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दुनिया

पर्यावरण पर गंभीर नतीजों की चेतावनी

संयुक्त राष्ट्र की नई पर्यावरण रिपोर्ट मौसम में बदलाव के खतरों को दिखाती है. पर्यावरण संरक्षकों का कहना है कि सरकारों के पास अब कोई बहाना नहीं बचा है. ग्लोबल वॉर्मिंग के नतीजों को रोकने के लिए उसे फौरन कदम उठाने होंगे.

पेरू में होने वाले अगले पर्यावरण सम्मेलन से पहले संयुक्त राष्ट्र ने पर्यावरण में ऐसे बदलावों की चेतावनी दी है जिसे फिर ठीक नहीं किया जा सकता. विश्व पर्यावरण परिषद आईपीसीसी ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि मौसम में बदलाव का संभवतः "इंसानों और इकोसिस्टम के लिए गंभीर, गहन और फिर से बदले न जा सकने वाला नतीजा होगा." साथ ही रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि अभी भी ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन को कम कर नुकसान को रोकने का समय है.

संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण समिति की रिपोर्ट में कोई नई बात नहीं है, लेकिन फिर भी यह रिपोर्ट इस मुद्दे पर फौरी फैसलों की जरूरत पर जोर देती है. इसमें वे सूचनाएं शामिल हैं जो पहले की तीन रिपोर्टों में थीं. इसमें मौसम में बदलाव के वैज्ञानिक संकेत, इस विकास के नतीजों और उसे रोकने के कदमों की चर्चा है. डेनमार्क में हुई ताजा बैठक में 100 देशों के सरकारी प्रतिनिधियों के अलावा प्रमुख वैज्ञानिकों ने हिस्सा लिया. उनकी जिम्मेदारी थी एक सम्यक रिपोर्ट की तैयारी और राजनीतिक फैसला लेने वालों के लिए उठाए जाने वाले कदमों का सुझाव देना. यह रिपोर्ट पेरू पर्यावरण सम्मेलन में भाग लेने वाले देशों की सरकारों के लिए तैयारी का आधार है.

Dürre in Honduras El Nino Archiv

सूखे का खतरा

फौरी कदमों की जरूरत

भारत के आरके पचौरी की अध्यक्षता वाली आईपीसीसी की रिपोर्ट इस बात में कोई संदेह नहीं छोड़ती कि ग्लोबल वॉर्मिंग हो रही है, वह इंसान की वजह से हो रही है, उसके खतरनाक नतीजे होंगे और विश्व भर में तापमान बढ़ने की प्रक्रिया को उलटना संभव नहीं है. रिपोर्ट यह भी साफ करती है कि पृथ्वी के गर्म होने को 2 डिग्री से कम रखने के लिए जहरीली गैसों के उत्सर्जन को बहुत जल्द काफी कम करना होगा. जलवायु परिवर्तन से मौसम में भारी उतार चढ़ाव, समुद्र के जलस्तर में वृद्धि, तपती गर्मी के दिनों में बढोत्तरी, बाढ़ और सूखे जैसे परिणाम होते हैं.

संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट यह भी कहती है कि जलवायु परिवर्तन हिंसक विवादों और शरणार्थी समस्याओं की ओर ले जा सकता है और इसका खाद्य सामग्रियों के उत्पादन पर भी नकारात्मक असर होगा. इसके एक और खतरनाक नतीजे की ओर ध्यान दिलाया गया है और वह है समुद्र का बढ़ता अम्लीकरण जिसे ज्यादा कार्बन डाय ऑक्साइड सोखना पड़ रहा है. यह समुद्री जीवन के लिए बहुत बड़ा खतरा है. रिपोर्ट में बताया गया है कि अगर ग्रीन हाउस गैसों में कमी नहीं होती है तो 21वीं सदी के अंत तक मौसम में बदलाव के जोखिम बहुत ज्यादा हैं. यदि कुछ नहीं किया गया तो सदी के अंत तक पृथ्वी का तापमान करीब 4 डिग्री सेल्सियस बढ़ जाएगा.

रिपोर्ट तैयार करने की मुश्किलें

रिपोर्ट का राजनैतिक रूप से संवेदनशील सार संक्षेप तय करने से पहले सरकारों के प्रतिनिधियों ने उसकी एक एक पंक्ति पढ़ी. औपचारिक तौर पर कहा गया कि इसका मकसद यह था कि राजनीतिक नेता उसे समझ सकें. लेकिन सच्चाई यह है कि इसके जरिये सरकारों ने रिपोर्ट के टेक्स्ट पर अपना प्रभाव डालने की कोशिश की ताकि बातचीत में उनकी स्थिति मजबूत हो सके. सदस्य देशों के प्रतिनिधियों ने 2000 टिप्पणियां की हैं. उनमें से कुछ में मांग की गई है कि रिपोर्ट में तूफानों, गर्मी की अवधियों, बाढ़ और समुद्री जलस्तर के बारे में ठीक ठीक जानकारी दी जाए.

यूरोपीय संघ चाहता था कि रिपोर्ट में स्पष्ट बयान हो और वह फैसला लेने वाले नेताओं के लिए सही मायनों में एक मैनुअल का काम करे. यूरोपीय संघ और अमेरिका दोनों ने ही मांग की है कि रिपोर्ट में इस बात पर जोर दिया जाए कि भविष्य में धनी देश भी तापमान के उतार चढ़ाव का शिकार होंगे. इसके अलावा अमेरिका की मांग थी कि यह दस्तावेज उन लोगों के भी पल्ले पड़े जो मौसम के बारे में कुछ नहीं जानते. ऐसे देश में जहां अभी भी लोग ग्लोबल वॉर्मिंग को संदेह की नजर से देखते हैं, विशेषज्ञों के अनुसार रिपोर्ट का स्पष्ट होना जरूरी है.

Symbolbild Klimaschutz Wetterveränderung

समुद्र का अम्लीकरण

पेरू के लिए सबक

ग्रीनपीस, डब्ल्यूडब्ल्यूएफ और जर्मनवॉच जैसे गैर सरकारी संगठनों का कहना है कि पर्यावरण रिपोर्ट दिखाती है कि मौसम में खतरनाक बदलाव को रोकने के लिए अभी भी बहुत देर नहीं हुई है. लेकिन उनका यह भी कहना है कि इसकी अवधि 2020 में पूरी हो जाएगी. तब तक दुनिया को अक्षय ऊर्जा का अधिक इस्तेमाल, ऊर्जा का कुशल इस्तेमाल और दंगल काटने पर रोक पर अमल कर लेना होगा ताकि ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन को सीमित किया जा सके.

संयुक्त राष्ट्र महासचिव बान की मून ने चेतावनी दी है, "यदि हम अभी की ही तरह करते रहें तो तापमान में वृद्धि को रोकने की संभावनाएं हमारे हाथ से निकल जाएंगी." रिपोर्ट जारी करते समय महासचिव की उपस्थिति यह दिखाती है कि संयुक्त राष्ट्र इस समस्या को कितना महत्व दे रहा है. दिसंबर में पेरू का राजधानी लीमा में अगला पर्यावरण सम्मेलन हो रहा है. मेजबान देश के विदेश मंत्री मानुएल पुल्गर विडाल का कहना है कि आईपीसीसी की रिपोर्ट सम्मेलन के लिए गाइडलाइन की तरह है. वह दिखाता है "कि आने वाले सालों में निर्णायक फैसले लेना बहुत जरूरी है." पेरू में अगले साल पेरिस सम्मेलन में अंतिम समझौते की तैयारी होगी.

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