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ब्लॉग

पर्यावरण समस्या से निबटने के लिए सख्ती जरूरी

भारत में राजधानी दिल्‍ली की हवा में घुली घुटन की समस्‍या जब गले से उपर निकलने लगी तब जाकर सरकारें जागीं है. जागने पर भी सिर्फ तुगलकी फरमान जारी कर प्रदूषण की समस्‍या से निपटने के उपाय किए जा रहे हैं.

इनमें कारों के नंबर की सम विषम संख्‍या के आधार पर कार चलाने के दिन तय कर देने से लेकर अब डीजल कारों की बिक्री पर प्रतिबंध लगाने तक तमाम फैसले शामिल है. हालांकि अब तक सिर्फ बढ़ते प्रदूषण का अनुभव बताता है कि ये फैसले कारगर साबित नहीं हो रहे हैं. मतलब साफ है कि सरकारें और यहां तक कि अदालत भी समस्‍या की जद तक पहुंच पाने में कामयाब नहीं हो रहे हैं.

ताजा फैसला सुप्रीम कोर्ट द्वारा डीजल कारों पर प्रतिबंध लगाना है. अदालत के फैसले के मुताबिक दिल्‍ली में अब 31 मार्च तक 2000 सीसी से अधिक क्षमता वाले इंजन की कारों के पंजीकरण पर रोक लगा दी है. अदालत ने इस फैसले के पीछे जिन दलीलों की पुष्टि की है उनमें यह बात साफ तौर पर कही गई है कि 2000 सीसी से अधिक क्षमता के इंजन वाली कारें लग्‍जरी और एसयूवी होती हैं जो प्रदूषण फैलाने वाले कार्बन तत्‍वों का बहुत अधिक उत्‍सर्जन करती हैं. यह बात सही है कि डीजल से चलने वाली इन कारों से प्रदूषण काफी अधिक होता है खासकर पुरानी होने पर जब ये कारें प्रदूषण मानकों का उल्‍लंघन करने लगती है तब फिर इनसे निकलने वाले पार्टिकुलेट मेटर्स 2.5 और 10 के उत्‍सर्जन की मात्रा सामान्‍य से कई गुना अधिक हो जाती है.

लेकिन समस्‍या के अब तक बेकाबू बने रहने के पीछे भी सबसे अहम वजह प्रदूषण के ऐसे कारकों को नजरअंदाज किया जा रहा है जिन पर ध्‍यान देने की तात्‍कालिक जरूरत है. सरकारें तो अब तक समस्‍या के मूल कारणों पर पर्दा डाल ही रही थी लेकिन चिंताजनक बात यह है कि अदालत ने इस मामले में प्रदूषण फैलाने वाले कारकों के व्‍यावहारिक पहलुओं को नजरअंदाज कर यह फैसला दिया. इतना ही नहीं एक जनवरी से शुरू होने जा रही सम विषम नंबर प्‍लेट योजना की कामयाबी पर भी सवालिया निशान लगने लगे हैं.

शहरी योजना के विशेषज्ञ और अर्बन आर्ट कमीशन के पूर्व सदस्‍य प्रो. आरके अग्रवाल का मानना है कि सम विषम नंबर योजना हड़बड़ी में लागू करने से बेहतर होता इसे शुरू करने से पहले शहर को सार्वजनिक परिवहन सुविधा से लैस किया जाता. उनका मानना है कि योजना में कोई खोट नहीं है बल्कि इसे लागू करने से पहले माकूल तैयारियां नहीं हो पाना ही इसकी कामयाबी पर संदेह पैदा करता है. दूसरा बड़ा खतरा महज तैयारी के अभाव में इसके नाकाम रहने के बाद हमेशा के लिए यह योजना नाकामी के दंश की वजह से दफन कर दी जाएगी.

