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विज्ञान

परफ्यूम उद्योग पर नियमों की मार

समुद्री शैवाल सहित कई तरह की काई परफ्यूम उद्योग में इस्तेमाल की जाती रही है, खुशबू बनाए रखने के लिए. लेकिन अब इन पर प्रतिबंध लगने वाला है.

25 अरब डॉलर का परफ्यूम उद्योग अब खुद को यूरोपीय संघ के नए नियमों के लिए तैयार कर रहा है, जो 2015 की शुरुआत से लागू किए जाने हैं.

इनके साथ ही खुशबू में इस्तेमाल किए जाने वाली ओकमॉस यानि बलूत की काई जैसे पदार्थों पर रोक लग जाएगी. ये पदार्थ शनेल के नंबर फाइव और मिस डियोर परफ्यूम में इस्तेमाल किए जाते रहे हैं.

परफ्यूम की खुशबू डिजाइन करने वालों का कहना है कि वो ओकमॉस को उसके लकड़ी सी, मिट्टी जैसी खुशबू के लिए पसंद करते हैं, इससे खुशबू को एक गहराई मिलती है और वह लंबे समय तक बनी रहती है. लेकिन इससे एलर्जी होने का खतरा भी रहता है. बताया जाता है कि एक से तीन फीसदी लोगों में इससे एलर्जी पैदा हो सकती है. इसमें डर्मेटाइटिस भी शामिल है. इसलिए ब्रसेल्स इस काई में मिलने वाले दो मुख्य अणुओं, अट्रैनॉल और क्लोरोएट्रैनॉल पर प्रतिबंध लगाने वाला है.

परफ्यूम निर्माता अब सिर्फ उस ओकमॉस का इस्तेमाल कर सकेंगे जिसमें से ये दो अणु निकाले जा चुके होंगे. निर्माताओं की दलील है कि इससे बनने वाला परफ्यूम बहुत हल्का होगा और गंध भी कम तीखी होगी. परफ्यूम निर्माता कोर्तीकियाटो का कहना है कि बलूत के पेड़ पर होने वाली काई के बजाए उसकी गीली और आयोडाइज्ड गंध को एक दो और पदार्थों के साथ मिला कर ओकमॉस जैसी फंफूद वाली खुशबू बनाई जा सकती है.

यूरोपीय आयोग कृत्रिम अणु एचआईसीसी या लिरैल पर भी रोक लगा रहा है. यह लिली ऑफ द वैली नाम के फूल की खुशबू जैसा होता है. इससे होने वाली एलर्जी भी डर्मेटाइटिस का कारण बन सकती है. लैंकोम और अरमानी परफ्यूम बनाने वाली कंपनी लॉरियल ने कहा है कि वह विकल्प ढूंढ रही है, हालांकि कंपनी ने नहीं बताया कि उनकी खुशबू में लिरैल का इस्तेमाल किया गया है या नहीं.

परेशानी ये है कि जिन पदार्थों पर प्रतिबंध लगाया जा रहा है वो परफ्यूम की खास गंध के लिए जिम्मेदार हैं. निर्माताओं को डर है कि इन पदार्थों को हटा देने से उनकी खुशबू वैसी नहीं रह जाएगी जैसी उन्होंने बनाई थी. या फिर उन्हें ऐसे प्राकृतिक रसायनों या फिर पदार्थों को ढूंढना पड़ेगा जो खुशबू की खासियत बनाए रखें.

एएम/एमजी (रॉयटर्स)

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