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दुनिया

पट जाएगा भारत-ईयू का अंतर: क्राविन्यो

भारत में यूरोपीय संघ के राजदूत जोआऊ क्राविन्यो का कहना है कि भारत और यूरोपीय संघ की व्यापारिक बातचीत नाजुक मुकाम पर है, लेकिन उन्हें इस साल मतभेदों के मिट जाने की उम्मीद है.

क्राविन्यो का कहना है कि दोनों पक्ष समय के दबाव में हैं, भारत अगले साल होने वाले चुनावों की वजह से तो यूरोपीय संघ अमेरिका और जापान के साथ शुरू होने वाली मुक्त व्यापार वार्ताओं के कारण. भारत में अगले साल संसदीय चुनाव होंगे और गठबंधन की दिक्कतों के कारण मनमोहन सिंह की सरकार के लिए सख्त फैसला लेना मुश्किल होता जा रहा है. साथ ही अगले साल यूरोपीय संघ में भी नया आयोग चुना जाएगा. क्राविन्यो को कहना है कि उसके बाद प्राथमिकताओं का परिदृश्य अलग होगा.

भारत और 27 सदस्यों वाले यूरोपीय संघ 2007 से मुक्त व्यापार संधि पर बातचीत कर रहे हैं लेकिन अब तक सहमति नहीं हो पाई है. दोनों पक्षों के बीच व्यापार और निवेश के कई मामलों पर गंभीर मतभेद हैं और पिछले महीने हुई बातचीत में मतभेदों को दूर नहीं किया जा सका .2011-12 में पहली बार भारत और यूरोपीय संघ का व्यापार 100 अरब के आंकड़े को पार कर 110 अरब हो गया था. 2012 में यह घटकर 95 अरब यूरो रह गया. यूरोपीय संघ बैंकिंग और बीमा क्षेत्र में प्रत्यक्ष निवेश बढ़ाकर 49 प्रतिशत करने को समझौते के लिए महत्वपूर्ण बता रहा है तो भारत चाहता है कि उसके आईटी क्षेत्र को डाटा सुरक्षित क्षेत्र का दर्जा दिया जाए.

यूरोपीय संघ भारत के लाभप्रद समझे जाने वाले बैंकिंग और बीमा क्षेत्र में प्रवेश चाहता है तो भारत के लिए यूरोपीय आईटी बाजार में प्रवेश बहुत जरूरी है. भारत की दलील है कि विदेशी निवेश की सीमा बढ़ाने के लिए संसद की अनुमति जरूरी है, जिसके इस समय आसार नहीं हैं. दूसरी ओर यूरोपीय कानून के हिसाब से डाटा के लिए सुरक्षित नहीं समझे जाने वाले देशों की कंपनियों को कड़े नियमों का पालन करना होता है, जो उनका खर्च बढ़ा देता है.

हालांकि विवाद सिर्फ इन्हीं मुद्दों पर नहीं है. यूरोपीय संघ कारों पर लगाई जाने वाली ड्यूटी में भारी कटौती के अलावा वाइन, शराब और डेयरी उत्पादों पर कर घटाने की भी मांग कर रहा है. दूसरी ओर भारत अपने पेशेवरों के लिए वीजा नियमों में ढील देने के साथ ही सेवा और दवा के बाजार में प्रवेश की मांग कर रहा है. भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने इस साल अप्रैल में जर्मनी दौरे पर चांसलर अंगेला मैर्केल के साथ बातचीत में मुक्त व्यापार वार्ताओं को इस साल तक पूरा कर लेने का लक्ष्य रखा था.

वित्तीय मुश्किलें सुधारों की राह खोलती हैं. भारत भी इस समय आर्थिक मुश्किलों के दौर से गुजर रहा है. विकास दर घट कर पांच प्रतिशत रह गई है. चुनाव से पहले सरकार को सफलताएं दिखाने की जरूरत है. भारत सरकार के मंत्री दुनिया भर में घूम घूम कर फिर से विदेशी निवेश का आमंत्रित कर रहे हैं. एक ओर चीन में सक्रिय अंतरराष्ट्रीय निवेशक अपनी पूंजी का एक हिस्सा भारत में लगाकर जोखिम कम करना चाहते हैं तो दूसरी ओर भारत के लिए विदेश व्यापार का महत्व पहले से ज्यादा हो गया है.

यूरोपीय संघ के साथ भारत का 18 प्रतिशत विदेश व्यापार होता है और यूरोप विश्व बाजार में उसकी हिस्सेदारी का महत्वपूर्ण प्रवेशद्वार है. चीन के साथ भी भारत का व्यापार बढ़ा है, लेकिन भारत चीन व्यापार में भारत की प्राथमिकता व्यापार संतुलन में घाटे को कम करने में हैं, यूरोप के साथ उसका व्यापार बहुत कुछ संतुलित है. यहां वह कारोबार बढ़ाने पर जोर दे सकता है. इसमें मुक्त व्यापार संधि बहुत अहम भूमिका निभाएगी.

दोनों पक्षों पर समय का दबाव है लेकिन भारत में यूरोपीय संघ के राजदूत जोआओ क्राविन्यो का कहना है कि समय का तकाजा सफलता की गारंटी नहीं होती. विवदित मुद्दों पर दोनों पक्षों की रायों में अंतर है, लेकिन इसके बावजूद क्राविन्यो को भरोसा है कि इसे मिटा लिया जाएगा. "हम तभी विफल रहेंगे जब हम समझौते के लिए एक व्यापक पैकेज तय नहीं कर पाएंगे." उनके अनुसार ऐसा एक समझौता भारत को कपड़ा उद्योग में 8 अरब यूरो का कारोबार दिला सकता है. हर समझौता लेन देन होता है और भारत तथा यूरोपीय संघ की कोशिश है कि लेन देन ऐसा हो जो दोनों ही पक्षों के लिए फायदेमंद हो.

रिपोर्टः महेश झा, कोलोन

संपादनः निखिल रंजन

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