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मनोरंजन

"परिवार से लड़ कर पत्रकार बनी"

जर्मन मीडिया अवार्ड पाने वाली भारतीय पत्रकार गुंजन शर्मा का कहना है कि पत्रकार बनने के लिए उन्हें परिवार से लड़ना पड़ा. हालांकि अब परिवार उनके साथ है और इस बात पर गर्व करता है कि उन्हें लगातार पुरस्कार मिलते हैं.

डीडब्ल्यू ने जर्मनी की राजधानी बर्लिन में हुए पुरस्कार समारोह में गुंजन से बात की. पेश है उसके कुछ अंशः

डीडब्ल्यूः गुंजन आप बता सकती हैं कि अवार्ड पाना आपके लिए कितना मायने रखता है.

गुंजन शर्माः ये अवार्ड मुझे पत्रकार के तौर पर बहुत प्रोत्साहन देता है कि मैं इस तरह के विषयों को और उठाऊं, उनके बारे में और लिखूं. और लोगों और सरकारों को संवेदनशील बना सकूं. इन विषयों के बारे में, जो आम तौर पर नजरअंदाज कर दिए जाते हैं. साथ ही साथ मुझे लगता है कि इस तरह के अवार्ड भारत और दूसरे देशों की सरकारों को भी संवेदनशील बनाते हैं और मानवाधिकार आधारित मॉडल बनाने में मदद करते हैं.

डीडब्ल्यूः महिलाएं और पत्रकारिता आम तौर पर मुश्किल जोड़ा माना जा सकता है. आप अपना कोई व्यक्तिगत अनुभव बता सकती हैं. क्या आपका परिवार आपका साथ देता था और आपने पत्रकारिता क्यों चुनी.

गुंजन शर्माः जब मैंने पत्रकारिता चुनी, तो मेरे परिवार वाले इसके खिलाफ थे. मेरे मां बाप और बहनों, किसी को भी इस पेशे के बारे में कुछ समझ नहीं आया. लेकिन जब मैंने जनसंचार के बारे में पढ़ा था और उसके लिए जो योग्यता लिखी थी, तो मुझे लगा कि मैं इसके बहुत पास हूं. इसके बाद मैंने यह चुना. चुनने के बाद नौकरी के वक्त भी मेरे पिता बहुत दिलचस्पी नहीं दिखा रहे थे. वे कह रहे थे कि भले ही मैंने पोस्ट ग्रेजुएशन कर लिया हो लेकिन मुझे बीएड करके टीचर बन जाना चाहिए.

मैं अपने परिवार से लड़ कर पत्रकार बनी लेकिन जब मेरी शादी हुई तो मेरे पति भी पत्रकार हैं, उन्होंने मुझे बहुत प्रोत्साहन दिया. वह हमेशा मेरे साथ खड़े रहे. मुझे बहुत बड़ा सपोर्ट सिस्टम चाहिए होता है अपने घर पर, वह हमेशा उन्होंने दिया. जब भी मैंने कोई खतरनाक सी स्टोरी सुझाई, तो वह हमेशा मेरे साथ रहे. पति होने के नाते वह शुरू में थोड़ा डरे कि मैं कैसे करूंगी लेकिन जब मैंने कर दिखाया, तो वही सबसे ज्यादा प्रोत्साहित करते थे. वह कहते कि ऐसी ही स्टोरी और करनी है. अभी शुक्र है कि मेरे मां बाप भी बहुत खुश हैं.

डीडब्ल्यूः क्या आपको कोई ऐसी घटना याद है, जहां आप डरी थीं और जो अभी भी आपके मन से नहीं निकलता है.

गुंजन शर्माः मैं आपको 2-3 चीजें बता सकती हूं. 2010 में मैंने स्टोरी की थी मेडिकल कॉलेजों पर. भारत में प्राइवेट कॉलेज बहुत फैल गए हैं. और इनमें कोई संरचना नहीं होती, प्रोफेसर नहीं होते. प्रैक्टिकल के लिए मरीज होते हैं, वे भी नहीं होते. तो ट्रक भर कर मरीज लाए जाते हैं. उपकरण भी किराए पर लाए जाते हैं, जो जांच के वक्त आते हैं. मैं बहुत सारे गांवों में गई थी, ये कॉलेज बिलकुल दूर दराज में हैं, तो हम लोग, मैं और मेरे फोटोग्राफर अपने ड्राइवर को बोलते थे कि 'नवीन, गाड़ी का इंजन बंद मत करना, चालू रखना.' तो हम इतना डरे रहते थे कि कभी भी कुछ भी हो सकता है, अगर हमारी पोल खुल गई तो क्या होगा. गाड़ी पर से हमने सारे स्टिकर हटा दिए थे. मैं अपने बैग में से पत्रकार का कार्ड और दूसरे कार्ड निकाल कर जाती थी कि तलाशी होगी तब भी नहीं पता चलेगा कि मैं एक पत्रकार हूं.

