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दुनिया

पढ़ाई में क्यों दिलचस्पी नहीं लेते छात्र

स्कूलों में शिक्षा प्राप्त कर रहे अधिकतर छात्र पढ़ाई में दिलचस्पी नहीं लेते. एक अध्ययन में सामने आया है कि शिक्षक अपने छात्रों में ‘लगन’ का अभाव पाते हैं.

भारत में शिक्षा के स्तर को लेकर हमेशा सवाल उठते रहे हैं. कभी शिक्षकों की काबिलियत को लेकर तो कभी शिक्षा व्यवस्था को लेकर. खुद शिक्षकों का मानना है कि छात्रों का एक बड़ा वर्ग शैक्षिक गतिविधियों से स्वयं को नहीं जोड़ पाता. पियरसन वॉयस ऑफ टीचर सर्वे के अनुसार केवल 55 फीसद छात्र ही सक्रिय ढंग से पढ़ाई कर रहे हैं.

प्राइवेट स्कूलों में बेहतर स्थिति

पियरसन वॉयस ऑफ टीचर के ताज़ा सर्वे के अनुसार शिक्षकों का मानना है कि निजी स्कूलों में शैक्षिक गतिविधियों में सक्रिय छात्रों की संख्या सरकारी स्कूलों के मुकाबले अधिक है. सरकारी स्कूलों में केवल 51 फीसदी छात्र ही इनोवेशन और पढाई में सक्रिय हैं जबकि प्राइवेट स्कूलों में यह आकड़ा 67 प्रतिशत है. प्राइमरी के मुकाबले उच्चतर शिक्षा के दौरान छात्रों की सक्रियता में और गिरावट आती है. इस दौरान केवल पचास फीसदी छात्र ही शैक्षिक गतिविधियों में पूरी तरह से सक्रिय रहते हैं.

हालांकि इस सर्वे के अनुसार पिछले पांच सालों में छात्रों के लगन में वृद्धि हुई है. प्राइवेट स्कूलों के 81 फीसदी शिक्षक मानते हैं कि पहले के मुकाबले अब शैक्षिक गतिविधियों के प्रति छात्रों की सक्रियता बढ़ रही है. ऐसा मानने वाले सरकारी स्कूल के शिक्षकों की संख्या भी कम नहीं है. 74 फीसदी सरकारी स्कूल शिक्षक, सकारात्मक परिवर्तन महसूस कर रहे हैं. उच्चतर शिक्षा के मामले में ऐसा नहीं है. केवल 41 फीसदी शिक्षक मानते हैं कि शैक्षिक गतिविधियों में छात्रों की सक्रियता में कुछ वृद्धि हो पायी है.

क्या है कारण?

इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स के चलते बच्चों में अनिद्रा, तनाव, मोटापा और घबराहट जैसी समस्याएं ही नहीं आतीं बल्कि ये गैजेट्स बच्चों की पढाई के दुश्मन भी साबित हो रहे हैं. सर्वे में शामिल शिक्षकों का मानना है कि मोबाइल इंटरनेट और अन्य इलेक्ट्रॉनिक गैजेट के इस्तेमाल के आदी हो चुके छात्र पढाई में कम ध्यान दे पाते हैं. 29 फीसदी शिक्षकों का मानना है कि शैक्षिक गतिविधियों में कम सक्रिय छात्रों का एक प्रमुख कारण उनका इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स का आदी होना है. इसके अलावा पालकों का सहयोग ना मिलना भी एक बड़ा कारण है.

प्राइवेट स्कूलों में बच्चों पर अच्छे प्रदर्शन का दबाव भी एक नकारात्मक कारण के रूप में सामने आया है. सरकारी स्कूल में इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स कोई समस्या नहीं है लेकिन शैक्षिक रूप से बच्चों को ज्यादा सक्रिय बनाने में पालकों का सहयोग नहीं मिलता. इसके अलावा स्कूल के बाहर की चुनौतियां और खुद छात्रों का पूर्व का प्रदर्शन भी उनके प्रदर्शन पर असर डालता है. इस सर्वे से एक और चिंताजनक तथ्य उभरकर सामने आया है. शिक्षक मानते हैं कि छात्रों के मूल्यों और नैतिकता में गिरावट आ रही है. इसके अलावा अनुशासन में भी गिरावट दर्ज की गयी है. 42 प्रतिशत शिक्षकों ने मूल्य और नैतिकता में आ रही गिरावट को महसूस किया. वहीँ 38 प्रतिशत शिक्षकों ने छात्रों में अनुशासन के प्रति उदासीनता की बात स्वीकार की. वैसे, शैक्षिकोत्तर गतिविधियों में छात्रों की भागीदारी बढ़ रही है.

संलग्नता बढ़ाने वाले कारक

सर्वे के माध्यम से छात्रों की शिक्षा के प्रति रुचि को बढ़ाने वाले महत्वपूर्ण कारकों की पहचान भी की गयी है. शिक्षकों का मानना है कि वास्तविक जीवन के उदाहरण और इससे जुडी कहानियां छात्रों को उत्प्रेरित कर सकती हैं. 86 प्रतिशत शिक्षकों ने शिक्षा के प्रति छात्रों की संलग्नता बढ़ाने में वास्तविक जीवन के उदाहरण को महत्वपूर्ण माना. जबकि 83 शिक्षकों का मानना है कि टेक्नोलॉजी और तकनीक के जरिये छात्रों की संलग्नता बढ़ाई जा सकती है. माता पिता और बच्चों की काउंसलिंग को भी छात्र संलग्नता बढ़ाने में एक कारक माना गया है.

पीयरसन इंडिया के प्रबंध निदेशक दीपक मेहरोत्रा का कहना है कि शिक्षक यह मानते हैं कि पर्सनल गजेट्स का अत्यधिक प्रयोग छात्रों की शिक्षा के साथ संलग्नता में एक रुकावट है, लेकिन दिलचस्प बात यह है कि उन्हें शिक्षण प्रक्रिया में प्रौद्योगिकी के महत्व को व्यापक रूप से स्वीकार्यता दी है. उनके अनुसार वांछित छात्र संलग्नता स्तर व शिक्षा परिणाम को प्राप्त करने के लिए पारंपरिक शिक्षा को टेक्नोलॉजी प्लेटफार्म से प्रभावी तरीके से जोड़ने के लिए एक ढांचा बनाने की आवश्यकता है.

महाराष्ट्र राज्य स्कूली शिक्षा प्रशासन में काम कर चुकी डॉ. सुनंदा ईनामदार कहती हैं कि इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स का आदी होना निश्चित रूप से छात्रों के शैक्षिक गतिविधियों पर नकारात्मक असर डालता है. इसका यह मतलब नहीं कि शिक्षण प्रक्रिया में प्रौद्योगिकी के महत्व नजरअंदाज किया जाए. उनका कहना है, “गुणवत्तापूर्ण समावेशी शिक्षा सुनिश्चित करके ही छात्र संलग्नता को बढ़ाया जा सकता है.”

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