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दुनिया

परंपरा और सियासत की वजह से बदलते नाम

भारत में सड़कों, गलियों, इमारतों और शहरों का नाम बदलने की परंपरा कोई नई नहीं है. कोलकाता, मुंबई, चेन्नई और बेंगलुरू समेत कई शहरों के नाम बदले जा चुके हैं. इस मामले में केंद्र हो या राज्य सरकार कोई भी पीछे नहीं है.

कभी इतिहास, कभी परंपरा तो कभी स्थानीय लोगों की भावना की आड़ में और कभी महज राजनीतिक लाभ के लिए ही नए सिरे से नामकरण की कवायद होती रही है. देश में तमाम शहरों में ऐसी दर्जनों सड़कें मिल जाएंगी जिनके नाम पहले अंग्रेजों के नाम पर थे. लेकिन वहां बाद में सत्ता में आने वाली राजनीतिक पार्टियों ने अपनी सुविधा व फायदे के लिए उनके नाम या तो स्थानीय स्वाधीनता सेनानियों के नाम पर रखे या फिर किसी महापुरुष के नाम पर. नाम बदलने की इस परंपरा के पीछे सियासत की अहम भूमिका रही है. यह बात दीगर है कि नए नाम स्थानीय लोगों की जुबान पर ही नहीं चढ़े हैं. लोग-बाग अब भी ऐसी सड़कों और इमारतों को उनके पुराने नामों से ही पहचानते हैं.

घाटे का सौदा

मिसाल के तौर पर कोलकाता के केंद्र में स्थित मुख्य सड़क पार्क स्ट्रीट का नाम कोई एक दशक पहले बदल कर मदर टेरेसा सरणी कर दिया गया था. लेकिन यह नाम कागजों में ही है. कोई भी इसे इसके नए नाम से नहीं पुकारता. इस मामले में सबसे ताजा मिसाल आईटी हब गुड़गांव का है. बीते दिनों इसका नाम बदल कर गुरूग्राम कर दिया गया. लेकिन इसे इसके नए नाम से शायद ही कोई बुलाता है.

किसी भी इमारत, सड़क या शहर का नए सिरे से नामकरण बेहद खर्चीला सौदा है. इससे संबंधित तमाम कागजात बदलने पड़ते हैं. यह खर्च काफी मोटा होता है. मिसाल के तौर पर अगर किसी इमारत में सौ दफ्तर हैं तो सबको अपनी स्टेशनरी बदलनी होगी. ऐसे में किसी शहर का नाम बदलने की सूरत में होने वाले खर्च का महज अनुमान ही लगाया जा सकता है. इतिहासकार प्रोफेसर ए.एच खान कहते हैं, "किसी व्यक्ति विशेष के प्रति सम्मान जताने के लिए अक्सर सड़कों के नाम उनके नाम पर रख दिए जाते हैं. लेकिन इससे परेशानी और खर्च ही बढ़ता है. वह कहते हैं कि यह परंपरा वैसे तो पुरानी है लेकिन हाल के वर्षों में इसमें तेजी आई है. इसके लिए राजनीतिक दलों और संगठनों के बीच बढ़ती होड़ और बर्चस्व की जंग भी कम जिम्मेदार नहीं है.

हाईकोर्ट का नाम

केंद्रीय मंत्रिमंडल ने पांच जुलाई को अपनी बैठक में कलकत्ता, बंबई और मद्रास हाईकोर्ट के नाम बदल कर क्रमश: कोलकाता, मुंबई और चेन्नई करने का फैसला किया था. कलकत्ता हाईकोर्ट के जजों ने आम राय से केंद्र के उस प्रस्ताव को मानने से इंकार कर दिया है. अदालत के फैसले से केंद्रीय विधि मंत्रालय को भी अवगत करा दिया गया है. लेकिन केंद्र ने अब तक इस पर कोई जवाब नहीं दिया है.जजों ने इतिहास और समृद्ध परंपरा का हवाला देते हुए नाम बदलने से मना किया है.

डेढ़ सौ साल से भी लंबे अरसे से इस हाईकोर्ट का नाम कलकत्ता रहा है. हालांकि स्थानीय भाषा में लोग इस महानगर को कोलकाता ही कहते रहे हैं. इस हाईकोर्ट की स्थापना वर्ष 1862 में हुई थी. इनकॉरपोरेटेड लॉ सोसायटी ऑफ कलकत्ता (आईएलएससी) के अध्यक्ष आर.के.खन्ना कहते हैं, "कलकत्ता हाईकोर्ट देश का पहला हाईकोर्ट है. इसका यही नाम पूरी दुनिया में मशहूर है और इससे लोगों की भावनाएं व संवेदनाएं जुड़ी हैं. इसे बदलने का मतलब है पूरी दुनिया में इसका नाम बदलना." कलकत्ता बार एसोसिएशन के महासचिव सुरंजन दासगुप्ता ने कहा है कि एसोसिएशन इस मुद्दे पर पूर्ण पीठ के फैसले का समर्थन करता है. वह कहते हैं कि इस हाईकोर्ट की स्थापना एक विशेष अधिनियम के तहत की गई थी. उसमें संशोधन नहीं होने या नया कानून नहीं बनाए जाने तक कलकत्ता हाईकोर्ट का नाम नहीं बदला जा सकता. एसोसिएशन के पूर्व महासचिव उत्तम मजुमदार ने कहा है कि वकील केंद्र के इस फैसले को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हैं.

कलकत्ता हाईकोर्ट के एक वरिष्ठ जज कहते हैं, "जजों ने इस ऐतिहासिक अदालत का नाम बदलने के केंद्र के फैसले को स्वीकार नहीं करने का फैसला किया है. लेकिन यह भी सही है कि हम केंद्र सरकार को यह फैसला लागू करने से नहीं रोक सकते. बावजूद इसके हमने अपनी आपत्ति जता दी है."

मुख्यमंत्री ममता बनर्जी या उनकी सरकार ने अब तक इस मुद्दे पर कोई टिप्पणी नहीं की है. इससे पहले वाममोर्चा सरकार के जमाने में वर्ष 2001 में कलकत्ता का नाम बदल कर कोलकाता किया गया था. उस समय भी किसी ने इसका कोई विरोध नहीं किया था. बाद में ममता बनर्जी सरकार ने पश्चिम बंगाल का नाम बदल कर पश्चिम बंग करने की भी मुहिम चलाई थी. लेकिन यह मामला अब तक अधर में है.

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