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ब्लॉग

‘पढ़ेगी बेटी तो पिटेगी बेटी.’

बीएचयू में छात्राओं का आंदोलन, विश्वविद्यालय की हठधर्मिता और पुलिस लाठीचार्ज के बीच यह सोचने को विवश करता है जो लड़कियों की सुरक्षा और अधिकारों से जुड़ा है. यह राजनीति प्रेरित है- कहकर पल्ला झाड़ना आसान नहीं.

आंदोलन को खारिज करने के बजाय देखना चाहिए कि लड़कियां किस तरह आगे आकर अपने खिलाफ रोजमर्रा की हिंसा का प्रतिरोध करने बाहर निकली हैं. तमाम शैक्षणिक संस्थानों में यौनिक संवेदनशीलता का मुद्दा भी उभर कर आ गया है. कहने को इसे लेकर नियम-कायदे और टीमें गठित हैं लेकिन बनारस का आंदोलन बताता है कि ये गठन कितने सतही, भोथरे और दरअसल पर्देदारी के ही माध्यम बन चुके हैं. अगर ऐसा न होता तो पहली बार में ही पीड़ित छात्रा की शिकायत का संज्ञान लेकर विश्वविद्यालय प्रशासन न सिर्फ आरोपी छात्रों के खिलाफ कार्रवाई करता बल्कि ऐसी घटना आगे न हो, इसके लिए चुस्त उपाय करता. बनारस के जिला मजिस्ट्रेट की रिपोर्ट, छात्राओं के खिलाफ विभिन्न दुष्प्रचारों और सोशल मीडिया पर आंदोलन के खिलाफ चलायी जा रही नकली, भ्रामक सूचनाओं की पोल भी खोलती है. ऐसा लगता है जैसे जानबूझकर ये आंदोलन उग्र होने दिया गया ताकि उस पर ‘राजनीतिक', ‘राष्ट्र विरोधी' या ‘चरित्रहीन होने का ‘लांछन' लगाया जा सके.

विश्वविद्यालय की छात्राओं से भेदभाव और उनकी नैतिक पहरेदारी के फरमान भी अब पब्लिक डोमेन में हैं. लगता है कि संस्थानों के संचालकों को बस एक सीधा सा इलाज पता है- लड़कियों पर बुरी नजर है तो वे ही चेहरा ढक लें. उनसे अश्लीलता की जाए या घिनौनापन दिखाया जाए तो वे नजरें झुका लें या किसी तरह अपनी जान बचाएं. शाम को दरवाजे बंद कर लें, रोशनी बुझा लें और एक भीषण दुश्चिंता के अंधेरे में सिकुड़ कर सो जाएं. और सोचिए ये इस देश के किस हिस्से में नहीं हो रहा है. आंकड़े बताते हैं कि भारत में हर दो मिनट में महिलाओं को किसी न किसी किस्म की हिंसा का शिकार बना दिया जाता है. घरेलू हिंसा से लेकर सार्वजनिक जीवन में अनेक किस्म की बर्बरताएं महिलाओं पर आमादा हैं.

बनारस का आंदोलन इसलिए भी यादगार माना जाएगा कि ये न सिर्फ अधिकार और इंसाफ की पुकार जगाता है बल्कि ये संस्कारों और रिवायतों की उन कठिन बेड़ियों को भी तोड़ने का आह्वान करता है जिनके नाम पर महिलाओं को जन्म से ही रोका जाता रहा है. देश के किसी भी हिस्से में आप देखिए कि एक सामान्य लड़की कितनी सिमटी हुई कर दी गई है- पहनावे से लेकर अभिव्यक्ति तक. और बनारस जैसा अपनी सांस्कृतिक कुलीनता और फलसफाई औघड़ता में इठलाता और प्राचीन से भी प्राचीन, आध्यात्मिक रहस्यों वाला कहा गया शहर अपने महान अहंकार और बनारसीपन के ठाठ में ये नहीं देख पाता कि उसके साए में साधारण स्त्री बिरादरी ठिठकी हुई है. वो नहीं देख पाता कि उसकी जीवंत संस्कृति कैसे उचक्का-संस्कृति बन गई है. एक शहर का इससे बड़ा दुर्भाग्य क्या होगा. कमोबेश यही बात उस बनारस हिंदू विश्वविद्यालय पर लागू है, जो अपने संस्थापक महामना को महानता की चादर ओढ़ाकर, इन दिनों नींद में चला गया. 