जहां तक डीजल कारों की बिक्री पर रोक का सवाल है तो इस पर भी अदालत एवं सरकारों ने उस जरूरी तथ्‍य को नजरंदाज किया है जिसमें साफ कहा गया है कि दिल्‍ली में डीजल वाहनों की संख्‍या में खासी गिरावट आई है. गौरतलब है कि देश में सर्वाधिक 87 लाख पंजीकृत वाहनों के साथ दिल्‍ली अव्‍वल है. इसमें 65 फीसदी दो पहिया वाहन है और लगभग 27 लाख चार पहिया वाहनों में 15 लाख डीजल से चलने वाले हैं. इतना ही नहीं अदालत और सरकारों ने दिल्‍ली एनसीआर के पर्यावरण प्रदूषण पर नियंत्रण के लिए गठित प्राधिकरण (ईपीसीए) की उस रिपोर्ट को नजरंदाज कर दिया जिसमें कहा गया है कि दिल्‍ली में इस साल डीजल वाहनों की बिक्री में खासी गिरावट आई है. ईपीसीए की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक साल 2013 में दिल्‍ली में 66 लाख डीजल कारों की बिक्री हुई थी जबकि साल 2014 में यह संख्‍या बढकर 70 लाख हो गई लेकिन साल 2015 में यह गिरकर 25 लाख पर आ गई है. इसकी वजह डीजल कारों की कीमत और रखरखाव अधिक होना है.

ईपीसीए की रिपोर्ट से साफ है कि प्रदूषण के लिए सिर्फ डीजल वाहनों को ही दोष देकर इस समस्‍या से निपटने के समाधान खोजना स्‍वयं को मूल वजह से दूर हटाना है. इतना ही नहीं ईपीसीए की रिपोर्ट में सरकार को वाहन जनित प्रदूषण पर रोक लगाने जैसे दीर्घकालिक उपाय करने के साथ तात्‍कालिक उपाय अपनाना बेहद जरूरी बताया गया है. पर्यावरणविद एमसी मेहता का कहना है कि बेशक समस्‍या को घातक बनाने में वाहनों का योगदान सर्वाधिक है लेकिन यह नहीं भूलना चाहिए कि जहरीली गैसों के धुंए की दिल्‍ली के आसमान में छाई परत को मजबूत बनाने में वाहनजनित प्रदूषण की एक दशक की भागीदारी है. इसलिए इस परत को कम करने में वाहनों पर नकेल कसने से पड़ने वाला असर भी दिखने में इतना ही समय लगेगा. इसलिए सरकारों को ईपीसीए की रिपोर्ट में सुझाए गए अल्‍पकालिक उपायों को समानांतर रूप से अपनाने पर जोर देना होगा. इनमें प्रदूषण की परत में निर्माण और विकास कार्यों से भारी मात्रा में उपजी धूल और प्रदूषण मानकों का खुला उल्‍लंघन कर चल रही वैध अवैध औद्योगिक इकाईयां और लघु एवं मझोले दर्जे के संयंत्रों से निकलने वाली जहरीली गैसें हैं जो हवा में घुलकर उसे घुटन भरा बना रही है.

महज नियम कानूनों का सख्‍ती से पालन सुनिश्चित करा कर सरकारों के लिए धूल और धुंए पर बहुत कम समय में काबू करना आसान है. मेट्रो जैसे बड़े निर्माण कार्यों और असंख्‍य औद्योगिक इकाईयों से निकलने वाली धूल और धुंए को काबू करने में सरकार को सिर्फ ईमानदारी बरतने की जरूरत है हालांकि प्रदूषण से ज्‍यादा भ्रष्‍टाचार के दलदल में फंसी व्‍यवस्‍था के लिए ईमानदारी की उम्‍मीद ही बेमानी साबित हो रही है. जबकि यह सर्वविदित है कि प्रदूषण का संकट भी भ्रष्‍टाचार से ही प्रत्‍यक्ष तौर पर जुडा है.

ब्लॉग: निर्मल यादव

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