अपनी इस मानसिक अस्पताल वाली स्टोरी के लिए भी जब मैं जाती थी तो यह स्टोरी बहुत ज्यादा जज्बाती थी क्योंकि मरीजों के पास कपड़े नहीं हैं, उन्हें खाना नहीं मिलता है. ऐसे ही एक बार बंगाल के एक अस्पताल में मैं गई, एक गैरसरकारी संगठन की सदस्य बन कर. तो वहां देखा कि काम हो रहा है लेकिन सारे मरीज उन्हीं गंदे कपड़ों में हैं, वो तीन चार महीनों से नहीं धुले होंगे, शायद कभी नहीं धुले होंगे क्योंकि वे बहुत गंदे और काले कपड़े थे. मैंने लाल रंग का सादा सा टीशर्ट पहन रखा था. अचानक एक मरीज भागते हुए आया उसने मुझे जोर से गले लगाया और कहा कि मुझे यह टीशर्ट चाहिए. उस वक्त कुछ भी हो सकता था. हालांकि दो मिनट बाद उस मरीज ने मुझे छोड़ दिया लेकिन वह अलग सी निगाहों से देखता हुआ चला गया. लेकिन जब मैं वापस आई तो बहुत रोई कि एक टीशर्ट के बारे में मानसिक रोगी को भी पता है कि जो मैंने टीशर्ट पहनी है, वह बहुत साफ और अच्छी टीशर्ट है और उसके पास ऐसे कपड़े नहीं हैं.

डीडब्ल्यूः एक औरत होने के नाते क्या आप ज्यादा आसानी से ऐसे लोगों के साथ रिश्ता जोड़ सकती हैं और किस तरह से आपकी राइटिंग में यह बात नजर आती है कि आप एक औरत हैं, क्या एक नरमी है उसमें.

गुंजन शर्माः महिला पत्रकार होने के अच्छे और बुरे दोनों पहलू हैं. आप रिश्ता लोगों के साथ आसानी से जोड़ पाती हैं. अगर आप किसी भी मरीज या किसी और व्यक्ति से भी बात करती हैं तो आत्मीयता जल्दी आती है. अगर कर्मचारी या अधिकारी से भी बात करें, तो वो आपको बहुत शक की नजर से नहीं देखते हैं. पत्रकार होने के नाते मैं कोशिश करती हूं कि एक महिला न लिखे, बल्कि एक पत्रकार लिखे.

बुरा पहलू यह है कि कई जगहों पर आपको असुरक्षा महसूस होती है. लोग अगर जान जाएं कि आप वहां क्यों हैं और आपके पास सुरक्षा नहीं है, तो वे इसका फायदा उठाना चाहते हैं. अगर आपको किसी तरह की जानकारी चाहिए, तो फिर वे भी बदले में कुछ उम्मीद करने लगते हैं. ऐसे हालात से निकलने के लिए बहुत हिम्मत की जरूरत होती है. बहुत डिप्लोमैटिकली आपको करना पड़ता है.

डीडब्ल्यूः भारत में मुश्किल से दो तीन पत्रिकाएं ही खोजी पत्रकारिता करती हैं, या गिने चुने अखबार. जबकि अगर समाचार चैनलों को देखें, तो हमें पता है कि वे क्या दिखाते हैं. ये दोनों दो अलग ध्रुव की तरह हैं. किस दिशा में जा रहा है भारत की पत्रकारिता. और आपको क्या लगता है कि किस चीज की जरूरत है.

