पहाड़ों पर चढ़ने की ट्रेनिंग | मंथन | DW | 14.11.2013
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मंथन

पहाड़ों पर चढ़ने की ट्रेनिंग

यूरोप में लोग ट्रेकिंग करना खूब पसंद करते हैं. लेकिन ट्रेकिंग का मतलब यह नहीं कि बस जूते पहने और निकल गए. यूरोप में पहाड़ों पर सही और सुरक्षित तरीके से चढ़ने की ट्रेनिंग दी जाती है. दो दिन की ट्रेनिंग का खर्च 100 यूरो.

खूबसूरत पहाड़ों में घूमना जर्मनी में लाखों लोगों की पसंद है. यहां पहाड़ी रास्तों को खास ट्रेक करने वालों के लिए मापा गया है. लेकिन पहाड़ों पर चढ़ना खतरनाक भी साबित हो सकता है. पिछले साल जर्मनी में पहाड़ चढ़ने वालों में 226 लोग घायल हुए. पांच साल पहले के मुकाबले यह संख्या 25 फीसदी बढ़ी है.

जर्मन आल्प यूनियन दुनिया का सबसे बड़ा माउंटेन स्पोर्ट क्लब है और इसमें दस लाख लोग हैं. इस क्लब के लोग मिल कर बवेरिया प्रांत के जंगलों में ट्रेक करना खूब पसंद करते हैं. खासकर म्यूनिख की श्लियर झील में ट्रेक करने दूर दूर से लोग आते हैं. झील तक गाड़ी में आ कर पहाड़ों पर चढ़ा जा सकता है. क्लब के नए सदस्यों को यहां ट्रेकिंग का कोर्स कराने के लिए लाया जाता है.

दो दिन के 100 यूरो

कोर्स में हिस्सा लेने वाले आल्प प्रेमियों को यहां नक्षे पढ़ना और जंगल में रास्ते का पता लगाना सिखाया जाता है. दो दिन के कोर्स में 100 यूरो लगते हैं. ट्रेकिंग के अलावा सैलानी पहाड़ों में पौधों और जानवरों के बारे में भी जानकारी हासिल करते हैं.

पिछले सालों में ट्रेकिंग की छवि बदली है. पहले माना जाता था कि इस तरह से पहाड़ों की सैर करना बूढ़े लोगों के लिए वक्त गुजारने का तरीका है. लेकिन अब 16 साल के स्कूली बच्चों में भी यह काफी लोकप्रिय है.

लेकिन पहाड़ों में चढ़ना खतरनाक भी हो सकता है. सबसे जरूरी है अपने आसपास के माहौल को समझना और खुद को उसमें ढालना. ट्रेनर अनेट बाबेल बताती हैं, "पहाड़ चढ़ने में इंसान का सबसे बड़ा रोड़ा वह खुद ही होता है. हम अपनी क्षमताओं को बढ़ा चढ़ा कर देखते हैं, हम सोचते हैं कि हम कर ही लेंगे, लेकिन असल में हम इसके लिए ठीक तरह से तैयार नहीं होते. इसलिए सबसे जरूरी है कि हम खुद को अच्छी तरह तैयार कर लें."

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पहले माना जाता था कि पहाड़ों की सैर करना बूढ़े लोगों के लिए वक्त गुजारने का तरीका है.

बाजार को मुनाफा

तैयारी करने के लिए खास किताबें भी मिलती हैं. इनमें से कई बेस्टसेलर भी बन गयी हैं. जर्मन व्यंग्य लेखक हापे केरकेलिंग की किताब, "लो, मैं तो निकल पड़ा" भी काफी सफल रही है. म्यूनिख में एक ऐसा बुक स्टोर भी है जहां केवल यात्रा से संबंधित किताबें मिलती हैं. जियोबूख बुक स्टोर के येंस शैरडेल का कहना है, "ट्रेकिंग करने वालों की संख्या बढ़ी है. अब केवल एक्सपर्ट ही नहीं, बल्कि आम लोग भी इसमें हिस्सा लेते हैं. इसलिए हमारा बाजार बड़ा हो गया है."

ट्रेकिंग के लिए कपड़े और बैग का बिजनस भी बढ़ रहा है. कई कंपनियां अच्छा खासा मुनाफा कमा रही हैं. ग्राहक चाहते हैं कि कपड़े ट्रेकिंग के काम तो आए हीं, साथ ही फेशनबल भी लगें. स्पोर्ट्सवेयर बनाने वाली कंपनी ग्लोबट्रोटर के ब्योर्न लांपमन बताते हैं, "ज्यादातर लोग तो खरीदते वक्त यही सोचते हैं कि वह चीज ट्रेकिंग के दौरान कितने काम आएगी, लेकिन महिलाएं तो रंगों पर भी खूब ध्यान देती हैं और सोचती हैं कि वे कपड़े उन पर कैसे लगेंगे."

सही एक्विपमेंट चुनने के बारे में भी ट्रेकिंग के कोर्स में बताया जाता है. ट्रेकिंग करते वक्त अक्सर नॉर्डिक वॉकिंग के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले डंडों का इस्तेमाल किया जाता है. ट्रेनर अनेट बाबेल बताती हैं कि ये डंडे बेहद हल्के होते हैं, इनका वजन ना के बराबर होता है और लोगों को इनसे चढ़ाई में आसानी होती है.

इसमें कोई शक नहीं कि पहाड़ों के रास्ते के सफर में अगर तकनीक और सही एक्विपमेंट साथ हो, तो सफर का मजा और बढ़ जाता है.

रिपोर्टः रूथ क्राउजे/मानसी गोपालकृष्णन

संपादनः ईशा भाटिया

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