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मनोरंजन

पहचान खो रहा है ये शहनाई वाला गांव

बदलते आर्थिक हालात ने भारत के कई हिस्सों में पहचान का संकट पैदा कर दिया है. उत्तरप्रदेश का मंझावान गांव भी उनमें है.

अगर आप कानपुर जिले के मंझावान गांव की गलियों में घूम रहे हैं तो आपको कानों में शहनाई के सुरीले स्वर सुनाई पड़ेंगे. लेकिन आपको इसके लिए एक जगह खड़े होकर शहनाई वादन सुनने की आवश्यकता नहीं हैं. आप चलते रहिए, हर घर से आपको एक ही राग सुनायी पड़ेगा.

ऐसा इसलिए हैं कि इस गांव में लगभग सभी लोग शहनाई वादक हैं. दूसरी बात ये हर सुर समय के हिसाब से बजाते हैं. मतलब समय के प्रहर के हिसाब से राग तय हैं. दूसरा राग बजाना गलत समझा जाता है क्योंकि यहां इनकी भाषा में सोते हुए राग को जगाना गलत होता है. इसी से पुरानी कहावत है--बेवक्त की शहनाई न बजाया करो.

लोग भले शहनाई वादन का मतलब सिर्फ भारत रत्न उस्ताद बिस्मिल्लाह खान को माने लेकिन कानपुर से लगभग 27 किलोमीटर की दूरी पर घाटमपुर तहसील के अंतर्गत आने वाले मंझावान गांव में पिछले 10 पीढियों से शहनाई वादक रह रहे हैं. हर घर में शहनाई वादक हैं अगर किसी के यहां नहीं हैं तो समझिये उसने तंगहाली में शहनाई उठा कर रख दी है. गांव के निवासी जलील, शकील, बशीर, कल्लन, गुग्गल, शरीफ, रईस, नूर, नबी और सभी के नाम के आगे मास्टर लगा है. क्यूंकि सब शहनाई वादक हैं और गांव कहलाने लगा शहनाई वालों का गांव.

भारत में शहनाई वादन का इतिहास बहुत पुराना है. मंझावान निवासियों को इतना पता नहीं है क्योंकि शायद ही कोई पढ़ा लिखा है. "हम लोग पिछली 8-10 पीढियों से यहीं रह रहे हैं. यानी 200-250 साल से. हम लोगों ने ये कला अपने नाना गुलाम हुसैन से सीखी जो रीवा के राजदरबार में शहनाई बजाते थे और ये खानदानी परंपरा चली आ रही है,” जलील मास्टर, जो अब भी 65 साल की उम्र में शहनाई बजाते हैं. हां, उन्होंने खर्चा पूरा करने के लिए टेंट हाउस भी खोल लिया है.

लेकिन अब शहनाई से परिवार चलाना मुश्किल हो चला है. बदलते परिवेश में अब लोग शहनाई की मोहक स्वर ध्वनि पर ध्यान नहीं देते हैं. संगीत अब तेज हो चला है ऐसे में शहनाई पिछड़ गयी है. मंझावान के कुछ शहनाई वादक भी अनपढ़ रह गए और नए बोल नहीं सीख पाए. वैसे इनके पास काफी पुरानी किताबें हैं जिनमे सुर लिखे हुए हैं. नए किसी भी बोल का इस सुर की किताब से मिलान ज़रूरी होता है. मंझावान के ही शहनाई वादक निकल कर दिल्ली, वाराणसी, लखनऊ, महोबा, रीवा और ग्वालियर तक फैल गए हैं. शकील मास्टर बताते हैं कि सब जगह इनकी रिश्तेदारियां हैं.

पैसे न कमा पाने की एक वजह ये भी हैं कि इस शहनाई के गांव वाले अपने आप को ब्रांड के रूप में स्थापित नहीं कर पाए. भारत में शहनाई वादन में सबसे बड़ा नाम बनारस के उस्ताद बिस्मिल्लाह खान का है. उनको देश का सर्वोच्च भारत रत्न पुरस्कार भी दिया गया. देश विदेश में उनकी धूम मची रहती थी. उस्ताद बिस्मिल्लाह खान बनारस के पर्याय बन गए. इसीलिए आज भी शहनाई वादन में सबकी जुबान पर बनारस का ही नाम आता है.

शकील बताते हैं कि इसका नुक्सान इन लोगों को बहुत होता है. ज्यादातर बुकिंग शादी विवाह में बजने वाले बैंड बजाने वालो के जरिये होती है. वो लोगों से बनारस के शहनाई वादक के नाम पर ज्यादा पैसा लेते हैं और केवल 4-5 हजार में मंझावान से लोगो को बुला लेते हैं. औसत में एक सहालग में 15-20 प्रोग्राम एक परिवार को मिल जाते हैं. एक का पेमेंट करीब 4-10 हजार तक होता है. लेकिन इसमें से ढोलक, मंजीरावाला, बोलवाला को भी देना पड़ता है.

शहनाई सीखने में 7-10 साल लग जाते हैं. जलील मास्टर के अनुसार उन्होंने 15 साल रियाज किया तब पारंगत हुए. जैसे जैसे मांग कम हो रही है वैसे ही शहनाई भी छोटी होती जा रही है. पहले 22 इंच लम्बी शहनाई होती थी और 16 इंच वाली रह गयी है. सुरों के लिए शहनाई में छेद होते हैं जिन्हें उंगलियों से कंट्रोल किया जाता है. अब नए लड़के छोटी शहनाई बजा रहे हैं क्योंकि अगर सुर दूर हुए तो मेहनत ज्यादा लगेगी.

उस्ताद बिस्मिल्लाह खान भले अब नहीं रहे लेकिन बनारस से शहनाई का रिश्ता अभी भी बना हुआ हैं. शहनाई बनाने में लगने वाला लकड़ी का हिस्सा और सुर बजाने वाला हिस्सा दोनों बनारस से आता है. एक शहनाई लगभग 1600-1800 की तैयार हो जाती है. पहले शहनाई वादन को रजवाड़ों ने प्रश्रय दिया. हर शुभ काम पर शहनाई बजायी जाती थी. जब मुगल सल्तनत ढल रही थी तब शहनाई वादक दूसरी जगह चले गए उनमें से कुछ उत्तर प्रदेश के कानपुर जिले में मंझावान में बस गए. लेकिन अब समाज में शहनाई वादन के कद्रदान नहीं बचे हैं और यहां के शहनाई वादक भी आजीविका के लिए तरस रहे हैं. लोग बैठे रहते हैं कि कोई मौका आये और उनकी बुकिंग हो. हालात ये है कि धीरे धीरे ये शहनाई का गांव भी अपनी पहचान खो देगा.

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