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फीडबैक

पश्चिमी देशों के बुरे असर है छोटे कपड़े

महिलाओं का बलात्कार और सिगरेट की बिक्री पर रोक, इन विषयों पर पाठकों से हमें बहुत सारे अलग अलग तरह के विचार मिले हैं. क्या सोचते हैं वे, पढ़िए यहां ...

भारत में हर दिन औसतन 92 महिलाओं का बलात्कार हो रहा है. क्या वाकई इसकी वजह उनके कपड़े हैं... इस पर बहुत से लोगों ने अपने अपने मत दिए हैं :

ऐशा खान: न तो फिल्में और न ही औरतों के छोटे कपडे जिम्मेदार हैं इसके. मर्द खुद जिम्मेदार हैं वे औरतों का बुलंदी पर चढ़ना पसंद नहीं करते. वे नहीं चाहते औरतों के कदम आगे बढे. मर्द में खुद ही कंट्रोलिंग नहीं होती.

शुबस गोयल: इसकी वजह कमजोर कानून हैं. अगर भारत में कुछ कानून लागू होते जैसे बलात्कारियों को सीधा फांसी दे देना, तो ऐसा कोई नहीं करता. हर बेटी की इज्जत का खिलवाड़ नहीं होता.

संदीप कुमार करोले: इसकी वजह आज की फिल्में हैं और कमजोर कानून व्यवस्था है.

मुकेश पंवार: यह सही है क्योंकि छोटे कपड़ों को देखने से आदमी की वासना जग जाती है और जब तक ऐसा चलेगा रेप होते रहेंगे.

लकी सिंह: बलात्कार का असली कारण फिल्मों में अश्लीलता दिखाई जाना है, एडल्ट विज्ञापन हैं. आज की तारिख में सीरियल से लेकर मूवी चैनल तक, स्पोर्ट्स से लेकर न्यूज चैनल तक, सब में अश्लीलता दिखाई जाती हैं. विज्ञापन भी एडल्ट होते हैं. यही कारण है बलात्कार के.

संतोष अग्निहोत्री : क्या महिलाएं आदमी की तरह पूरा कपड़ा पहनने पर अच्छी नहीं लगती, क्या शर्म करना अच्छी बात नहीं है इन बातों पर अमल हो तो शायद कमी आये.

जुनैद फारूकी: न लड़की के कपड़ो की गलती, न मर्दों की गलती, बल्कि उनके माता पिता की गलती है क्योंकि वे देश की सभ्यता को भंग करने की इजाजत देते हैं.

धीरज बाजपेय: नही, दूषित मानसिकता के कारण बलात्कार जैसे जघन्य अपराध होते हैं तथा जो पुरूष इन अपराधो में संलिप्त होते हैं वे स्त्रियों को उपभोग की वस्तु समझते हैं, न कि जीवित व्यक्ति, जिनके अपने भी मानव अधिकार है और उन्हें भी अपनी इच्छानुसार अपनी जिंदगी जीने का हक है.

संदीप कुमार: बलात्कार की वजह केवल छोटे कपड़े ही नहीं हैं लेकिन छोटे कपड़े कुछ योगदान अवश्य देते होंगे ......इतिहास में पढ़ा था कि बहुत समय पूर्व मनुष्य पेड़ो के पत्तो से या पेड़ो की छालो से शारीर को ढकता था. मजबूर था कपड़े का अविष्कार नहीं हुआ था . अब जबकि कपड़े की कमी नहीं है तो ऐसी क्या मजबूरी है कि शरीर को सही से न ढका जाये. कपड़ों को विभिन्न प्रकार का फैशन कहा जा सकता है पर फैशन के नाम पर कपड़ों को न के बराबर पहनना कौन सा फैशन है.

अनिल द्विवेदी : जब भी कोई लड़की या महिला कम कपड़े में सामने से गुजरती है तो जाहिर है एक ही शब्द "सेक्सी" लगभग 80-90 फीसदी लोगों के मन से निकलता है. अर्थात कम कपड़ों से कुछ भड़काऊ संकेत तो मिलते हैं लेकिन कम कपड़े बलात्कार के लिए पूरी तरह से जिम्मेदार नहीँ हैं. इनके अलावा पोर्न साइटें, एकाकी जीवन, नशे का सेवन, सख्त कानून का डर नहीं, महिला का एकांत में होना, गैर जिम्मेदाराना परिवार भी जिम्मेदार हैं.

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सरकार ने खुली सिगरेट की बिक्री पर रोक लगाने की बात कही है, इस विषय पर यूनुस खान का कहना है कि इससे सिगरेट पीने वाले कम होंगे लेकिन जो दिन में केवल चार सिगरेट लेते थे अब पूरा पैकेट जेब में रखेंगे और शाम तक उसे पीकर खत्म कर देंगे.

हेर फोरवेर्ट्स लिखते हैं इंसान सिगरेट पियेगा या नहीं वह उसकी अपनी इच्छा है. उसका अपने आप पर नियंत्रण है. भारत सरकार को तो उन चीजों पर ध्यान देना चाहिए जिस पर नागरिक का कोई कंट्रोल नहीं, जैसे साफ खाद्य पदार्थ, साफ कृषि उत्पाद, साफ पीने का पानी आदि. भारत की नदियां अति प्रदूषित हैं और उनके प्रदूषित जल से सिंचाई की जाती है तो खेती के उत्पाद भी प्रदूषित हैं. लोगों को इन्हें खरीदना है, उनके पास कोई विकल्प नही. ऐसी स्वास्थ्य संबंधित बातों पर भारत सरकार को ध्यान देना चाहिए.

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