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दुनिया

पढ़ने की आदत बदल दे रहा है सोशल मीडिया

फेसबुक, व्हाट्सएप्प, इंस्टाग्राम और ऐसी ही कई सोशल नेटवर्किंग साइटों के चलते भारतीय युवाओं की पढ़ने की आदतें तेजी से बदल रही हैं.

अब बड़े शहरों में रहने वाले लोग तीन-चार साल पहले के मुकाबले अखबार पढ़ने और टीवी देखने में लगभग आधा समय खर्च करते हैं. एसोचैम की ओर से किए गए एक अध्ययन में इसका खुलासा हुआ है. हर हाथ में तेजी से पहुंच रहे स्मार्टफोन और लगभग मुफ्त इंटरनेट सेवाओं ने आदतों में बदलाव की यह प्रक्रिया तेज कर दी है. इससे पहले हुए कुछ सर्वेक्षणों में भी इस बदलाव के संकेत मिले थे. लेकिन यह पहला मौका है जब यह आंकड़ा तेजी से बढ़ने लगा है.
अध्ययन
दिल्ली, मुंबई, चेन्नई, हैदराबाद, बंगलुरू और पुणे समेत देश के कई प्रमुख शहरों में किए गए इस अध्ययन में कहा गया है कि सोशल नेटवर्किंग साइटों में युवा पीढ़ी सबसे ज्यादा समय फेसबुक पर गुजारती है. इस अध्ययन में शामिल 80 फीसदी लोगों का कहना था कि सुबह चाय के साथ अखबार पढ़ने की पीढ़ियों पुरानी परंपरा अब बदल गई है. अब युवा सुबह उठते ही अपने स्मार्टफोन पर सोशल साइटों को चेक करने को तरजीह देते हैं. एसोचैम के महासचिव डीएस रावत कहते हैं, "युवा पीढ़ी की पढ़ने-लिखने की आदतों के बदलने की चर्चा तो लंबे समय से हो रही थी. अब इस अध्ययन ने इसकी पुष्टि कर दी है." रावत को उम्मीद है कि इंटरनेट के इस्तेमाल में गंभीरता बढ़ने से युवा पीढ़ी के लिए ज्ञान के नए भंडार खुल जाएंगे. लेकिन इसका लाभ उठाने के लिए उनको इंटरनेट पर उपलब्ध सूचनाओं में से सही-गलत का चुनाव करने लायक समझ विकसित करनी होगी.

सुंदर, तन्हा युवती का सहारा लेते हैकर
एसोचैम की रिपोर्ट में कहा गया है कि इस बदलाव को ध्यान में रखते हुए तमाम कंपनियां भी अब अपनी मार्केटिंग नीति में बदलाव कर रही हैं. ज्यादातर कंपनियां अब डिजिटल मंच पर मार्केटिंग व विज्ञापन को तरजीह देने लगी हैं. अखबारों ने भी इंटरनेट की पहुंच को ध्यान में रखते हुए डिजिटल प्लेटफार्म अपनाने की प्रक्रिया तेज कर दी है.
मौजूदा परिदृश्य
भारत में अब भी छोटे-बड़े अखबारों व पत्रिकाओं का कुल सर्कुलेशन लगभग 6.2 करोड़ है. इसके साथ ही टीवी देखने वाले लोगों की तादाद लगभग 78 करोड़ है. रिपोर्ट में कहा गया है कि आने वाले दिनों में टीवी दर्शकों की बड़ी तादाद तेजी से स्मार्टफोन की ओर आकर्षित होगी. भारत की आबादी और युवा पीढ़ी की तादाद को ध्यान में रखते हुए यूट्यूब, नेटफ्लिक्स और अमेजन जैसी साइटें यहां बड़े पैमाने खुद को स्थापित करने का प्रयास कर रही हैं.इंटरनेट से जुड़े, तो ई-लर्निंग से क्यों कटे हैं गांव

सोशल मीडिया पर आने वाले ट्रैफिक के बड़े हिस्से पर फेसबुक का कब्जा है. भारत में लगभग 20 करोड़ लोग इस सोशल नेटवर्किंग साइट का इस्तेमाल करते हैं. रिपोर्ट में कहा गया है कि देश में इंटरनेट की पहुंच अब भी दूसरे देशों के मुकाबले काफी कम है. लेकिन तमाम टेलिकॉम कंपनियों के बीच बढ़ती प्रतिद्वंदिता की वजह से अब आने वाले वर्षों में इसकी पहुंच तेजी से बढ़ने की संभावना है. उसके बाद छपी हुई चीजें पढ़ने और पारंपरिक टीवी चैनल देखने की आदतों में बदलाव की प्रक्रिया और तेज होगी.
विशेषज्ञोंकीराय
विशेषज्ञ भी एसोचैम की रिपोर्ट से सहमत हैं. समाजशास्त्री नीरेन दे कहते हैं, "आदतों में बदलाव तो हो ही रहा है. अब युवा पीढ़ी के लोग सुबह उठ कर अखबार पढ़ने की बजाय स्मार्टफोन हाथों में लेकर सोशल साइटें चेक करने लगते हैं." वह कहते हैं कि टीवी पर आने वाला कोई भी धारावाहिक चाहे कितना भी लोकप्रिय क्यों न हो, परिवार के तमाम सदस्य पहले की तरह एक साथ बैठ कर उसे नहीं देखते. इसकी बजाय वह अपने फोन पर सोशल नेटवर्किंग साइटों पर व्यस्त रहते हैं. विशेषज्ञों का कहना है कि डिजिटल क्षेत्र में अभी और क्रांति आएगी. इसकी वजह से पढ़ने-लिखने की आदतों के साथ-साथ जीवनशैली में बदलाव लाजिमी है. लेकिन छपे हुए शब्दों की अहमियत कभी कम नहीं होगी.

महानगर के एक कॉलेज में समाज विज्ञान पढ़ाने वाले प्रोफेसर चंद्रमोहन नस्कर कहते हैं, "छपी हुई चीजें पढ़ने की आदत छोड़ने के कई नुकसान हैं. इंटरनेट और वेबसाइटों पर कई चीजें देखने के बाद लोग जल्दी ही उसे भूल जाते हैं. लेकिन किताबों में पढ़ी बातें लंबे समय तक दिमाग में रहती हैं. यह याददाश्त तेज करने में भी मददगार है." वह कहते हैं कि बच्चों में पढ़ने की आदत बरकरार रखने के लिए बचपन से ही उनमें जोर से बोल-बोल कर पढ़ने की आदत डालनी चाहिए. विशेषज्ञों का कहना है कि डिजिटल क्रांति को रोकना तो संभव नहीं है. लेकिन इसके साथ संतुलन बनाते हुए छपी हुई चीजों को पढ़ने की आदत बरकरार रखना जरूरी है.

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