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मनोरंजन

परम्पराओं की नए ढंग से प्रस्तुति जरूरी

कुचीपुड़ी नृत्यांगना शांता रति परंपरागत नृत्य में नए डिजाइन के साथ परीक्षण कर रही हैं. उनका कहना है कि दर्शकों का ध्यान बहुत अधिक देर तक बांधे रखना मुश्किल होता जा रहा है.

खजुराहो के प्रसिद्ध खजुराहो नृत्य महोत्सव में बारिश के कारण कार्यक्रम मंदिर के पीछे बने खुले मंच पर करना असंभव था, इसलिए उसे शेड के नीचे कामचलाऊ मंच बनाया गया. कार्यक्रम के दौरान भी बूंदाबांदी जारी थी. कलाकारों से अनुरोध किया गया कि वे अपनी-अपनी प्रस्तुतियों को काट दें और कम समय लें. इन विषम परिस्थितियों में भी कुचीपुड़ी शैली की प्रसिद्ध नृत्यांगना शांता रति ने एकदम अभिभूत करने वाला नृत्य प्रस्तुत किया और सभी कलप्रेमियों का मन मोह लिया. उनके पिता सिंगापुर में एक सफल व्यवसायी थे और कलाओं में उनकी गहरी रुचि थी. उनकी मां कर्नाटक संगीत में प्रशिक्षित थीं. प्रस्तुत है शांता रति से हुई बातचीत के कुछ अंश:

आप तो सिंगापुर में पली-बढ़ीं. फिर नृत्य में और वह भी कुचीपुड़ी में आपकी रुचि कैसे पैदा हुई? क्या आपने दूसरी नृत्य शैलियां भी सीखीं?

मैं पांच साल की थी जब मेरे माता पिता ने मुझे भरतनाट्यम सीखने भेजा क्योंकि उस कच्ची उम्र में भी मेरे कानों में जैसा भी संगीत पड़ता था, चीनी, मलय, पश्चिमी पॉप या भारतीय, तो मेरे पैर उस पर थिरकने लगते थे. बाद में मेरे पिता ने नोटिस किया कि मैं चीनी ऑपेरा को बहुत ध्यान से देखती हूं. उन्होंने कहा कि इसी से मिलता जुलता एक भारतीय नृत्य है कथकलि. क्या मैं उसे सीखना चाहूंगी? मैंने खुशी-खुशी हामी भर दी और सात साल की उम्र से मैं कथकलि सीखने लगी. कुचीपुड़ी की तरफ तो मुझे पद्मविभूषण से अलंकृत गुरु राजा-राधा रेड्डी ने खींचा जब मैं बीस साल पूरे कर चुकी थी. बस तब से मैं इसी की होकर रह गई. बाद में मैंने चेन्नई में गुरु वेम्पति चिन्न सत्यम से इस शैली में उच्च प्रशिक्षण प्राप्त किया.

शास्त्रीय नृत्य वास्तव में है क्या? कुचीपुड़ी को तो काफी बाद में इस श्रेणी में शामिल किया गया.

देखिये, सभी शास्त्रीय नृत्य लोक परम्पराओं से निकले हैं. बाद में इन्हें नाट्यशास्त्र के अनुसार नियमों में बांधा गया. कुछ शैलियों को इस कारण पहले मान्यता मिल गई क्योंकि उन्हें सही किस्म के कलाकारों और संगठनों ने आगे बढ़ाया. कुचीपुड़ी शैली इस दृष्टि से बाद में मान्यता पा सकी.

आपने इस शैली में क्या परिवर्तन किए हैं? मैंने नोटिस किया कि आपकी प्रस्तुति की संरचना बहुत ही कसी हुई और सुगठित थी और उसमें कुछ भी अनावश्यक नहीं था.

कुचीपुड़ी में कुछ भी नया करने का मेरा कोई दावा नहीं है. हां, मेरी यह कोशिश जरूर रही है कि मैं इसमें भारत के अन्य स्थानों की साहित्यिक कृतियों का समावेश करूं क्योंकि मुझे लगता है कि कुचीपुड़ी में इन सभी अलग-अलग तरह की खुशबुओं को अपने में समेटने की क्षमता है.

कोरियोग्राफी में मेरी कोशिश है कि मैं कुचीपुड़ी में अंतर्निहित विशिष्ट गुणों पर किसी तरह का प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना नए डिजाइन और नए आइटम पेश करूं और नृत्य रचनाओं को जितना संभव है उतना सरल और सुस्पष्ट रखूं क्योंकि आजकल दर्शकों का ध्यान बहुत अधिक देर तक बांधे रखना मुश्किल होता जा रहा है और वे संक्षिप्त प्रस्तुतियों को अधिक पसंद करते हैं.

एकदम युवा दर्शकों के साथ आपका अनुभव कैसा रहा है? उनमें शास्त्रीय नृत्य के प्रति कितना अनुराग है? और उन्हें इस ओर आकर्षित करने के लिए क्या किया जा सकता है?

नए दर्शकों विशेषकर युवाओं तक नृत्य को पहुंचाने के उद्देश्य से ही मैंने अंतरा प्रतिष्ठान की स्थापना की है और मैंने स्कूल-कॉलेज के विद्यार्थियों के बीच भी अनेक प्रस्तुतियां की हैं ताकि उन्हें हमारे शास्त्रीय नृत्यों के व्यक्तित्व को समृद्ध करने वाले गुणों से परिचित कराया जा सके. और हमेशा ही उनसे मुझे अविश्वसनीय रूप से उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया मिली है. अनेक ने सीखना शुरू किया, अन्य अनेक जो सीखना छोड़ चुके थे फिर से सीखने लगे. बहुतों ने कहा कि उन्हें पता ही नहीं था कि हमारे नृत्य रूपों में इतनी गहराई और सौंदर्य है. मेरा मानना है कि एक बार युवाओं में नृत्य को जानने की उत्सुकता और इच्छा पैदा होने के बाद उन्हें हम कोई भी रूपाकार दे सकते हैं. आने वाली पीढ़ियों को तैयार करने के लिए लगन के साथ सतत प्रयास करते रहने की जरूरत है.

शास्त्रीय नृत्य के किसी भी कलाकार के सामने आज किस किस्म की चुनौतियां हैं?

पहली तो यही तय करना है कि किस किस्म का विषय दर्शकों को रुचिकर होगा और उसमें उनकी कल्पनाशक्ति को कैसे सक्रिय और उत्तेजित किया जा सकता है. एकल प्रस्तुति डेढ़-दो घंटे चलती है इसलिए दर्शकों को बांध कर रखना भी एक बड़ी चुनौती है. प्राचीन नृत्य शैलियों की भाषा और मुहावरे में नए विषयों की अभिव्यक्ति कैसे की जाए और दर्शकों को किस तरह नृत्य का गुणी पारखी और भविष्य का आयोजक कैसे बनाया जाये, ये चुनौतियां भी हैं.

इंटरव्यू: कुलदीप कुमार

संपादन: महेश झा