छात्राओं की बहुत साधारण और जायज सी मांगे थीं. छात्रावास में सुरक्षा का उचित इंतज़ाम, महिला सुरक्षा दस्ते, सिक्योरिटी कैमरा, दिन-रात की गश्त, और उचक्कों और शोहदों पर कार्रवाई. इन मांगों को मान लेने में कोई हर्ज नहीं था. और हैरानी है कि ये मांगे अब तक पूरी क्यों नहीं हुई थीं. हैरानी है कि वर्तमान कुलपति से पहले बनारस में गर्ल्स हॉस्टल के हाल क्या बेहतर थे. कोई मॉनिटरिंग सिस्टम होना चाहिए था. विश्वविद्यालय में लड़कियां मस्ती के लिए नहीं, अपना जीवन और करियर बनाने आती हैं. उनके बारे में गलत धारणा मत पालिए. जिन मर्दवादी संस्कारों के साथ अक्सर लड़के पले-बढ़े होते हैं, उन्हें वे संस्कार, विश्वविद्यालय के प्रवेश-द्वार में घुसने से पहले गंगा में विसर्जित कर आना चाहिए. विश्वविद्यालय की एक सजग व्यवस्था उन्हें बेहतर मनुष्य बनाए. शिक्षित तो वे तभी होंगे. डिग्रियां और उपाधियां तो कितनी ही ले सकते हैं. श्रेष्ठता ग्रंथि, पुरुषवादी अहम, स्त्री विरोधी सड़े गले रिवाज और इन सबसे मिलकर बने एक कट्टर बहुसंख्यकवाद ने उन्हें एक विक्षुब्ध कामातुर और सेक्स-पिपासु में तब्दील कर दिया है. मसाला फिल्में, यौन जुगुप्साएं, भटकाव और सेक्स को लेकर टैबू- बनारस ही क्यों और विश्वविद्यालय ही क्यों, वे कहां नहीं फैले हुए हैं, कहां नहीं दिख जाते हैं. उन्होंने समाज को भयभीत और गंदा कर दिया है.

लेकिन पहला काम उनका सामाजिक, नैतिक या कानूनन सुधार का नहीं होगा. पहला काम तो होगा लड़कियों की हिफाजत का. उनकी मांगों पर फौरन से पेश्तर अमल दिखना चाहिए. उन्हें हिदायतों और चेतावनियों से मत बांधिए. उनकी आजादी के लिए स्पेस बनाइये. कानूनी रूप से उनकी मदद कीजिए. उनसे चिपकने की कोशिश मत कीजिए. धारणाएं बदलिए. हंसना-बोलना, उठना-बैठना मत तौलते रहिए. बनारस हिंदू विश्वविद्यालय की भूतपूर्व महानताओं का ढोल बजाते रहने की जरूरत नहीं. उसकी पोल वर्तमान आंदोलन में खुल गई है. अब जो भी बचीखुची गरिमा है उसको संभालना होगा. या आगे एक वास्तविक सामाजिक, सांस्कृतिक और मानवीय गरिमा का निर्माण करना है तो पुराना रवैया छोड़कर नये सोच में उतरना होगा- चाहे वो बौद्धिक हों या अकादमिक, शिक्षक हों या शिक्षार्थी, प्रशासन हो या पुलिस- वरना वे सवाल, प्रेत की तरह मंडराते और चुभते रहेंगे जो ‘बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ' नारे के आवरण को फाड़कर निकले हैं: ‘बचेगी बेटी तो पढ़ेगी बेटी,' ‘पढ़ेगी बेटी तो पिटेगी बेटी.'