गुंजन शर्माः भारत में निश्चित तौर पर पत्रकारिता 24 घंटे के चैनलों की वजह से कमजोर पड़ रही है. पत्रिका, अखबार और टीवी चैनल भी अहम रोल अदा कर सकते हैं. पत्रकार के नाते मुझे कई बार गुस्सा भी आता है और तरस भी आता है कि यह क्या हो रहा है. आपके चौबीसों घंटे के चैनल को हर वक्त ब्रेकिंग न्यूज देना है. यह टर्म भारतीय मीडिया के लिए गाली बन गई है. और उन्हें इसके लिए सीनियर लोगों के आदेश मिलते रहते हैं. तो फील्ड में जो रिपोर्टर है, मुझे उसकी गलती कम लगती है और ढांचे की गलती ज्यादा लगती है. कुछ भी 24 घंटे की न्यूज नहीं हो सकती है. अगर कोई न्यूज है तो रिपोर्ट करें, अगर नहीं है, तो नहीं है.

डीडब्ल्यूः आपने कहा कि सिस्टम में बदलाव की जरूरत है. भारत अपना स्वतंत्रता दिवस भी मना रहा है. आपको क्या लगता है कि एक तरफ तो हमारे पास आजाद मीडिया है, दूसरी तरफ आपको रोका जा रहा है. इसे आप किस नजर से देखती हैं.

गुंजन शर्माः भारत में लोकतंत्र, मैं मानूंगी कि 66 साल में भी उभर नहीं पाया है. अभिव्यक्ति की आजादी तो है लोगों के पास लेकिन सरकार इस पर कार्रवाई नहीं करती है. आप कुछ भी लिखिए लेकिन सरकार के पास तकनीक है, संसाधन है, पैसे हैं, सब कुछ है. लेकिन वह काम नहीं करेगी क्योंकि साथ में भ्रष्टाचार भी है. जहां तक मेरी इस स्टोरी की बात है, तो मुझे रोका गया. यह बहुत साफ है कि अस्पतालों की हालत इतनी शर्मनाक और खतरनाक थी कि उसे सामने नहीं लाया जा सकता.

भारत के लोकतंत्र में जरूरी है कि जो नीति भारत के पास है, जो उन्होंने खुद ही बनाई है, उसे लागू किया जाए, कार्रवाई की जाए ताकि लोकतंत्र सही तरीके से काम करे. सिर्फ अभिव्यक्ति की आजादी लोकतंत्र नहीं है. लोग प्रदर्शन करते हैं, पत्रकार लिखते हैं लेकिन अगर प्रशासन कार्यवाही नहीं करेगा तो लोकतंत्र अधूरा है.

डीडब्ल्यूः भाषा का कितना महत्व है. कोई अंग्रेजी में लिखता है या हिन्दी में लिखता है या किसी और भाषा में लिखता है.

गुंजन शर्माः इंग्लिश में इसलिए लिखते हैं कि पूरा भारत आपको पढ़ सकता है. खास कर पढ़े लिखे लोग. लेकिन कुछ मुद्दे ऐसे होते हैं, जिन्हें क्षेत्रीय भाषाओं में बताए जाने की जरूरत होती है. अगर आपको लोगों में संवेदना पैदा करनी है. अगर आप क्षेत्रीय भाषा में नहीं लिखेंगे, तो संवेदना नहीं पैदा होगी.

डीडब्ल्यूः आखिरी सवाल आपकी निजी जिंदगी से कि आपको क्या पसंद है और क्या पसंद नहीं है.

गुंजन शर्माः मेरे पति को और मुझे घूमना बहुत पसंद है. हमें शहर बहुत पसंद है. चाहे वह आगरा हो या बर्लिन. हम पैदल चल कर उस शहर को देखना चाहते हैं, वहां के लोगों से मिलना चाहते हैं. स्थानीय चीजों को देखना और चप्पे चप्पे को छानना हम दोनों को बहुत पसंद है.

मैं किसी भी तरह की फिल्म देख सकती हूं. अगर मेरे पास वक्त है तो मैं लगातार पांच फिल्में देख सकती हूं और पांचों एक दूसरे से बिलकुल अलग हो सकती है. वह प्रिटी वूमेन भी हो सकती है, वो मेरे ब्रदर की दुल्हन भी हो सकती है.

और मुझे सबसे ज्यादा पसंद है मेरी छोटी बेटी के साथ खेलना, जो सात साल की है, उसके साथ बच्चा बन कर खेलना बहुत अच्छा लगता है. मुझे उसके लिए बहुत कम वक्त मिलता है और वह सबसे ज्यादा ताली बजाती है, जब मुझे कोई अवार्ड मिलता है.

इंटरव्यूः प्रिया एसेलबॉर्न

संपादनः ईशा भाटिया

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