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दुनिया

पहचान ढूंढता गजनवी का शहर

अफगानिस्तान के शहर गजनी को साल 2013 के लिए एशिया की इस्लामिक सांस्कृतिक राजधानी चुना गया है. आयोजकों के बड़े बड़े दावे हैं लेकिन युद्ध में फंसे शहर में इतनी चौकसी है कि सैलानियों को यहां लाना मुश्किल काम है.

काबुल से 140 किलोमीटर दूर इस शहर की सांस्कृतिक प्रसिद्धि मध्यकाल के शासक महमूद गजनवी की देन है. गजनवी की ही बदौलत इस इस्लामिक राज्य में फारसी और तुर्की कलाओं ने सांस ली जिनका प्रसार भारत तक हुआ. 10वीं सदी में गजनवी ने यहां मध्य एशियाई लेखकों और दार्शनिकों को बढ़ावा दिया, जिससे शहर की अलग पहचान बनी.

गजनी में सांस्कृतिक धरोहरों को नया रूप देने में जर्मनी भी लगा है. जर्मनी की आखेन यूनिवर्सिटी के कार्सटेन ले महमूद गजनवी से जुड़ी चीजों को दोबारा जमा कर रहे हैं. डॉयचे वेले से बातचीत में उन्होंने कहा, "यूरोपीय अंदाज में अगर देखें तो अलग अलग संस्कृतियों के एकीकरण का यह एक जबरदस्त नमूना है." ले 2010 से एक पूरी टीम के साथ शहर की सांस्कृतिक धरोहरों को बचाए रखने के लिए काम कर रहे हैं.

किले पर नजर

गजनी में सबसे मशहूर है यहां का किला. किले के आस पास दो मीनार हैं और शहर की सीमा तय करती एक लंबी दीवार. किले के संरक्षण के लिए जर्मनी ने 17 लाख यूरो (लगभग 12 करोड़ रुपये) की मदद दी है. ले बताते हैं, "पहले तो हम दीवार की हालत देख कर ही हैरान रह गए. यहां हमारे काम का मकसद लोगों को यह सिखाना नहीं है कि इमारतों का संरक्षण कैसे करते हैं, हमारा मकसद है इस प्रोजेक्ट को पूरा करने में और यहां के लोगों की सांस्कृतिक धरोहर को संजोने में मदद करना."

उन्होंने बताया कि उनकी टीम 1,500 मीटर तक दीवार की मरम्मत कर चुकी है. इस काम में 400 कर्मी लगे हुए हैं. ऐसे में तालिबान से खतरा भी बढ़ जाता है क्योंकि आत्मघाती हमलावर ऐसे ही ठिकाने ढूंढते हैं, जहां भीड़ भाड़ हो. लेकिन ले को इस बात की भी चिंता नहीं है. इसकी वजह यह है कि गजनी में रहने वालों ने तालिबान का सामना करने के लिए खुद ही नागरिकों की सेना तैनात कर रखी है.

गजनी की मुश्किलें

बाहर से आने वालों के लिए गजनी पहुंचना आसान नहीं. पत्रकार आरिफ का कहना है, "मैं फिलहाल गजनी नहीं जा सकता. कोई भी विदेशी मीडिया के साथ या विदेशियों के साथ मिल कर काम कर रहा है, तालिबान ने उन सब की जान लेने की धमकी दी हुई है."

यही वजह है कि प्राइवेट रेडियो चलाने वाले वहीदुल्लाह उमरयार स्काइप के जरिए दुनिया से संपर्क कर रहे हैं. अपनी खुशी जाहिर करते हुए वह कहते हैं, "जब गजनी को सांस्कृतिक राजधानी चुना गया तो हम सब को बेहद खुशी हुई. अब इस शहर के इतिहास को फिर से जीवित किया जा रहा है और दुनिया हमें भूल नहीं सकेगी." लेकिन वह साथ ही यह भी बताते हैं कि गजनी के लिए यहां तक पहुंचना एक बेहद ही मुश्किल काम रहा है और शहर के लिए चल रहे 30 प्रोजेक्ट्स में से कुछ ही पूरे हो पाए हैं.

अफगान मीडिया में तो ऐसी अटकलें भी लग रही हैं कि गजनी में जश्न शुरू होने से पहले ही उससे यह खिताब छिन जाएगा. उमरयार बताते हैं कि अमेरिका की ओर से करीब डेढ़ करोड़ डॉलर भेजे जा चुके हैं, "मैं नहीं जानता कि इस पैसे को कहां लगाया गया है. अब तक कोई प्रोजेक्ट पूरा नहीं हुआ है. यहां तक कि गजनी में हवाई अड्डा तक नहीं है. फिर पर्यटक आएंगे कैसे?"

खराब ढांचा

गजनी की आबादी एक लाख चालीस हजार है. लोगों को बेहतर बिजली का वादा किया गया था. यह भी योजना थी कि 150 किलोमीटर तक बेहतरीन सड़कें बनाई जाएंगी. अब तक 50 किलोमीटर ही बन सकी हैं. ऐसे में शहर को उम्मीद नहीं है कि आर्थिक तौर पर इस खिताब से कोई फायदा मिल सकेगा. आरिफ कहते हैं, "खानापूर्ती के लिए कुछ प्रतिनिधिमंडल आ जाएंगे. उनकी सुरक्षा के लिए पुलिस और सेना तैनात रहेगी और फिर एक दो दिन बाद चले जाएंगे."

इसे देखते हुए जानकारों की मांग है कि गजनी को चित्रों, फिल्मों और प्रदर्शनियों के माध्यम से दुनिया के सामने पहुंचाया जाए. यानी जहां लोग नहीं पहुंच सकते, वहां शहर खुद ही लोगों तक पहुंच जाए. शायद ऐसा कर 2000 साल बाद महमूद गजनवी का शहर दुनिया के आगे अपनी पहचान बना पाएगा.

रिपोर्ट: मार्टिन गेर्नेर/एसएम, आईबी

संपादन: ए जमाल

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