने वाले हों, घोड़े खच्चर वाले हों, या छोटे दुकानदार हों. आजीविका के लिए छह माह के सीजन पर निर्भर चारधाम यात्रा इलाकों की लाखों की आबादी के जख्मों को एक साल बाद मरहम लगाना तो दूर छांव भी नसीब नहीं हुई है.

लेकिन सरकार का दावा है कि पुनर्निर्माण और पुनर्वास का काम युद्धस्तर पर जारी है. नदियों के किनारे सुरक्षा दीवार बनाई जा रही है. 2200 परिवारों को मकान बनाने की किश्त दी जा चुकी हैं. सरकार का दावा है कि बड़े पुल बनाने में समय लगेगा लिहाजा संपर्क से अलग हुए इलाकों को जोड़ने के लिए वैली ब्रिज बनाए गए हैं.

सरकारी दावों के बीच बरबाद इलाके सूने हैं, तबाही का असर यात्रियों की संख्या पर पड़ा है. एक अनुमान के मुताबिक जून में यात्रा शुरू होने से लेकर अब तक अकेले केदारनाथ में ही लाखों की भीड़ और करोड़ों का चढ़ावा आ जाता था लेकिन इस बार अब तक भीड़ कुछ हजार की है और मंदिर का राजस्व कुछ लाख में सिमट गया है. जल्द ही मॉनसून उत्तराखंड पहुंचेगा और अगले करीब दो ढाई महीने यात्रा और फीकी पड़ने की आशंका है. जल प्रलय ने उत्तराखंड की स्थानीय आर्थिकी को छिन्न भिन्न कर दिया है.

विकास के विरोधाभासों और मुनाफे की संस्कृति के बीच पहाड़ अब एक नई विभीषिका के सामने है. आज इतनी बहसों के बाद कोई नहीं समझ पा रहा है कि पहाड़ के लिए विकास का कौन सा मॉडल सही और उपयुक्त होगा. कौन सा मॉडल ऐसा होगा जो जन पक्षधर कहलाया जा सकेगा. क्या वे जलविद्युत परियोजनाएं होंगी? एशिया का सबसे बड़ा बांध टिहरी में बेतहाशा बिजली उत्पादन और बेतहाशा विस्थापन करता हुआ भागीरथी घाटी पर एक दानव की तरह बैठा हुआ है. ये बिजली स्थानीय इलाकों के कितने काम आ रही है कोई नहीं जानता. चमोली में अलकनंदा घाटी की परियोजनाएं लोगों को डराते हुए बन रही हैं.

उत्तरकाशी की चार बिजली परियोजनाएं पहाड़ और जंगल को नोचकर आस्थावादियों के दबाव में बंद कर दी गई हैं. पिथौरागढ़ की धौलीगंगा परियोजना को जल-प्रलय ने ध्वस्त कर दिया है. राष्ट्रीय राजमार्ग कहे जाने वाले रास्ते फट गए हैं, उन्हें पानी ने और पत्थरों ने और निर्माण एजेंसियों के किए धरे ने नेस्तनाबूद किया. पर्यटन की बात की जाती है लेकिन पहाड़ में उद्योग धंधों और पक्के मुकम्मल रोजगार के लिए क्या नीति बनी है, अब ज्यादा पेचीदा हालात हैं. विकास के साथ आस्था और पर्यावरण के मुद्दे भी आ जुड़ें हैं और एक दूसरे से टकरा रहे हैं.

हिमालय नया पहाड़ है. मध्य हिमालय और भी कच्चा पहाड़ है. नदियां अपने रास्ते बदलती जा रही हैं. सुरंगे काटी जा रही हैं, पेड़ काटे जा रहे हैं. हवाएं और मॉनसून लोगों पर टूट रहे हैं. और इन सबसे बेपरवाह बड़े पैमाने पर निर्माण किया जा रहा है. केदारनाथ मंदिर के आसपास निर्माण से लेकर केदार घाटी और बदरीनाथ घाटी में हुए निर्माण शॉर्टकट विकास और तुरत फुरत मुनाफे का माध्यम बने हैं. विनाश की लीला दूरगामी हो गई है.

नवंबर के बाद चारों धामों में बर्फ गिरने लगती है और कपाट बंद कर दिए जाते हैं. जब सब घंटे-घड़ियाल, शंखनाद बंद हो जाएंगे, पूजा आरती हो जाएगी, मंदिरों के पुरोहित और अफसर आदि लौट जाएंगे फिर उन इलाकों की नीरवता और भीषणता से निपटने के लिए क्या तैयारी होगी. वहां के लोग कैसे गुजर बसर करेंगे और कहां रहेंगे, इसका जवाब फिलहाल किसी के पास नहीं है. सारी सड़कें राजधानी को लौट आएंगी.

ब्लॉगः शिवप्रसाद जोशी

संपादन: ईशा भाटिया

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